भारत में फांसी के लिए कितनी पेंडेंसी? देखें आंकड़े
देश में फांसी की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. चलिए जानते हैं कि कानूनी प्रक्रिया में देरी के कारण अदालतों में दया याचिकाओं और डेथ वारंट के कितने मामले लंबित हैं.

मेरठ का वो खौफनाक नीला ड्रम केस, जिसने पूरे देश की रूह कंपा दी थी, एक बार फिर सुर्खियों में है. इस हत्याकांड के मुख्य आरोपी मुस्कान के साथी साहिल को जब हाल ही में अदालत ने फांसी का सजा सुनाई, तो पीड़ित परिवार को बड़ी राहत मिली. लेकिन इस फैसले ने एक बड़े सवाल को फिर से जिंदा कर दिया है, क्या ट्रायल कोर्ट का फैसला आते ही दोषियों को फंदे पर लटका दिया जाता है. आइए जानते हैं, इस सवाल का जवाब और देश की जेलों में सालों से फांसी का इंतजार कर रहे कैदियों की पेंडेंसी के आंकड़े को.
एक ही साल में 128 नए मामले और निचली अदालतों का ट्रेंड
फांसी के मामलों में पेंडेंसी बढ़ने की मुख्य वजह निचली अदालतों द्वारा तेजी से मौत की सजा सुनाया जाना है. कानूनी सुधारों और मानवाधिकारों पर काम करने वाले प्रतिष्ठित संगठन द स्क्वायर सर्कल क्लीनिक पूर्व में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली का प्रोजेक्ट 39A की रिपोर्ट के अनुसार आंकड़ों के मुताबिक, अकेले एक ही साल में देश के ट्रायल कोर्ट्स द्वारा 128 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई.
अगर अपराध की श्रेणियों के हिसाब से आकड़ों को देखें, तो कुल मृत्युदंड के मामलों में से 52.34 प्रतिशत मामले हत्या से जुड़े हुए थे, जबकि 36.71 प्रतिशत मामले बच्चों और महिलाओं के साथ जघन्य यौन अपराधों से संबंधित थे. इन आंकड़ों से साफ है कि जघन्य मामलों में निचली अदालतें लगातार सख्त रुख अपना रही हैं.
उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत सबसे आगे
मृत्युदंड के आंकड़ों को अगर राज्यवार देखा जाए, तो पेंडेंसी के मामले में देश के कुछ राज्य अन्य राज्यों के मुकाबले काफी आगे हैं. पूरे भारत में उत्तर प्रदेश इस सूची में सबसे ऊपर बना हुआ है. जहां जेलों में फांसी का इंतजार कर रहे कैदियों की संख्या सबसे अधिक 121 दर्ज की गई है.
उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात दूसरे नंबर पर आता है, जहां 69 कैदी डेथ रो पर हैं. इसके बाद हरियाणा का नंबर है, जहां 42 कैदियों को फांसी की सजा सुना दी जा चुकी है. उत्तर भारत के इन राज्यों में बढ़ती पेंडेंसी यह दर्शाती है कि यहां के ट्रायल कोर्ट्स द्वारा बड़े मामलों में मृत्युदंड का विकल्प ज्यादा चुना जा रहा है.
ऊपरी अदालतों से निपटारे की बेहद धीमी रफ्तार
पेंडेंसी का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा देश की उच्च अदालतों और सुप्रीम कोर्ट से सामने आता है. आंकड़ों के मुताबिक, एक साल के भीतर देश के विभिन्न हाई कोर्ट्स द्वारा 112 मृत्युदंड के मामलों पर सुनवाई की गई और फैसला सुनाया गया. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हाई कोर्ट्स ने ट्रायल कोर्ट्स द्वारा दी गई फांसी की सजाओं में से केवल 8.31 प्रतिशत मामलों में ही सजा को बरकरार रखा.
बाकी के मामलों में या तो सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया या केदियों को बरी कर दिया गया. वहीं देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की बात करें, तो उसने अपने सामने आए कुल मामलों में से 62.5 प्रतिशत मामलों में कैदियों को पूरी तरह बरी कर दिया.
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जेल में औसतन 9 साल लंबा इंतजार
अदालती आंकड़ों की सबसे बड़ी दिक्कत समय को लेकर है, जो पेंडेंसी को और गंभीर बनाती है. रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, जिन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने कैदियों को पूरी तरह बरी किया, उन कैदियों ने औसतन 9 साल का एक लंबा समय जेल की कालकोठरी में सिर्फ अपनी फांसी की सजा के फैसले के इंतजार में काट दिया था. यह समय ट्रायल कोर्ट द्वारा सजा सुनाए जाने से लेकर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक का है. इसके अलावा, राष्ट्रपति के पास जाने वाली दया याचिकाओं के निपटारे का समय भी इस पेंडेंसी को कई साल आगे बढ़ा देता है.
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