चुनाव आयोग क्या SIR वापस ले सकता है, क्या हैं उसके अधिकार?
वोटर लिस्ट में गड़बड़ी रोकने के लिए चुनाव आयोग के पास हैं असीमित अधिकार, जानिए क्या बीच में वापस ली जा सकती है SIR की प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट का इस पर क्या है बड़ा फैसला?

देश में वोटर लिस्ट को पारदर्शी बनाने के लिए चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण SIR अभियान को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग के इस कदम को पूरी तरह वैध और संवैधानिक करार दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक संकल्प को पूरा करने के लिए वोटर लिस्ट को अपडेट करना चुनाव आयोग का वैधानिक अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को बीच में वापस ले सकता है और इस संबंध में उसके पास क्या कानूनी अधिकार मौजूद हैं.
क्या चुनाव आयोग वापस ले सकता है SIR?
कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों के मुताबिक, चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था है, जिसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत देश में चुनाव कराने, उसका अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करने की पूरी शक्ति प्राप्त है. यदि चुनाव आयोग को जमीनी स्तर पर लगता है कि तकनीकी खामियों, प्रशासनिक दिक्कतों या किसी राज्य में कानून-व्यवस्था की असाधारण स्थिति के कारण SIR की प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से पूरी नहीं हो पा रही है, तो वह इसमें बदलाव करने, इसे स्थगित करने या अस्थायी रूप से वापस लेने का निर्णय ले सकता है.
हालांकि, चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए एक आवश्यक माना है, इसलिए चुनाव आयोग बिना किसी ठोस और असाधारण प्रशासनिक कारण के इस जनहितकारी प्रक्रिया को पूरी तरह वापस नहीं लेता है.
असाधारण परिस्थितियों में ही कदम पीछे खींचता है आयोग
हालांकि चुनाव आयोग के पास अपनी प्रक्रियाओं को वापस लेने का पूरा अधिकार है, लेकिन वह ऐसा बहुत ही दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में ही करता है. चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात को दोहराया है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए वोटर लिस्ट का शुद्ध होना एक संवैधानिक अनिवार्यता है, इसलिए आयोग इस जनहितकारी प्रक्रिया को राजनीतिक दबाव या सामान्य विरोध के कारण पूरी तरह वापस नहीं लेता है.
अधिकार क्षेत्र के मामले में आयोग पूरी तरह स्वतंत्र है कि वह इस अभियान को कब शुरू करे और कब इसे समाप्त घोषित करे. यदि किसी क्षेत्र में विसंगतियां बहुत ज्यादा बढ़ जाएं, तो आयोग वहां विशेष रूप से इस प्रक्रिया को रोककर नए सिरे से आदेश जारी कर सकता है.
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क्या चुनाव आयोग की शक्तियों पर भी कोई रोक है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया है कि चुनाव आयोग के पास असीमित अधिकार नहीं हैं. स्वतंत्र संस्था होने के बावजूद आयोग को संविधान के नियमों के दायरे में रहकर ही काम करना होगा. कोर्ट ने साफ कहा कि SIR के तहत किसी भी नागरिक का नाम वोटर लिस्ट से हटाते समय पूरी पारदर्शिता अपनानी होगी.
बिना किसी ठोस आधार या बिना किसी पूर्व सूचना के किसी भी वैध मतदाता का नाम लिस्ट से नहीं काटा जा सकता. यदि आयोग की इस प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो नागरिक कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं.
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