पेट्रोल-डीजल से कितना अलग LNG फ्यूल, जिससे ट्रेन दौड़ा रहा रेलवे
LNG Train: भारत में अब एलएनजी ईंधन ट्रेन का इस्तेमाल किया जा रहा है. आइए जानते हैं कि इसके पीछे की तकनीक क्या है और यह ईंधन कैसे काम करता है.

- भारतीय रेलवे ने डीजल खपत घटाने को LNG-डीजल ट्रेन चलाई.
- LNG तरल मीथेन है, इंजन डीजल संग इसे उपयोग करता.
- यह कम प्रदूषण करती, ईंधन खर्च में ₹24 लाख तक बचत.
LNG Train: डीजल की खपत को कम करने और वैकल्पिक ईंधन की खोज करने की दिशा में भारतीय रेलवे ने हाल ही में गुजरात के साबरमती से देश की पहली एलएनजी डीजल डुअल फ्यूल ट्रेन शुरू की. यह तकनीक ट्रेन को डीजल के साथ-साथ लिक्विफाइड नेचुरल गैस का इस्तेमाल करने की भी सुविधा देती है.
आम डीजल ट्रेन के उलट इस सिस्टम में मोडिफाइड इंजन और खास फ्यूल स्टोरेज इक्विपमेंट का इस्तेमाल होता है. लेकिन एलएनजी असल में है क्या और यह पेट्रोल और डीजल से कैसे अलग है? आइए जानते हैं इस सवाल का जवाब.
एलएनजी क्या है और यह कैसे बनती है?
एलएनजी मुख्य रूप से मीथेन से बनी होती है जो एक प्राकृतिक गैस है. इस लिक्विड में बदलने के लिए लगभग - 162 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा किया जाता है. इस प्रक्रिया से इसका वॉल्यूम काफी कम हो जाता है, जिस वजह से इसे स्टोर करना और ट्रांसपोर्ट करना ज्यादा आसान हो जाता है.
इसके उलट पेट्रोल और डीजल सामान्य तापमान और दबाव पर लिक्विड ईंधन होते हैं. क्योंकि एलएनजी को काफी ठंडा रखना पड़ता है इस वजह से इसके लिए खास इंसुलेटेड टैंक और सावधानी से कंट्रोल किए जाने वाले हैंडलिंग सिस्टम की जरूरत होती है. इस वजह से इसका स्टोरेज और इस्तेमाल पारंपरिक रेलवे ईंधन से तकनीकी रूप से अलग होता है.

एलएनजी-डीजल फ्यूल ट्रेन कैसे काम करती है?
यह तकनीक डीजल का इस्तेमाल पूरी तरह से खत्म नहीं करती है. दरअसल इंजन को इस तरह मॉडिफाइड किया जाता है कि वह डीजल के साथ-साथ नेचुरल गैस का भी इस्तेमाल कर सके. इससे पारंपरिक ईंधन की खपत कम हो सकती है. काम करने का सटीक तरीका इंजन के डिजाइन और उसके कंट्रोल सिस्टम पर ही निर्भर होता है.
अगर एलएनजी की सप्लाई मौजूद न हो तो सही ढंग से डिजाइन किया गया डुअल फ्यूल इंजन डीजल पर चलता रह सकता है. इससे ऑपरेशन में लचीलापन मिलता है और ट्रेन को पूरी तरह से नए फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. हालांकि ईंधन बदलने की क्षमता और किन हालात में ऐसा किया जाता है यह लगाए गए खास सिस्टम पर ही निर्भर होता है.
प्रदूषण और पर्यावरण पर असर में अंतर
एलएनजी की एक बड़ी खूबी यह है कि इसमें कुछ तरह के उत्सर्जन को कम करने की क्षमता है. जलने पर नेचुरल गैस आमतौर पर डीजल की तुलना में प्रति यूनिट ऊर्जा कम कार्बन डाइऑक्साइड पैदा करती है. इसी के साथ मीथेन के जलने से सल्फर ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन भी कम होता है.
प्रदूषण में कितनी कमी आएगी यह इंजन की क्षमता, काम करने के हालात और ईंधन के मिश्रण पर निर्भर करता है. नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन भी कम हो सकता है. हालांकि इसका नतीजा तकनीक के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है. आसान शब्दों में एलएनजी पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त नहीं है.

ईंधन की खपत और ऑपरेटिंग लागत
डीजल की जरूरत के कुछ हिस्से को एलएनजी से बदलकर भारतीय रेलवे ईंधन के खर्च को कम कर सकता है. असल बचत एलएनजी की कीमत, खास उपकरणों की लागत, रखरखाव की जरूरतों और रीफ्यूलिंग सुविधाओं की उपलब्धता पर निर्भर करेगी.
रेलवे प्रोजेक्ट के लिए दिए गए आंकड़ों के मुताबिक हर ड्राइविंग पावर कार पर सालाना लगभग ₹12 लाख की बचत का अनुमान है. अगर कोई ट्रेन ऐसी दो पावर कार का इस्तेमाल करती है तो अनुमानित बचत सालाना लगभग 24 लाख तक पहुंच सकती है.
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स्टोरेज, एनर्जी डेंसिटी और रेंज
पेट्रोल और डीजल को आम ईंधन टैंकों में स्टोर किया जा सकता है जबकि एलएनजी के लिए क्रायोजेनिक स्टोरेज उपकरणों की जरूरत होती है. हालांकि वजन के हिसाब से एलएनजी में काफी ऊर्जा होती है लेकिन उतनी ही ऊर्जा देने के लिए इसे आमतौर पर डीजल की तुलना में ज्यादा स्टोरेज जगह की जरूरत होती है. इस वजह से टैंक इंसुलेशन और फ्यूल सिस्टम डिजाइन काफी जरूरी बातें हैं.
रिपोर्ट्स के मुताबिक एलएनजी टैंक की क्षमता लगभग 2200 लीटर है और एक बार पूरा भरने पर इसकी संभावित रेंज 1600 किलोमीटर तक हो सकती है. असल रेंज टैंक का इस्तेमाल करने लायक क्षमता, इंजन की क्षमता, ट्रेन के लोड, रूट और ऑपरेटिंग स्थिति पर निर्भर करेगी.
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