Railway Signal System: लोको पायलट कितनी दूर से देख लेते हैं सिग्नल, कैसे रोकते हैं तेज रफ्तार ट्रेन?
Railway Signal System: लोको पायलट डिस्टेंट सिग्नल से ही स्पीड नियंत्रित करना शुरू कर देते हैं, क्योंकि तेज रफ्तार ट्रेन को रोकने के लिए लंबी ब्रेकिंग दूरी चाहिए होती है, इसलिए पहले से तैयारी जरूरी है.

Railway Signal System: ट्रेन का सफर जितना आरामदायक हमें लगता है, उसे सुरक्षित बनाए रखने के पीछे उतनी ही बारीक तकनीक और सतर्कता काम करती है. सबसे बड़ा सवाल यही उठता है, आखिर लोको पायलट कितनी दूर से सिग्नल देख लेते हैं, और अगर सामने अचानक कोई मुश्किल आ जाए, तो सैकड़ों टन वजनी और तेज रफ्तार ट्रेन को कैसे रोका जाता है?
सिग्नल का पूरा सिस्टम कैसे काम करता है
भारतीय रेलवे में सिग्नल सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई चरणों में लगाए जाते हैं. सबसे पहले डिस्टेंट यानी वार्नर सिग्नल आता है, जो लोको पायलट को पहले से यह इशारा दे देता है कि आगे स्टेशन पर सिग्नल कैसा मिलने वाला है. इसके बाद होम सिग्नल और फिर स्टार्टर सिग्नल आते हैं, जो ट्रेन को स्टेशन में प्रवेश और वहां से रवाना होने की अनुमति देते हैं. यही सिलसिलेवार सिस्टम लोको पायलट को पहले से तैयार रहने का पूरा मौका देता है.
सिग्नल दिखते ही स्पीड कम करना शुरू कर देते हैं पायलट
लोको पायलट की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही होती है कि वह सिग्नल को दूर से ही पहचानकर, उसके अनुसार ट्रेन की रफ्तार कम या ज्यादा करना शुरू कर दें. डिस्टेंट सिग्नल पर अगर संकेत मिलता है कि आगे रुकना पड़ सकता है, तो पायलट उसी वक्त से धीरे-धीरे ब्रेक लगाना शुरू कर देते हैं, ताकि होम सिग्नल तक पहुंचते-पहुंचते ट्रेन की रफ्तार पूरी तरह नियंत्रण में आ जाए.
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अचानक ब्रेक लगाना क्यों है लगभग नामुमकिन
अक्सर लोग सोचते हैं कि पटरी पर अचानक कोई सामने आ जाए, तो ट्रेन तुरंत क्यों नहीं रुक पाती. दरअसल, ट्रेन के पहियों और पटरियों के बीच रगड़ बेहद कम होती है, इसलिए तेज रफ्तार में चल रही भारी ट्रेन को रोकने के लिए काफी लंबी दूरी चाहिए होती है. जब तक कोई चीज पायलट को नजर आती है, तब तक ट्रेन अक्सर उस जरूरी ब्रेकिंग दूरी को पहले ही पार कर चुकी होती है, यही वजह है कि आपातकाल में भी ट्रेन को तुरंत रोक पाना लगभग असंभव हो जाता है.
इसीलिए पहले से मिलती है जानकारी
यही वजह है कि पूरा सिस्टम इस तरह डिजाइन किया गया है कि पायलट को आखिरी वक्त पर फैसला लेने की नौबत ही न आए. सिग्नल की सिलसिलेवार व्यवस्था, तय ब्रेकिंग दूरी और लगातार निगरानी, यह तीनों मिलकर सुनिश्चित करते हैं कि ट्रेन बिना किसी जोखिम के समय पर और सुरक्षित तरीके से रुक सके.
रूट के हिसाब से भी बदलती रहती है सतर्कता
घने कोहरे, तेज बारिश या पहाड़ी इलाकों जैसी परिस्थितियों में सिग्नल की दृश्यता कम हो जाती है, ऐसे में रेलवे अतिरिक्त सावधानी बरतते हुए स्पीड रिस्ट्रिक्शन और डबल डिस्टेंट सिग्नल जैसी व्यवस्थाएं भी लागू करता है, ताकि पायलट को पहले से ज्यादा समय और जानकारी मिल सके.
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