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अंतरिक्ष मिशन में कैसे काम करता है Life Support System, जानें जान बचाने के ऑप्शन?

अंतरिक्ष में न तो हवा है, न पानी और न ही कोई प्राकृतिक व्यवस्था जो इंसान को जिंदा रख सके. वहां एक छोटी-सी तकनीकी खराबी भी जानलेवा साबित हो सकती है.

जैसे ही इंसान पृथ्वी से बाहर अंतरिक्ष में कदम रखता है, हालात पूरी तरह बदल जाते हैं. अंतरिक्ष में न तो हवा है, न पानी और न ही कोई प्राकृतिक व्यवस्था जो इंसान को जिंदा रख सके. वहां एक छोटी-सी तकनीकी खराबी भी जानलेवा साबित हो सकती है. इसलिए हर मानव अंतरिक्ष मिशन में Life Support System (जीवन रक्षक प्रणाली) सबसे अहम भूमिका निभाता है. NASA के Artemis II जैसे मिशन, जिसमें इंसानों को चांद की ओर भेजा जाएगा, यह साबित करते हैं कि आज की अंतरिक्ष तकनीक सिर्फ उड़ान तक सीमित नहीं है, बल्कि हर पल इंसानों की सुरक्षा पर केंद्रित है. तो आइए जानते हैं कि अंतरिक्ष मिशनों में Life Support System कैसे काम करता है और किन-किन तरीकों से यह अंतरिक्ष यात्रियों की जान बचाता है. 

Life Support System क्या होता है?

Life Support System ऐसी मशीनों और तकनीकों का समूह होता है, जो अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सांस लेने योग्य हवा, पीने का साफ पानी, सही तापमान और नमी, कचरा और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराता है. यह सिस्टम अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसा वातावरण बनाने की कोशिश करता है, ताकि इंसान सुरक्षित रह सकें. 

अंतरिक्ष मिशनों में Life Support System कैसे काम करता है?

अंतरिक्ष मिशनों में Life Support System (जीवन रक्षक प्रणाली) का काम अंतरिक्ष यात्रियों को वैसा ही सुरक्षित वातावरण देना होता है जैसा पृथ्वी पर प्राकृतिक रूप से मिलता है. क्योंकि अंतरिक्ष में न हवा है, न पानी और न ही जीवन के लिए जरूरी परिस्थितियां, इसलिए यह सिस्टम ही अंतरिक्ष यात्रियों की जान बचाने की सबसे बड़ी ढाल होता है.

किन-किन तरीकों से यह अंतरिक्ष यात्रियों की जान बचाता है?

Life Support System का सात मानवीय जरूरतों को पूरा करता है. जिसमें जल पुनर्चक्रण के जरिए पानी उपलब्ध कराना, खाना उपलब्ध कराना और उसका भंडारण, सांस लेने योग्य हवा की आपूर्ति, ऑक्सीजन उत्पादन और CO₂ हटाना, हवा का दबाव नियंत्रित रखना, केबिन का दबाव पृथ्वी जैसा (101 किलोपैमाने पर) बनाए रखना. एयर हीटिंग और कूलिंग सिस्टम से तापमान नियंत्रण, मानव अपशिष्ट प्रबंधन, आग का पता लगाना और बुझाना, इसके अलावा, अंतरिक्ष यात्रियों को विकिरण और सूक्ष्म उल्कापिंडों से भी बचाना जरूरी होता है, खासकर स्पेस वॉक जैसी बाहरी गतिविधियों के दौरान. 

अंतरिक्ष में हवा कैसे मिलती है?

पृथ्वी पर हम सांस लेते समय ऑक्सीजन लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं. अंतरिक्ष यान के अंदर भी यही प्रक्रिया होती है. लेकिन अगर कार्बन डाइऑक्साइड ज्यादा बढ़ जाए, तो सिर दर्द, चक्कर और बेहोशी तक हो सकती है. CO₂ हटाने की प्रक्रिया के लिए स्पेसक्राफ्ट में खास मशीनें लगी होती हैं, जिन्हें कार्बन स्क्रबर कहा जाता है. ये मशीनें हवा से अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड को छान लेती हैं. हवा को फिर से सांस लेने योग्य बना देती हैं. NASA और रूस, दोनों की प्रणालियां मिलकर इस काम को संभालती हैं. 

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मानसी उपाध्याय करीब दो साल से डिजिटल मीडिया और कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं. मूल रूप से उत्तराखंड से जुड़ी मानसी ने अपनी स्कूली शिक्षा केंद्रीय विद्यालय से पूरी की. इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए (ऑनर्स) हिंदी पत्रकारिता की पढ़ाई की और वर्तमान में राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नलिज्म कर रही हैं. पत्रकारिता में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अक्टूबर 2024 में एबीपी नेटवर्क से की. अब वह डिजिटल कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें फीचर और इंफॉर्मेटिव स्टोरीज लिखने के साथ-साथ स्क्रिप्ट राइटिंग, सोशल मीडिया और रिसर्च आधारित कंटेंट तैयार करने में रुचि है. हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ रखने वाली मानसी ऐसी स्टोरीज लिखना पसंद करती हैं, जो पाठकों को नई और जरूरी जानकारी आसान भाषा में दें. उनकी कोशिश रहती है कि कंटेंट सिर्फ जानकारी देने वाला ही नहीं, बल्कि पढ़ने में दिलचस्प और पाठकों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ भी हो.

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