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क्या तालिबान को सरकार का दर्जा देता है भारत? जानें अफगानिस्तान से क्यों हो रही है बात

भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पहली बार अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री से फोन पर बातचीत की. यह बातचीत भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष खत्म होने के बाद हुई है, जिससे दुनियाभर की नजरें इस ओर हैं

अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी को करीब चार साल बीत चुके हैं, लेकिन इन चार सालों में अफगानिस्तान को वैश्विक समुदाय ने पूरी तरह से अलग-थलग रखा. हालांकि, अब हालात बदल रहे हैं. गुरुवार को भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पहली बार अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री मावलवी आमिर खान मुत्ताकी से फोन पर बातचीत की. यह बातचीत भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष खत्म होने के बाद हुई है, जिससे दुनियाभर की नजरें इस ओर हैं. 

दरअसल, 2021 में तालिबान के कब्जे के बाद दुनिया के सभी देशों ने अफगानिस्तान के साथ अपने द्विपक्षीय रिश्ते खत्म कर लिए थे. इसमें भारत भी शामिल था, लेकिन अब एस.जयशंकर और तालिबानी नेता के बीच हुई सीधी बातचीत से यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या भारत ने तालिबान को सरकार का दर्जा दे दिया है? चलिए जानते हैं कि तालिबान को लेकर भारत का क्या रुख है और भारत और अफगानिस्तान के बीच बातचीत क्यों हो रही है? 

अफगानिस्तान पर बदल रहा दुनिया का रुख

अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान का कब्जा हुए करीब चार बीत चुके हैं. 15 अगस्त, 2021 में तालिबान ने गनी की सरकार को गिराकर काबुल पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद दुनिया के लगभग सभी देशों ने तालिबान में अपने दूतावास बंद कर दिए थे और द्विपक्षीय रिश्तों को भी खत्म कर लिया था. हालांकि, अब दुनिया का रुख तालिबान की प्रति बदल रहा है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण बीते साल रूस द्वारा तालिबान को आतंकी संगठन की सूची से हटाना था. 2003 में रूस ने तालिबान को आतंकी संगठन घोषित किया था, लेकिन दिसंबर, 2024 में रूस ने तालिबान को इस सूची से हटा दिया था. 

भारत का क्या है रुख?

भारत और अफगानिस्तान के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं और अशरफ गनी की सरकार के समय दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रिश्ते भी बेहतर थे, लेकिन तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के बाद भारत ने तालिबान के साथ अपने संबंधों को खत्म कर लिया था. हालांकि, अब वक्त बदल रहा है. अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार के साथ भारत की बातचीत की शुरुआत इसी साल जनवरी में हुई थी. जनवरी में विक्रम मिसरी और मुत्ताकी के बीच दुबई में बातचीत हुई थी. इसके बाद विदेश मंत्रालय के ज्वाइंटर सेक्रेटरी आनंद प्रकाश ने 28 अप्रैल को मुत्ताकी से मुलाकात की थी. अब विदेश मंत्री जयशंकर ने खुद तालिबान के विदेश मंत्री से बातचीत की है. हालांकि, अभी तक भारत की ओर से औपचारिक रूप से तालिबान की सरकार को मान्यता नहीं दी गई है. 

क्यों हो रही तालिबान से बात

तालिबान के सत्ता में आने के बाद से ही पाकिस्तान से उसकी ठनी हुई है. ऐसे में भारत और अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के बीच शुरू हो रही यह बातचीत पाकिस्तान जैसे दुश्मन को रणनीतिक रूप से घेरने के रूप में देखी जा रही है. दरअसल, अफगानिस्तान ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले की निंदा की थी. इसके बाद जब पाकिस्तान की ओर से कहा गया कि भारत ने अफगानिस्तान को निशाना बनाकर मिसाइल हमला किया, तो खुद तालिबान की सरकार ने इसका खंडन कर दिया था. 

यह भी पढ़ें: क्या वाकई ब्रह्मोस को कोई भी डिफेंस सिस्टम नहीं कर सकता है इंटरसेप्ट? कांपते हैं बड़े-बड़े देश

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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