क्या है अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल, कैसे बन रही और कितनी जरूरी? जानें किन देशों का होगी हिस्सा
अफ्रीका में सहारा रेगिस्तान बढ़ता ही जा रहा है और जमीने बंजर हो रही हैं. इस परिवर्तन को रोकने को लिए और जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए अफ्रीकी संघ वहां पर एक हरी दीवार खड़ी कर रहा है.

चीन की एतिहासिक दीवार के बारे में तो दुनिया में सभी जानते हैं, लेकिन अब अफ्रीका महाद्वीप पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक नया वैश्विक रिकॉर्ड बनाने की तैयारी में जुटा है. यहां करीब 8000 किलोमीटर लंबी ग्रेट ग्रीन वॉल यानी पौधों की एक विशालकाय हरी दीवार खड़ी की जा रही है. यह महत्वाकांक्षी परियोजना सहारा रेगिस्तान के दक्षिणी छोर पर स्थित अर्ध-शुष्क साहेल क्षेत्र में बनाई जा रही है. इसका मुख्य उद्देश्य केवल पेड़-पौधे लगाना ही नहीं, बल्कि तेजी से बंजर हो रही जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाना, स्थानीय लोगों को रोजगार देना और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के खतरों से मजबूती से लड़ना है.
मरुस्थलीकरण को रोकने की अनोखी हरित दीवार
अफ्रीका का साहेल क्षेत्र सीधे तौर पर सहारा रेगिस्तान से सटा हुआ है, जिसके कारण वहां का तापमान वैश्विक औसत तापमान के मुकाबले 1.5 गुना ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. अत्यधिक गर्मी और लगातार पड़ते भीषण सूखे की वजह से इस इलाके की मिट्टी की पूरी उर्वरता नष्ट हो चुकी थी और फसल की पैदावार ठप हो गई थी. इसी विकट संकट से निपटने के लिए साल 2007 में अफ्रीकी संघ ने आधिकारिक तौर पर ग्रेट ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट की नींव रखी थी. वर्तमान में यह हरी दीवार स्थानीय गर्म जलवायु को ठंडा करने और मिट्टी की सेहत को सुधारने में बेहद मददगार साबित हो रही है.
किस तरीके से बन रही यह हरी दीवार?
शुरुआती योजना के अनुसार सेनेगल के डकार शहर से लेकर जिबूती की राजधानी तक लगभग 7775 किलोमीटर लंबी और 15 किलोमीटर चौड़ी एक सीधी कतार में पौधे लगाने का खाका तैयार किया गया था. लेकिन समय के साथ वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने इसकी डिजाइन में बदलाव किया. अब इस दीवार को एक सीधी रेखा में बनाने के बजाय क्षेत्र की जरूरत के हिसाब से बेहद घना, व्यावहारिक और घुमावदार बनाया जा रहा है. चीन की प्रसिद्ध दीवार की कुल लंबाई जहां 21,196 किलोमीटर है, वहीं अफ्रीका फिलहाल अपनी इस 8000 किलोमीटर लंबी प्राकृतिक दीवार से पर्यावरण का रुख बदलने की कोशिश कर रहा है.
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बहुआयामी वैज्ञानिक पद्धतियों के मेल से आकार ले रही परियोजना
यह महापरियोजना किसी एक तरीके से नहीं, बल्कि बहुआयामी वैज्ञानिक पद्धतियों के मेल से आकार ले रही है. इसके तहत कुछ हिस्सों में तेजी से पनपने वाले स्थानीय देसी पौधे रोपे जा रहे हैं, तो कुछ जगहों पर पहले से मौजूद प्राकृतिक वनस्पतियों की विशेष देखभाल की जा रही है. मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारने के लिए नष्ट हो चुके घास के मैदान को दोबारा जीवित किया जा रहा है. इसके साथ ही इस शुष्क बेल्ट में पानी की कमी को दूर करने के लिए वर्षा जल संचयन के बड़े इंतजाम किए गए हैं और किसानों को टिकाऊ कृषि पद्धतियों की ट्रेनिंग दी जा रही है.
कितने देशों से गुजरेगी यह परियोजना?
अफ्रीका की यह विशाल हरित दीवार किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कुल 11 देशों से होकर गुजरेगी. इस महाप्रोजेक्ट में बुर्किना फासो, चाड, जिबूती, इरिट्रिया, इथियोपिया, माली, मॉरिटानिया, नाइजर, नाइजीरिया, सेनेगल और सूडान जैसे देश अपनी पूरी ताकत के साथ शामिल हैं. ये सभी देश अपने-अपने स्तर पर भूमि के क्षरण को रोकने के लिए, मिट्टी को कटाव से बचाने और अपनी मूल वनस्पति को पुन: बहाल करने के सामूहिक मिशन में जुटे हैं. इस एकजुट प्रयास से स्थानीय स्तर पर पर्यावरण के साथ-साथ भुखमरी और पलायन जैसी सामाजिक समस्याओं पर भी लगाम लग रही है.
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