Balotra Refinery Fire: कौन है बालोतरा की रिफाइनरी यूनिट का मालिक, जानें किसके पास कितना हिस्सा?
Balotra Refinery Fire: बालोतरा की पचपदरा रिफाइनरी भारत की ऊर्जा सुरक्षा और पेट्रोरसायन आत्मनिर्भरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यह प्रोजेक्ट 2013 में शुरू हुआ था, जो आज देश के लिए नई मिसाल है.

- बालोतरा रिफाइनरी भारत की ऊर्जा जरूरतों का नया प्रतीक है.
- एचपीसीएल राजस्थान रिफाइनरी लिमिटेड (HRRL) रिफाइनरी का मालिक है.
- एचपी (HP) की 74% हिस्सेदारी, राजस्थान सरकार की 26% हिस्सेदारी.
- 90 लाख टन वार्षिक तेल शोधन क्षमता, 24 लाख टन पेट्रोरसायन उत्पादन.
Balotra Refinery Fire: राजस्थान के बालोतरा जिले के पचपदरा में स्थित रिफाइनरी परिसर महज एक औद्योगिक ढांचा नहीं, बल्कि भारत की बदलती ऊर्जा जरूरतों का नया प्रतीक बन गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को समर्पित की जाने वाली यह परियोजना न केवल देश के ऊर्जा क्षेत्र में नई जान फूंकेगी, बल्कि पेट्रोरसायन उत्पादन में आत्मनिर्भरता का बड़ा संकल्प भी है. लेकिन पीएम के उद्घाटन से ठीक एक दिन पहले इसमें आग लग गई है. आग और ज्यादा न फैले इसके लिए खास कदम उठाए गए हैं. अब इस बीच यह जानना जरूरी है कि करीब 80 हजार करोड़ रुपये के निवेश वाली इस विशाल इकाई की कमान किसके पास है, इसमें हिस्सेदारी का गणित क्या है, और इसका मालिक कौन है.
कौन है पचपदरा रिफाइनरी का असली मालिक?
बालोतरा स्थित इस अत्याधुनिक रिफाइनरी एवं पेट्रोरसायन परिसर का स्वामित्व एचपीसीएल राजस्थान रिफाइनरी लिमिटेड (HRRL) के पास है. यह कोई निजी कंपनी नहीं, बल्कि एक ज्वॉइन्ट वेंचर है, जिसे भारत सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) और राजस्थान सरकार ने मिलकर तैयार किया है. इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य भारत की तेल शोधन क्षमता को बढ़ाना और भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करना है.
हिस्सेदारी का सटीक गणित क्या है?
इस बड़े उपक्रम में मालिकाना हक का बंटवारा दोनों साझेदारों के बीच तय अनुपात में है. इसमें हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) की बहुसंख्यक हिस्सेदारी 74 प्रतिशत है, जो इसे इस परियोजना का मुख्य संचालक बनाती है. वहीं, शेष 26 प्रतिशत हिस्सेदारी राजस्थान सरकार की है. यह संयुक्त भागीदारी राज्य के औद्योगिक विकास और केंद्र के ऊर्जा सुरक्षा विजन का एक आदर्श मेल है, जो आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाएगा.
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कब पड़ी थी इसकी नींव?
इस रिफाइनरी का सफर विवादों और बदलावों से भरा रहा है. इसकी नींव सबसे पहले 22 सितंबर, 2013 को तत्कालीन यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने उस समय की अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में रखी थी. तब इसकी शुरुआती अनुमानित लागत 37,230 करोड़ रुपये थी. हालांकि, समय बीतने और सरकारें बदलने के साथ परियोजना का स्वरूप और बजट दोनों में बदलाव आए. अंततः 16 जनवरी, 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका कार्यभार संभाला और प्रोजेक्ट को नई गति दी. संशोधनों के बाद, आज यह प्रोजेक्ट 79,450 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का एक विशाल परिसर बन चुका है.
ग्लोबल स्टैंडर्ड का अत्याधुनिक प्लांट
यह रिफाइनरी केवल कच्चा तेल साफ करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पेट्रोरसायन उत्पादन में भी ग्लोबल मानकों पर खरी उतरती है. इसकी वार्षिक तेल शोधन क्षमता 90 लाख टन है, जबकि पेट्रोरसायन उत्पादन में यह 24 लाख टन प्रति वर्ष की दर से काम करेगी. इसका नेल्सन जटिलता सूचकांक 17.0 है, जो तकनीकी रूप से इसे दुनिया की सबसे कुशल रिफाइनरियों की कतार में खड़ा करता है. पेट्रोरसायन क्षेत्र में 26 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान इसे आत्मनिर्भर भारत के लिए एक गेम-चेंजर साबित करता है.
राजस्थान के लिए क्यों है यह ऐतिहासिक?
पचपदरा रिफाइनरी न केवल राजस्थान के औद्योगिक मानचित्र को बदलेगी, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर हजारों रोजगार के अवसर भी पैदा करेगी. कच्चे तेल के शोधन से लेकर प्लास्टिक, रबर और अन्य रसायनों के निर्माण तक, यह इकाई पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को एक नई रफ्तार देगी. ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से देखें, तो यह केंद्र सरकार का एक दूरदर्शी कदम है, जो आयात पर भारत की निर्भरता को कम करने में बड़ी मदद करेगा.
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Source: IOCL



























