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Delimitation Commission India: देश में अब तक कितनी बार हो चुका परिसीमन आयोग का गठन, जानें क्या-क्या हुए बदलाव?

Delimitation Commission India: केंद्र सरकार परिसीमन लाने की तैयारी कर रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि भारत में अब तक कितनी बार परिसीमन किया गया है और इसमें क्या बदलाव आए हैं.

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  • 1976 से 2026 तक सीटों की संख्या बढ़ाने पर रोक लगी।

Delimitation Commission India: केंद्र सरकार द्वारा 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की संख्या को बढ़ाने के लिए परिसीमन के प्रक्रिया तेज कर दी गई है. ऐसा कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार इस हफ्ते के अंत तक परिसीमन आयोग विधेयक और संवैधानिक संशोधन पेश करने की योजना बना रही है.  इसी बीच आइए जानते हैं कि भारत में असल में कितनी बार परिसीमन किया गया है और इन सालों में इसमें क्या बड़े बदलाव आए हैं.

परिसीमन आयोग क्या है? 

भारत में परिसीमन का मतलब है संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया.  ऐसा इसलिए ताकि जनसंख्या में हुए बदलावों को दर्शाया जा सके. संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत सांसद हर जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम पारित करता है. इसके आधार पर राष्ट्रपति एक परिसीमन आयोग का गठन करता है. अब तक भारत के इतिहास में इस आयोग का गठन चार बार किया जा चुका है. 

आयोग का गठन कब-कब हुआ?

परिसीमन आयोग का गठन चार अलग-अलग चरणों में किया गया है. 

1952 में परिसीमन आयोग अधिनियम, 1952 के तहत
1963 में परिसीमन आयोग अधिनियम, 1962 के तहत 
1973 में परिसीमन अधिनियम, 1972 के तहत
2002 में परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत 

दिलचस्प बात यह है कि उस समय लिए गए नीतिगत फैसलों की वजह से 1981 और 1991 की जनगणना के बाद किसी भी आयोग का गठन नहीं किया गया था.

शुरुआत में सीटों की संख्या कैसे बढ़ी?

आजादी के बाद की शुरुआती दशकों में परिसीमन के परिणामस्वरुप लोकसभा सीटों की संख्या में सीधे तौर पर बढ़ोतरी हुई. 1951 की जनगणना के बाद सीटों की संख्या 489 से बढ़कर 494 हो गई. 1961 की जनगणना के बाद यह संख्या बढ़कर 522 हो गई. इसी के साथ 1971 की जनगणना के बाद यह बढ़कर मौजूदा संख्या 543 तक पहुंच गई.

सीटों की संख्या क्यों फ्रिज की गई थी? 

1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन के जरिए एक बड़ा बदलाव आया था. सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण उपायों को बढ़ावा देने के लिए 2001 तक लोकसभा सीटों की संख्या को फ्रीज करने का फैसला किया.  बाद में 2001 में 84वें संशोधन के जरिए इस रोक को 2026 तक बढ़ा दिया गया. इसका मतलब है कि भले ही जनसंख्या बढ़ती रही सीटों की संख्या में कोई भी बदलाव नहीं हुआ. 

2002 के परिसीमन की क्या खासियत थी? 

2002 में गठित परिसीमन आयोग ने 2001 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया. हालांकि इसमें लोकसभा सीटों की कुल संख्या में बढ़ोतरी नहीं की गई और इसे 543 पर ही स्थिर रखा गया. इसका मुख्य उद्देश्य सीटों की संख्या बढ़ाने के बजाय निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं को समायोजित करके जनसंख्या के प्रतिनिधित्व को संतुलित करना था. 

सीटों के आरक्षण में भूमिका 

परिसीमन आयोग की प्रमुख जिम्मेदारियों में से एक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या को तय करना है. यह आवंटन उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी के आधार पर किया जाता है. जिससे अलग-अलग क्षेत्र में निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिनिधित्व पक्का हो सके.

यह भी पढ़ें: मिडिल ईस्ट में जंग के बीच भारत ने कर ली तैयारी, नौसेना में शामिल होगा INS तारागिरी, जानें इसकी ताकत

स्पर्श गोयल एबीपी लाइव के साथ कंटेंट राइटर के तौर पर जुड़े हुए हैं. वह जनरल नॉलेज बीट की जिम्मेदारी संभालते हैं. कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में उन्हें चार साल का अनुभव है. एबीपी से पहले वह डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद में करीब दो साल तक काम कर चुके हैं. उन्होंने नमस्कार भारत से अपने करियर की शुरुआत की थी. .

वह अलग-अलग विषयों पर रिसर्च करके पाठकों के लिए जानकारी को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण अंदाज में पेश करते हैं. उन्होंने न्यूज राइटिंग के साथ-साथ स्क्रीनराइटिंग में भी अपनी पकड़ मजबूत की.

उन्होंने मां शाकुम्भरी यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है. इसके साथ उन्होंने एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलिविजन से स्क्रीनप्ले का डिप्लोमा भी हासिल किया है.

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