ग्रीन क्रैकर्स आखिर कितने ग्रीन, इसका केमिकल कितना खतरनाक?
ग्रीन पटाखों में बैरियम नाइट्रेट केमिकल के इस्तेमाल को लेकर प्रदूषण बोर्ड और सरकार के बीच विवाद गहरा गया है, जिसका निर्णय अब सुप्रीम कोर्ट करेगा. चलिए जानें कि इसका केमिकल कितना खतरनाक है?

त्योहारों के मौसम से पहले पटाखों के इस्तेमाल और उनसे होने वाले प्रदूषण पर एक बार फिर से बड़ा विवाद छिड़ गया है. केंद्र सरकार की दो प्रमुख एजेंसियों के बीच ग्रीन पटाखों के मानकों को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं, जिसके बाद अब यह पूरा विषय सुप्रीम अदालत तक पहुंच गया है. केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड के द्वारा पटाखों में इस्तेमाल किए जाने वाले केमिकल बेरियम नाइट्रेट को लेकर कड़े सवाल उठाए गए हैं. चलिए जानें कि यह केमिकल कितना खतरनाक है.
ग्रीन पटाखों में CPCB को किस बात से एतराज?
इस पूरे मामले में विवाद का प्रमुख कारण पटाखों को बनाने में इस्तेमाल किया जाने वाले बेरियम नाइट्रेट नामक घातक केमिकल है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस केमिकल के प्रयोग पर बेहद कड़ा एतराज जताया है और इसे हवा में जहर घोलने वाले सबसे बड़े कारकों में से एक माना गया है. बोर्ड का स्पष्ट तर्क है कि जब तक इस ग्रीन पटाखों में इस जहर का इस्तेमाल नहीं बंद होता है, तब तक इनको सही मायनों में ग्रीन पटाखे नहीं कहा जा सकता है. इसी आपत्ति ने केंद्र को अदालत का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर किया है.
CSIR-NEERI ने पटाखा कंपनियों को क्या कहा था?
आतिशबाजी के दौरान वायु प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से CSIR-NEERI को केंद्र सरकार ने कहा था कि वह पटाखा कंपनियों के साथ मिलकर ऐसे नए फॉर्मूले तैयार करे, जिनसे पारंपरिक आतिशबाजी के मुकाबले कम से कम पचास प्रतिशत तक जहरीले धुएं में कमी आ सके. CSIR-NEERI की नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नए फॉर्मुले वाले पटाखों से हवा में तैरने वाले हानिकारक कणों में 45 से 60 फीसदी कमी आई है. इतना ही नहीं, अदालत द्वारा पूर्व में प्रतिबंधित लड़ी यानी जुड़े हुए पटाखों के निर्माण में भी धुएं और ठोस कचरे में 30 से 32 प्रतिशत की कमी का हवाला देकर राहत देने की बात कही गई है.
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इसमें पड़ने वाला केमिकल बेरियम नाइट्रेट कितना खतरनाक?
ग्रीन पटाखों में मिलाया जाने वाला बैरियम नाइट्रेट बहुत जहरीला और केमिकली बहुत आक्रामक माना जाता है. अगर सांस के जरिए यह शरीर में चला जाए या फिर गलती से निगल लिया जाए तो इसमें शख्स की जान भी जा सकती है. शरीर के अंदर जाते ही यह खून में पोटैशियम का स्तर तेजी से गिरा देता है, जिससे दिल की धड़कन अनियंत्रित हो जाती है और मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं. इसके अलावा यह खुद न जलते हुए भी आग को बहुत भीषण और विस्फोटक बनाने की क्षमता रखता है.
बेरियम नाइट्रेट से आंख और स्किन को कितना असर?
बेरियम नाइट्रेट का सीधा संपर्क इंसानों के लिए बहुत घातक साबित होता है. इसके महीन कण अगर त्वचा या आंखों के संपर्क में आ जाएं तो भयंकर जलन, त्वचा का लाल होना और आंखों को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती है. आतिशबाजी के दौरान हवा में घुलने वाला इसका धुआं फेफड़ों की सांस नली में तेज सूजन पैदा करता है. यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ और पर्यावरण मानक संस्थाएं ग्रीन पटाखों के नाम पर भी बेरियम सॉल्ट के बेधड़क इस्तेमाल को स्वास्थ्य के लिहाज से गंभीर खतरा बता ही हैं.
क्या होते हैं ग्रीन पटाखे?
साधारण शब्दों में समझें तो ग्रीन पटाखे ऐसे खास पटाखे हैं, जिनको सीएसआईआर–नीरी (CSIR–NEERI) यानी नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने विकसित किया है. इनकी खासियत है कि इनको बनाने में पारंपरिक पटाखों की तुलना में बहुत कम कच्चे माल का इस्तेमाल किया गया है. इनका खोल भी छोटे आकार का होता है. ग्रीन पटाखों में कुछ ऐसे वैज्ञानिक तत्व मिलाए जाते हैं जो जलने के बाद निकलने वाली धूल को तुरंत हवा में ही दबा देते हैं. इससे वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर का खतरनाक स्तर काफी हद तक नीचे गिर जाता है.

कितनी तरह के होते हैं ग्रीन पटाखे?
पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने मुख्य रूप से तीन श्रेणियों के ईको-फ्रेंडली पटाखे तैयार किए हैं-
SWAS
यह पहली श्रेणी है, जो कि जलने के बाद पानी की बारीक बूंदें छोड़ती है, जिससे हवा की धूल दब जाती है.
SAFAL
यह दूसरी श्रेणी के पटाखे होते हैं, जिनमें एल्युमिनियम की मात्रा बहुत कम रखी जाती है, जिससे शोर और धुआं दोनों कम होते हैं.
STAR
इसे तीसरी तकनीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें पोटैशियम नाइट्रेट और सल्फर का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया जाता है. इसके जरिए खतरनाक और जहरीला धुआं न के बराबर निकलता है.
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