बिहार में कब-कब बाढ़ ने कितनी मचाई तबाही, हर साल डूबने की क्या है वजह?
नेपाल से आने वाली नदियों के भारी पानी और गाद जमने के कारण बिहार का 73 प्रतिशत क्षेत्र हर साल बाढ़ में डूबता है. यद्यपि तटबंधों के बावजूद तबाही का दायरा बढ़ा है.

पूर्वी भारत का राज्य बिहार हर साल मानसून के दौरान भारी जलप्रलय और तबाही का सामना करता है. तारीखें और साल बदल जाते हैं, लेकिन बाढ़ से प्रभावित होने वाले लाखों लोगों की त्रासदी कभी समाप्त नहीं होती. इस साल भी सितंबर के महीने में सामान्य से 55 प्रतिशत अधिक बारिश होने के कारण राज्य की प्रमुख नदियां जलमग्न हो चुकी हैं, जिससे 13 जिलों के 27 लाख से अधिक नागरिक सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं. राज्य में लगातार बढ़ती नदियां, जलभराव और विस्थापन ने एक बार फिर बिहार के जल संकट, भौगोलिक चुनौतियों और प्रशासनिक आपदा प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
इस वक्त क्या है स्थिति?
राज्य में वर्तमान जलप्रलय के कारण 13 जिलों की स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई है. सितंबर में 69.1 मिलीमीटर की अप्रत्याशित बारिश के चलते सात प्रमुख नदियां खतरे के निशान को पार कर चुकी हैं. संकटग्रस्त इलाकों से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने और भोजन उपलब्ध कराने के लिए प्रशासन ने 1,429 नावों को तैनात किया है. इसके साथ ही बेघर हुए परिवारों के लिए 190 कम्युनिटी किचन का संचालन किया जा रहा है, ताकि लोगों को भूखा न रहना पड़े. यद्यपि कुछ क्षेत्रों में जलस्तर में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, परंतु संपूर्ण प्रभावित क्षेत्र में संकट अभी टला नहीं है.
नेपाल से नदियों का प्रवाह और गाद की चुनौती
बिहार में आने वाली वार्षिक बाढ़ का मुख्य कारण इसकी भौगोलिक बनावट और पड़ोसी देश नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाली नदियां हैं. जब नेपाल के पहाड़ों में मूसलाधार बारिश होती है, तो वहां से निकलने वाली नदियां सामान्य दिनों की तुलना में 50 गुना अधिक रफ्तार के साथ बिहार के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं. इन नदियों के साथ भारी मात्रा में मिट्टी और गाद बहकर आती है, जो नदी के तल में जम जाती है. तलहटी के ऊपर उठने से नदियों की जल धारण क्षमता काफी घट जाती है, जिसके परिणामस्वरूप थोड़ा सा भी अतिरिक्त पानी तटीय इलाकों को तोड़कर आबादी में तबाही मचा देता है.
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राज्य के विशाल क्षेत्रफल और आबादी पर असर
भौगोलिक आंकड़ों के अनुसार, बिहार का कुल क्षेत्रफल 94,160 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से लगभग 68,800 वर्ग किलोमीटर का विस्तृत भूभाग निरंतर जलप्लावन के सीधे जोखिम में रहता है. इसका अर्थ यह हुआ कि राज्य की 73 प्रतिशत भूमि हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलने को मजबूर होती है. यदि राष्ट्रीय संदर्भ में देखें तो पूरे देश की कुल बाढ़-प्रभावित आबादी का 22 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले बिहार राज्य में निवास करता है. यही कारण है कि इस राज्य का एक बड़ा वर्ग वर्ष के तीन-चार महीने केवल अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में बिता देता है.
कौन सी नदियां विनाशकारी?
नेपाल से बिहार आने वाली गंडक, बागमती और कमला बलान जैसी नदियों में सबसे अधिक विनाशकारी भूमिका कोसी की मानी जाती है. नेपाल की कई सहायक नदियां कोसी में मिलकर इसके प्रवाह को अत्यधिक उग्र बना देती हैं. जल का प्रचंड वेग बढ़ते ही कोसी-पूर्णिया, मिथिला और चंपारण जैसे विशाल सांस्कृतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रों में फसलें, घर और बुनियादी ढांचा पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं. अपनी धारा बदलने की प्रवृत्ति और भीषण विनाशकारी क्षमता के कारण ही कोसी नदी को इस पूरे क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा प्राकृतिक खतरा माना जाता है.
तटबंधों का विस्तार और बढ़ता बाढ़ क्षेत्र
ऐतिहासिक आंकड़ों की तुलना से पता चलता है कि पिछले सात दशकों में नदियों पर बनाए गए सुरक्षा तटबंधों की लंबाई में भारी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इससे बाढ़ का खतरा घटने के बजाय उल्टा बढ़ा है. वर्ष 1954 में बिहार में नदियों के किनारों पर मात्र 160 किलोमीटर लंबे तटबंध बने हुए थे और तब लगभग 25 लाख हेक्टेयर जमीन जलप्लावन की आशंका से घिरी रहती थी. आज नदियों पर तटबंधों का जाल फैलकर 3,800 किलोमीटर तक पहुंच चुका है, लेकिन इसके बावजूद बाढ़ से प्रभावित होने वाला भूभाग बढ़कर 69 लाख हेक्टेयर के विशाल आंकड़े को पार कर गया है.
विगत दशकों का भीषण तबाही का इतिहास
बिहार का हालिया इतिहास कई जलप्रलयकारी वर्षों का साक्षी रहा है. 1978, 1987, 1998, 2004, 2007, 2008, 2013 और 2017 में राज्य ने अत्यंत विनाशकारी बाढ़ का सामना किया है. पिछले ढाई दशकों की बात करें तो वर्ष 2007 की बाढ़ सबसे ज्यादा घातक साबित हुई थी, जिसमें 1,287 मासूम जिंदगियों की मौत दर्ज की गई थी. इसके अतिरिक्त 2004 के दौरान 885 लोगों की जान गई थी, जबकि 2017 के संकट में 815 नागरिकों ने अपनी जान गंवाई थी. इन त्रासदियों के कारण जनहानि के साथ-साथ पशुधन का भी भारी नुकसान होता रहा है.

कितना आर्थिक नुकसान?
प्राकृतिक आपदा के कारण कृषि योग्य भूमि, सड़क तंत्र और संपत्तियों को अरबों रुपये की क्षति पहुंचती है. पिछले साल यानी 2025 में बाढ़ की चपेट में आने से 17 लाख से अधिक नागरिक सीधे तौर पर प्रभावित हुए थे, जिसके पुनर्वास और क्षतिपूर्ति के लिए बिहार सरकार ने केंद्र से 3,600 करोड़ रुपये का वित्तीय पैकेज मांगा था. ठीक इसी प्रकार, वर्ष 2024 में भी आई आपदा के बाद राज्य प्रशासन ने केंद्रीय सहायता के रूप में 3,638 करोड़ रुपये से अधिक की राशि की आधिकारिक मांग की थी. लगातार होने वाली इस वित्तीय क्षति से राज्य के विकास कार्य भी बाधित होते हैं.
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