होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से क्या चीन में भी एलपीजी की किल्लत, वहां कितने दिन में मिल रहा सिलेंडर?
होर्मुज की नाकेबंदी ने वैश्विक तेल व्यापार को हिला दिया है. चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस रास्ते पर निर्भर है, लेकिन अपने विशाल रणनीतिक भंडार, और वैकल्पिक आपूर्ति के जरिए वहां इतना संकट नहीं है.

- ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी ने वैश्विक तेल बाजार में हलचल मचा दी है.
- चीन अपनी 40-48% ऊर्जा इसी रास्ते से मंगाता है, संकट में है चीन की सप्लाई.
- चीन के पास 130 दिनों का तेल-गैस भंडार, एलपीजी की किल्लत नहीं.
- रूस, वैकल्पिक मार्ग और इलेक्ट्रिक वाहनों से चीन ने बनाई ऊर्जा सुरक्षा.
दुनिया की ऊर्जा धमनियों में से एक होर्मुज स्ट्रेट, एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सैन्य तनाव का केंद्र बन गई है. ईरान के अप्रत्याशित फैसलों ने वैश्विक तेल बाजार में हलचल पैदा कर दी है. ओमान के करीब जहाजों पर हुई फायरिंग और स्ट्रेट की नाकेबंदी से न केवल तेल की कीमतों में आग लगी है, बल्कि सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता, चीन, भी इस संकट की चपेट में है? क्या वहां भी घरों में जलने वाली गैस की किल्लत शुरू हो रही है?
होर्मुज स्ट्रेट का ईरान-चीन कनेक्शन
होर्मुज जलडमरूमध्य महज एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक तेल व्यापार की रीढ़ है. चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 40 से 48 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से मंगाता है. ईरान द्वारा स्ट्रेट को बंद करने का सीधा मतलब चीन की उस सप्लाई लाइन पर चोट करना है जो उसकी अर्थव्यवस्था को चलाती है. हालांकि, ईरान ने यह कदम अमेरिकी नाकेबंदी के जवाब में उठाया है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव डाल रहे हैं. चीनी बंदरगाहों तक पहुंचने वाले टैंकरों का रास्ता अवरुद्ध होने का मतलब है कि चीन को अब अपनी लॉजिस्टिक और आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह बदलना होगा.
चीन के पास कितना तेल और गैस का भंडार?
चीन भारत की तुलना में इस संकट से बेहतर तरीके से निपट रहा है, जिसका सबसे बड़ा कारण उसका विशाल रणनीतिक तेल भंडार है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, चीन के पास 130 दिनों से भी अधिक का कच्चा तेल और गैस का भंडार मौजूद है. यह सुरक्षा कवच उसे तात्कालिक झटकों से बचाता है. यही कारण है कि वहां भारत की तरह एलपीजी की भारी किल्लत या सिलेंडर के लिए हफ्तों का इंतजार जैसी स्थितियां फिलहाल नहीं बनी हैं. चीन ने होर्मुज जैसे तनावों को पहले ही भांप लिया था, इसलिए उसने काफी पहले से तेल और गैस की स्टॉकपाइलिंग कर रखी है.
क्या चीन में एलपीजी सिलेंडर की किल्लत है?
सीधे शब्दों में कहें, तो चीन में एलपीजी सिलेंडर मिलने की कोई निश्चित समयसीमा या दिनों की कमी जैसी समस्या अभी नहीं है. वहां के आम नागरिकों को सिलेंडर मिलने में कोई अभूतपूर्व देरी नहीं हो रही है. चीन की सरकार ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को इस तरह डिजाइन किया है कि वह अचानक आए किसी भी समुद्री अवरोध को झेल सके. वहां की आपूर्ति व्यवस्था में लचीलापन है और वे होर्मुज स्ट्रेट के विकल्प के रूप में अन्य आपूर्तिकर्ताओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. संक्षेप में कहें तो चीन इस संकट से प्रभावित जरूर है, लेकिन वह घुट नहीं रहा है.
रूस और वैकल्पिक रास्तों का सहारा
होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ती निर्भरता को कम करने के लिए चीन ने वर्षों पहले रूस के साथ मजबूत पाइपलाइन नेटवर्क विकसित किया था. आज, चीन का एक बड़ा हिस्सा अपनी ऊर्जा जरूरतें जमीनी मार्गों और पाइपलाइनों के जरिए पूरी कर रहा है, जो समुद्र के रास्ते से पूरी तरह स्वतंत्र हैं. यह वैकल्पिक रास्ता चीन के लिए इस संकट के दौर में सबसे बड़ा गेम-चेंजर साबित हो रहा है. इतना ही नहीं, चीन अमेरिका जैसे देशों से भी इथेन का रिकॉर्ड आयात कर रहा है, जो उसकी एलपीजी और नेफ्था की कमी को भरने का काम कर रहा है.
इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़ता क्रेज और गैस की खपत में कमी
चीन में पिछले कुछ वर्षों में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. इसका सीधा असर वहां की पारंपरिक ईंधन खपत पर पड़ा है. जैसे-जैसे चीनी नागरिक पेट्रोल-डीजल की जगह इलेक्ट्रिक वाहनों को चुन रहे हैं, ऊर्जा की मांग का पैटर्न भी बदल गया है. हालांकि एलपीजी की वैश्विक कीमतों में उछाल ने चीन की जेब पर असर जरूर डाला है, लेकिन परिवहन और घरेलू स्तर पर ईंधन की मांग में आई गिरावट ने चीन को इस आपूर्ति संकट से निपटने के लिए एक बफर प्रदान किया है. मार्च 2026 में खपत में 13 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद, चीन का सिस्टम अभी भी स्थिर बना हुआ है.
नाकेबंदी लंबी खिंची तो होगा असर
होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना निश्चित रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत है. हालांकि चीन फिलहाल सुरक्षित स्थिति में है, लेकिन अगर यह नाकेबंदी लंबी खिंची, तो वैश्विक बाजार में एलपीजी की कीमतें और अधिक बढ़ सकती हैं, जिसका असर चीन के साथ-साथ दुनिया के बाकी देशों पर भी पड़ेगा. चीन के लिए यह समय अपनी ऊर्जा निर्भरता को और अधिक विविध बनाने का है. यह देखना दिलचस्प होगा कि चीन आगे चलकर अपनी इस निर्भरता को कैसे कम करता है, ताकि होर्मुज जैसे किसी भी समुद्री विवाद का उसकी घरेलू रसोई पर कोई बुरा असर न पड़े.

























