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दो देशों के बीच कैसे होती है फोन पर बात, यहां कैसे काम करता है नेटवर्क?

How World Leaders Talk On Phone: दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों की फोन कॉल एक साधारण बातचीत नहीं, बल्कि रणनीति और सुरक्षा का मेल होती है. हर शब्द, हर सेकंड पहले से तय और सुरक्षित किया जाता है.

जब खबरों में आता है कि दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच फोन पर बातचीत हुई या कॉल नहीं हो सकी, तो आम लोगों को लगता है कि यह एक साधारण फोन कॉल जैसा होगा, लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है. यह न तो आम मोबाइल कॉल होती है और न ही बिना तैयारी के होती है. इसके पीछे महीनों की तैयारी, कड़ी सुरक्षा और बेहद खास तकनीक काम करती है, जिसे आम तौर पर कोई नहीं देख पाता है. 

फोन कॉल नहीं, एक कूटनीतिक प्रक्रिया

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दो देशों के प्रधानमंत्रियों या राष्ट्रपतियों के बीच फोन पर बातचीत एक पूरी तरह संस्थागत प्रक्रिया होती है. हाल ही में अमेरिका के वाणिज्य मंत्री ने कहा कि अगर पीएम नरेंद्र मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप के साथ फोन पर बात की होती तो भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील हो सकती थी. उनके इस बयान के बाद यह सवाल फिर उठा कि आखिर नेता आपस में फोन पर बात कैसे करते हैं. सच्चाई यह है कि कोई भी राष्ट्राध्यक्ष यूं ही फोन उठाकर दूसरे नेता से बात नहीं करता है. इसके लिए भी कई स्तर पर तैयारी की जाती है. 

कॉल से पहले क्यों जरूरी होती है सहमति

किसी भी बातचीत से पहले दोनों देशों के विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, व्हाइट हाउस या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आपस में संपर्क करते हैं. सबसे पहले यह तय किया जाता है कि बातचीत की जरूरत क्यों है, किन मुद्दों पर चर्चा होगी और कॉल कितनी देर चलेगी. जब तक इन बिंदुओं पर सहमति नहीं बनती, तब तक कॉल तय नहीं होती है. 

पर्दे के पीछे स्टाफ की बड़ी भूमिका

अगर दो देशों के रिश्ते मजबूत और नियमित संपर्क वाले हों, तो प्रक्रिया थोड़ी आसान हो जाती है. ऐसे मामलों में एक देश का सिचुएशन रूम सीधे दूसरे देश के समकक्ष कार्यालय को संदेश भेज देता है. जहां रिश्ते औपचारिक या सीमित होते हैं, वहां राजदूतों के जरिए अनुरोध भेजा जाता है. समय, एजेंडा और प्राथमिकताएं पहले ही तय कर ली जाती हैं. 

हमेशा सुरक्षित लाइन का इस्तेमाल

राष्ट्राध्यक्ष कभी भी सामान्य मोबाइल या लैंडलाइन से बात नहीं करते हैं. इसके लिए एन्क्रिप्टेड और हाई-सिक्योरिटी कम्युनिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल होता है. अमेरिका में ऐसी कॉल्स अक्सर व्हाइट हाउस सिचुएशन रूम से जुड़ती हैं, जबकि भारत में प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय की सुरक्षित प्रणालियां इसका जिम्मा संभालती हैं. कई बार सुरक्षित वीडियो कॉल भी होती है, लेकिन फोन कॉल ज्यादा आम है.

बातचीत से पहले मिलती है पूरी ब्रीफिंग

कोई भी नेता बिना तैयारी के कॉल नहीं करता है. बातचीत से पहले उन्हें विस्तार से ब्रीफ किया जाता है. अमेरिका में राष्ट्रपति को नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की ओर से डोजियर दिया जाता है, जिसमें सामने वाले नेता की पृष्ठभूमि, संभावित सवाल और संवेदनशील मुद्दों पर रणनीति होती है. अगर विषय व्यापार, सुरक्षा या युद्ध से जुड़ा हो, तो यह तैयारी और गहरी होती है.

भाषा और दुभाषिए क्यों होते हैं जरूरी

भले ही कई नेता विदेशी भाषाएं जानते हों, लेकिन आधिकारिक बातचीत अक्सर मातृभाषा में ही होती है. इसका कारण है शब्दों की सटीकता और भावनात्मक अर्थ को सुरक्षित रखना. ऐसे में पेशेवर दुभाषिए कॉल के दौरान मौजूद रहते हैं. एक शब्द की गलती भी कूटनीतिक तनाव पैदा कर सकती है, इसलिए अनुवाद बेहद सावधानी से किया जाता है.

क्या नेता अकेले बात करते हैं

ज्यादातर मामलों में नेता पूरी तरह अकेले नहीं होते है. खासकर संवेदनशील मुद्दों पर बातचीत के दौरान वरिष्ठ सलाहकार, सुरक्षा अधिकारी या तकनीकी स्टाफ कॉल को मॉनिटर करता है. इससे बातचीत का आधिकारिक रिकॉर्ड भी रहता है और बाद में किसी तरह की गलतफहमी नहीं होती है. 

हॉटलाइन का मतलब क्या होता है

अक्सर फिल्मों में दिखाया जाने वाला ‘रेड फोन’ कोई साधारण टेलीफोन नहीं होता है. जैसे अमेरिका और रूस के बीच हॉटलाइन एक सुरक्षित टेक्स्ट और डेटा सिस्टम है, जिसका इस्तेमाल सिर्फ आपात हालात, जैसे युद्ध या परमाणु संकट में किया जाता है. सामान्य राजनीतिक या व्यापारिक बातचीत इसके जरिए नहीं होती है. 

तकनीक कैसे पहुंचाती है आवाज

जब दो देशों के बीच कॉल होती है, तो यह स्थानीय नेटवर्क से शुरू होकर सुरक्षित सरकारी सिस्टम तक जाती है. वहां से डिजिटल वॉयस डेटा में बदलकर एन्क्रिप्टेड नेटवर्क, ऑप्टिकल फाइबर केबल और विशेष सर्वरों के जरिए दूसरे देश तक पहुंचती है. यह पूरी प्रक्रिया इतनी सुरक्षित होती है कि किसी बाहरी व्यक्ति के लिए इसे सुन पाना लगभग नामुमकिन होता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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