भारत में कैसे शुरू हुआ कॉफी का चलन, जानें इसका रोचक इतिहास?
Indian Coffee History: भारत में कॉफी का इतिहास काफी ज्यादा पुराना है. आइए जानते हैं कि यह ड्रिंक भारत तक कैसे पहुंची और इसे भारत लाने में किसका हाथ था.

- कॉफी हाउस भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग बने।
Indian Coffee History: पारंपरिक दक्षिण भारतीय फिल्टर कॉफी से लेकर एस्प्रेसो, कैपुचीनो और कोल्ड ब्रू परोसने वाले आधुनिक कैफे तक कॉफी भारत के खानपान और जीवन शैली का एक बड़ा हिस्सा बन गई है. हालांकि भारत में कॉफी का इतिहास कई सदी पुराना है. इसकी शुरुआत एक सूफी संत, कॉफी के साथ बीज और दृढ़ संकल्प की एक अद्भुत कहानी से हुई. जिसने आखिरकार भारत को दुनिया के प्रमुख कॉफी उत्पादक देशों में से एक बना दिया.
17वीं सदी के दौरान अरब देशों खासकर यमन का वैश्विक कॉफी व्यापार पर कंट्रोल था. यमन का मोचा बंदरगाह कॉफी निर्यात का एक प्रमुख केंद्र था. इसी के साथ अब व्यापारी कॉफी की खेती और व्यापार पर अपना एक अधिकार बनाए रखना चाहते थे. दूसरे देशों को कॉफी उगाने से रोकने के लिए व्यापारी सिर्फ भुने हुए या उबले हुए बीज ही एक्सपोर्ट करते थे. अब क्योंकि यह बीज अंकुरित नहीं हो सकते थे इस वजह से इनका इस्तेमाल नए कॉफी के पौधे उगाने के लिए नहीं किया जा सकता था. इस क्षेत्र से बाहर कच्चे या फिर हरे कॉफी के बीजों को ले जाने पर सख्त पाबंदी थी.
बाबा बुदान और कॉफी के साथ बीज
लगभग 1670 में बाबा बुदान तीर्थ यात्रा पर मक्का गए. वापसी की यात्रा के दौरान वे यमन के मोचा बंदरगाह पर रुके. यहां उन्होंने काफी का स्वाद चखा और इसके स्वाद और स्फूर्तिदायक गुणों से काफी प्रभावित हुए.
क्योंकि यमन से कच्चे कॉफी के बीज बाहर ले जाने पर पाबंदी थी इस वजह से कहा जाता है कि बाबा बुदान ने सात हरे कॉफी के बीजों को अपने लबादे या फिर दाढ़ी में छुपा लिया और उन्हें भारत ले आए. मशहूर कहानियों के मुताबिक उन्होंने सात बीजों को इस वजह से चुना क्योंकि इस्लाम में इस संख्या का धार्मिक महत्व है. यह साहसिक काम भारत में कॉफी की खेती के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ. सात बीजों से शुरू हुई यह चीज आखिरकार एक बड़े कृषि और व्यावसायिक उद्योग में बदल गई.

भारत में कॉफी के पहले पौधे
भारत लौटने के बाद बाबा बुदान ने कर्नाटक के चिकमगलूर की चंद्रगिरी पहाड़ियों में अपनी गुफा के पास कॉफी के सात बीज बोए. ये बीज कॉफी के पौधों में बदल गए और धीरे-धीरे आसपास के इलाकों में इसकी खेती फैल गई.
बाद में इन पहाड़ियों को उनके सम्मान में बाबा बुदानी गिरी पहाड़ियों के नाम से जाना जाने लगा. यह इलाका भारत में कॉफी की शुरुआत से जुड़े अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए पहचाना जाता है. शुरुआत में कॉफी की खेती स्थानीय इलाकों तक ही सीमित रही. हालांकि इसकी कमर्शियल क्षमता आने वाली सदियों में ब्रिटिश काल के दौरान और भी ज्यादा साफ तौर पर सामने आई.

ब्रिटिश काल के दौरान कमर्शियल खेती
18वीं और 19वीं सदी के दौरान भारत में बड़े पैमाने पर कॉफी की कमर्शियल खेती का विस्तार हुआ. अंग्रेजों ने दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में बागान स्थापित किए और कॉफी की खेती के लिए उपयुक्त जगह बनाने के लिए जंगलों को साफ किया.
कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के क्षेत्रों की अनुकूल जलवायु और प्राकृतिक बनावट ने कॉफी बागानों के विकास में मदद की. वक्त के साथ कॉफी एक जरूरी कृषि उत्पाद बन गई और इसकी खेती चिकमगलूर की पहाड़ियों में अपनी मूल जगह से आगे फैल गई.
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भारत में कॉफी हाउस का विकास
कॉफी धीरे-धीरे भारत की सामाजिक और बौद्धिक संस्कृति का भी हिस्सा बन गई. ऐसा कहा जाता है कि भारत में पहला कॉफी हाउस 1836 में खुला था. इन जगहों ने लोगों को अपने घरों से बाहर मिलने, बातचीत करने और कॉफी का आनंद लेने के लिए खास जगह दी.
पहला इंडियन कॉफी हाउस 1957 में नई दिल्ली में शुरू किया गया था. बाद में यह बुद्धिजीवी, राजनेता, लेखक और छात्रों के लिए एक मशहूर मिलन स्थल बन गया. इंडियन कॉफी हाउस के आउटलेट्स ने कॉफी को सिर्फ एक ड्रिंक से काफी ज्यादा के रूप में स्थापित करने में मदद की. इसे सार्वजनिक और सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बना दिया गया.
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