चुनाव आयुक्त को पद से कैसे हटा सकते हैं, क्या है महाभियोग का प्रोसेस?
मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित महाभियोग प्रस्ताव के बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाया जाता है, जबकि अन्य आयुक्तों को CEC की सिफारिश पर हटाया जाता है.

देशभर में चल रही SIR प्रक्रिया के बीच चुनाव आयोग एक बार फिर चर्चा में है. यह चर्चा तब जोर पकड़ी जब एक मीडिया रिपोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य दो चुनाव आयुक्तों के बीच आंतरिक फैसलों को लेकर मतभेद का दावा किया गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने बीते 10 महीनों में 14 लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं, लेकिन CEC ज्ञानेश कुमार एकतरफा फैलसे लेते रहे.
ऐसे में देश में चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो रहे हैं. सोशल मीडिया से लेकर विपक्ष ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है. इस बीच आइए जानते हैं कि देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का पद कितना ताकतवर है और इन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया क्या है?
किन कारणों पर हटाया जा सकता है?
संविधान के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ दो ही गंभीर आधारों पर पद से हटाया जा सकता है. अगर अधिकारी पर भ्रष्टाचार, किसी गलत काम में शामिल होने या अपने पद का दुरुपयोग करने के गंभीर आरोप सही साबित होते हैं. और अगर शारीरिक या मानसिक रूप से अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है.
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संसद में महाभियोग की पूरी प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की ताकत केवल देश की संसद के पास होती है.
1. पहला चरण- इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए संसद के किसी भी सदन लोकसभा या राज्यसभा में प्रस्ताव लाना होता है. अगर प्रस्ताव लोकसभा में लाया जा रहा है, तो कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर होने जरूरी हैं, और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं. इसके बाद सदन के अध्यक्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं. प्रस्ताव स्वीकार होने पर आरोपों की जांच के लिए जजों और विशेषज्ञों की एक तीन सदस्यीय कमेटी बनाई जाती है.
2. दूसरा चरण- जांच कमेटी अगर मुख्य चुनाव आयुक्त को दोषी पाती है, तो उस रिपोर्ट पर संसद के दोनों सदनों में विस्तार से चर्चा और बहस होती है. इसके बाद सबसे मुश्किल चरण यानी वोटिंग होती है. प्रस्ताव को पास करने के लिए दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत की जरूरत होती है. वोटिंग के दिन सदन में मौजूद और वोट देने वाले सांसदों का दो-तिहाई बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में होना चाहिए.
3. तीसरा चरण- जब दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा से यह प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से अलग-अलग पास हो जाता है, तो इसे अंतिम मंजूरी के लिए देश के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और आदेश जारी होने के तुरंत बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने पद से हटना पड़ता है.
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