क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को बाकी चुनाव आयुक्त से ज्यादा मिलती है सैलरी? जानें यहां
Chief Election Commissioner Salary: भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त की सैलरी को लेकर एक बार फिर से चर्चा छिड़ चुकी है. आइए जानते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को कितनी सैलरी मिलती है.

- मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों का वेतन-भत्ता समान होता है।
- निर्णय लेने में सभी आयुक्तों के पास समान वोटिंग शक्ति होती है।
- हटाने की प्रक्रिया में मुख्य अंतर: CEC को विशेष सुरक्षा।
Chief Election Commissioner Salary: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच भारत के चुनाव आयुक्तों की शक्तियों, वेतन और सेवा की शर्तों पर सवाल उठे हैं. जहां विपक्षी दलों ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर के इस्तीफा से लेकर उनकी गिरफ्तारी तक की मांग की है, वहीं एक बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को दूसरे चुनाव आयुक्तों से ज्यादा वेतन मिलता है?
इसका जवाब है नहीं. भारत के चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त को बराबर वेतन दिया जाता है और उनके पास वोटिंग की बराबर शक्तियां होती हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त को एक जैसा वेतन
मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त अधिनियम 2023 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर वेतन मिलता है. रिपोर्ट के मुताबिक तीनों आयुक्तों का मूल मासिक वेतन ₹2.5 लाख है. उन्हें महंगाई भत्ता, सरकारी आवास, वहां और दूसरी आधिकारिक सुविधाओं जैसे समान लाभ मिलते हैं. इसका मतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को सिर्फ इस वजह से ज्यादा मूल वेतन नही दिया जाता क्योंकि वह चुनाव आयोग के प्रमुख होते हैं.

क्या सभी चुनाव आयुक्तों के पास बराबर शक्तियां होती हैं?
हालांकि मुख्य चुनाव आयुक्त चुनाव आयोग के प्रमुख के तौर पर काम करते हैं लेकिन फैसला लेते समय मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों के पास वोटिंग के बराबर अधिकार होते हैं.
चुनाव आयोग आमतौर पर सामूहिक फैसला लेने की प्रक्रिया से काम करता है. जब आयुक्त किसी आम सहमति पर नहीं पहुंच पाता तो बहुमत की राय के आधार पर फैसला लिया जा सकता है. इस वजह से आयोग के प्रमुख के तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त का पद उन्हें दूसरे चुनाव आयुक्तों की तुलना में अपने आप कोई अतिरिक्त वोट नहीं देता.

मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त के बीच क्या फर्क है?
जहां वेतन और वोटिंग की शक्तियां बराबर हैं, वहीं मुख्य अंतर उन्हें हटाने की प्रक्रिया में आता है.
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना
मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया से पद से हटाया जा सकता है जिसका इस्तेमाल सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए किया जाता है. इसमें एक सख्त संवैधानिक प्रक्रिया शामिल होती है.
दूसरे चुनाव आयुक्त को हटाना
किसी चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश की जरूरत होती है. इससे मुख्य चुनाव आयुक्त पर लागू होने वाले हटाने से जुड़े सुरक्षा उपाय और दूसरे आयुक्त पर लागू होने वाले सुरक्षा उपाय के बीच अंतर पैदा होता है.
चुनाव आयुक्त का कार्यकाल कितना होता है?
रिपोर्ट के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त का कार्यकाल ज्यादा से ज्यादा 6 साल या फिर 65 साल की उम्र तक हो सकता है, इनमें से जो भी पहले हो.
कार्यकाल का यह नियम दोनों पदों पर लागू होता है भले ही उन्हें हटाने की प्रक्रिया अलग-अलग हो. मुख्य चुनाव आयुक्त को दूसरे चुनाव आयुक्त से ज्यादा वेतन नहीं मिलता. तीनों को ₹2.5 लाख का एक समान मासिक वेतन दिया जाता है, साथ ही समान सुविधाएं और सामान वोटिंग के अधिकार भी दिए जाते हैं.
मुख्य अंतर उनके वेतन या फिर वोटिंग अधिकार का नहीं बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया का है. इन अंतरों को समझने से भारत के चुनाव आयोग की संरचना और कामकाज को समझने में मदद मिलती है.
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निर्वाचन आयोग की संरचना
साल 1950 से 1989 तक चुनाव आयोग सिर्फ एक सदस्यीय निकाय था. इसमें सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त होता था. अक्टूबर 1993 में इसे तीन सदस्यीय निकाय बना दिया गया था. आज आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश मुताबिक फैसले लेने के मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त बाकी आयुक्तों से बड़े नहीं हो जाते. मुख्य चुनाव आयुक्त सिर्फ आयोग के अध्यक्ष के रूप में बैठक की अध्यक्षता करते हैं.
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