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ISRO Technology: सैटेलाइट से कैसे खोजा जाता है गोला-बारूद, माओवादियों का खजाना ढूंढन के लिए एक्टिव हुआ इसरो

ISRO Technology: माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन खजाना शुरू किया गया है. इस ऑपरेशन में इसरो की मदद कर रहा है. आइए जानते हैं इस बारे में पूरी जानकारी.

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  • सुरक्षा बल 'ऑपरेशन खजाना' से माओवादियों के गुप्त धन-हथियार खोज रहे हैं।
  • ISRO के सैटेलाइट घने जंगल में छिपी नकदी, विस्फोटक का पता लगाएँगे।
  • SAR तकनीक, थर्मल सेंसर, पुराने-नए चित्रों से संदिग्ध ठिकानों की पहचान होगी।
  • ड्रोन, ग्राउंड रडार और मेटल डिटेक्टर से पुख्ता तलाशी अभियान चलेगा।

ISRO Technology: माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन तेज करने के बाद सुरक्षा बलों ने अब ऑपरेशन खजाना नाम से एक खास मिशन शुरू किया है. इसका मकसद छिपे हुए हथियारों, विस्फोटकों और नकदी का पता लगाना है. इनके बारे में माना जाता है कि उन्हें घने जंगलों के अंदर जमीन में गहराई तक दबाकर रखा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक माना जा रहा है कि माओवादियों ने जमीन के नीचे ₹200 करोड़ से ज्यादा के विस्फोटक और नकदी छिपा रखी है. इन छिपे हुए ठिकानों का पता लगाने के लिए एजेंसियां अब आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रही हैं. इनमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के सैटेलाइट, ड्रोन, ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार और गहरे मेटल डिटेक्टर शामिल हैं. 

किस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं इसरो के सैटेलाइट?

इस्तेमाल की जा रही मुख्य तकनीकों में से एक है सिंथेटिक अपर्चर रडार. सामान्य सैटेलाइट कैमरे अक्सर घने जंगलों के नीचे की तस्वीर लेने में नाकाम रहते हैं.  ऐसा इसलिए क्योंकि ऊंचे ऊंचे पेड़ ऊपर से दिखने वाली चीजों को रोक देते हैं. इस समस्या को हल करने के लिए इसरो का RISAT-2B सैटेलाइट SAR तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. यह तकनीक बादलों, अंधेरे और घनी वनस्पति की परतों को भेदकर जमीन की सतह का अध्ययन कर सकते हैं. इससे एजेंसियों को जंगलों की घनी छतरी के नीचे छिपे असामान्य पैटर्न या फिर गड़बड़ियों की पहचान करने में मदद मिलती है. 

थर्मल सेंसर का काम 

 जब बड़ी मात्रा में हथियार, विस्फोटक या फिर नकदी जमीन के नीचे दबाई जाती है तो उस इलाके की मिट्टी की बनावट और तापमान में बदलाव आ जाता है. सैटेलाइट आधारित थर्मल सेंसर तापमान में होने वाले इन छोटे-छोटे अंतरों की पहचान कर सकते हैं, जिन्हें थर्मल सिग्नेचर कहा जाता है. अगर ताजा खोदी गई मिट्टी या फिर जमीन में दबाए गए बक्सों से आस-पास की जमीन के मुकाबले असामान्य गर्मी निकलती है, तो सैटेलाइट उस इलाके को संदिग्ध के तौर पर चिन्हित कर सकते हैं.

पुराने और नए सैटेलाइट चित्रों की तुलना 

सुरक्षा एजेंसियां माओवाद प्रभावित इलाकों के पुराने और हाल के सैटेलाइट चित्रों से का भी अध्ययन करती हैं. अगर घने जंगलों के अंदर अचानक कोई नया रास्ता दिखाई देता है या फिर किसी खास जगह पर मिट्टी में कोई हलचल नजर आती है तो ये बदलाव जमीन के नीचे चल रही किसी छिपी हुई गतिविधि का संकेत हो सकते हैं. 

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ड्रोन और ग्राउंड रडार की मदद

एक बार जब सैटेलाइट किसी इलाके को संदिग्ध तौर पर पहचान लेते हैं तो इसकी पुष्टि करने के लिए जमीन पर आधारित कई तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. थर्मल ड्रोन हवाई स्कैन करके लक्ष्य के बारे में ज्यादा सटीक जानकारी देते हैं. इसके बाद जमीन पर मौजूद टीमें ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल करती हैं. यह रडार जमीन की सतह के नीचे रडार तरंगे भेजकर छिपी हुई चीजों या फिर जमीन के नीचे बनी संरचना का पता लगाता है. 

हथियार खोजने के लिए मेटल डिटेक्टर का इस्तेमाल 

बम निरोधक दस्ते की टीमें भी जमीन के नीचे दबे हथियारों, गोला बारूद, लैंडमाइन या धातु के कंटेनरों का पता लगाने के लिए एडवांस्ड गहरे मेटल डिटेक्टरों का इस्तेमाल करती हैं.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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