जंतर-मंतर पर प्रोटेस्टर्स की निगरानी गैर-कानूनी थी या नहीं? HC करेगा फैसला
Jantar Mantar Protest: याची के वकील का कहना है कि किसी भी नागरिक की मनमाने तरीके से निगरानी नहीं की जा सकती. निगरानी से डर का माहौल बनाया गया. महिलाओं की लगातार फोटो-वीडियो बनाना निजता का उल्लंघन है.

जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित लगातार निगरानी को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार (27 जुलाई) को सुनवाई की. कोर्ट ने फिलहाल मामले में कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार करते हुए कहा कि हालात और शांत होने दीजिए, फिर इस मुद्दे पर बेहतर याचिका दाखिल की जा सकती है. हालांकि, अदालत ने कहा कि वह इस मामले पर मंगलवार (28 जुलाई) को फिर सुनवाई करेगी.
जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि अगर याचिका में निगरानी से जुड़े पूरे कानूनी ढांचे और दिशा-निर्देशों की मांग की जाए तो अदालत उस पर विस्तार से विचार कर सकती है. कोर्ट ने कहा कि सरकार बताए कि उसके पास क्या व्यवस्था है और क्या वह पर्याप्त है या नहीं, उसके बाद जरूरी आदेश दिए जा सकते हैं.
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केंद्र का दावा- प्रदर्शन खत्म, निगरानी भी बंद
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने अदालत को बताया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन समाप्त हो चुका है और अब वहां किसी तरह की निगरानी नहीं की जा रही. इसलिए याचिका की मौजूदा मांगें अब बेअसर हो चुकी हैं.
याचिकाकर्ता की दलील- गैरकानूनी निगरानी पर फैसला जरूरी
वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि मामला सिर्फ प्रदर्शन खत्म होने का नहीं है. अदालत यह घोषित करे कि प्रदर्शनकारियों की जिस तरह निगरानी की गई, वह कानून के खिलाफ थी. उनका कहना था कि राज्य किसी भी नागरिक की मनमाने तरीके से निगरानी नहीं कर सकता.
क्या हैं याचिका के आरोप
पूर्व जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि 20 जून से जंतर-मंतर पर चल रहे सीजेपी के धरना और भूख हड़ताल के दौरान प्रदर्शनकारियों की 24 घंटे फोटो और वीडियो रिकॉर्डिंग की गई. इसके लिए प्रदर्शन स्थल पर स्थायी निगरानी टावर लगाया गया था. याचिका में कहा गया है कि पुलिस सिर्फ प्रदर्शन नहीं, बल्कि लोगों के खाने, आराम करने और इलाज कराने जैसी सामान्य गतिविधियों पर भी नजर रख रही थी.
निगरानी से डर का माहौल बनाया गया- याचिकाकर्ता
याचिका में दावा किया गया है कि रिकॉर्ड किए गए वीडियो और तस्वीरों का इस्तेमाल छात्र प्रदर्शनकारियों की पहचान उजागर करने और उन पर दबाव बनाने के लिए किया गया. इससे लोगों में डर पैदा हुआ और संविधान के आर्टिकल 19 के तहत मिले अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर असर पड़ा.
महिला प्रदर्शनकारियों की निजता का भी मुद्दा
याचिका में यह भी कहा गया है कि बारिश के दौरान पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण भीगे कपड़ों में बैठी महिला प्रदर्शनकारियों की भी लगातार फोटो और वीडियो बनाई गई, जो उनकी निजता और गरिमा का गंभीर उल्लंघन है.
केंद्र सरकार का पुराना पक्ष
इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर प्रदर्शन की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाती है और सार्वजनिक स्थान पर निजता का दावा करना उचित नहीं है.
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