51 Years Of Emergency: 1975 में इंदिरा गांधी ने कैसे लगाया था आपातकाल, अब ऐसा क्यों नहीं हो सकता?
51 Years Of Emergency: देश आजाद हुए सिर्फ 28 साल ही हुए थे कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत में आपातकाल लगा दिया. चलिए जानें कि आज के दौर में वैसी परिस्थितियां संभव क्यों नहीं हैं.

51 Years Of Emergency: 25 जून 1975 की वह काली रात भारतीय इतिहास के पन्नों में एक ऐसा गहरा जख्म है, जिसे याद करके आज भी लोग कांप जाते हैं. जब पूरा देश गहरी नींद में सोया था, उस वक्त दिल्ली में सत्ता के गलियारों में ऐसी खौफनाक इबारत लिखी जा रही थी, जिसने रातों-रात करोड़ों हिंदुस्तानियों से उनके सांस लेने का हक भी छीन लिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का काला अध्याय लिख दिया था. उनके एक फैसले ने देश को खुली जेल में बदलकर रख दिया. आइए जानें कि इंदिरा गांधी ने आखिर इमरजेंसी कैसे लगाई थी और क्या आज की तारीख में इसे दोहरा पाना संभव क्यो नहीं है.
इंदिरा की डगमगाती कुर्सी और जेपी आंदोलन
इस एतिहासिक घटना की शुरुआत रातोंरात नहीं हुई थी, बल्कि इसकी बुनियाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक राजनैतिक फैसले के बाद पड़ी थी, जब अदालत ने उत्तर प्रदेश बनाम राजनारायण मुकदमे में इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया. इस फैसले के बाद तो देश में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में देश में भारी जन-आंदोलन खड़ा हो गया था. अपनी डगमगाती सत्ता की कुर्सी को हर हाल में बचाने के लिए ऐसा रास्ता चुना जिसने लोकतंत्र के ढांचे को किनारे कर दिया.
जब आधी रात को देश की तकदीर पर लगा तानाशाही की मुहर
25 जून की वो रात बहुत ही खौफनाक थी. उस दौरान इंदिरा गांधी ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए अपनी ही कैबिनेट के मंत्रियों को अंधेरे में रखा और इमरजेंसी लगाने की कोई बात उनसे नहीं बताई. सीधे तौर पर एकतरफा रुख अपनाते हुए उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को संपर्क किया और उन्हें राजी करते हुए संविधान के अनुच्छेद-352 का सहारा लिया. इंदिरा गांधी ने आंतरिक अशांति का हवाला देते हुए राष्ट्रीय आपातकाल के अध्यादेश पर हस्ताक्षर करवा लिए. जब तक अगली सुबह मंत्रिमंडल को इस बात की खबर मिलती तब तक तो तानाशाही की मुहर लग गई थी और विरोध की कोई गुंजाइश ही नहीं थी.
मीडिया की जुबान पर लगा ताला और नेताओं की गिरफ्तारी
आपातकाल लागू होते ही देश में दमन का भयानक सिलसिला शुरू हो गया था. मीसा (MISA) और डीआईआर (DIR) जैसे क्रूर कानून के जरिए विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश की गई. मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे बड़े-छोटे हर नेता और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बिना किसी ठोस कारण के सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया. अखबारों के दफ्तरों को भी नहीं बख्शा गया, वहां की बिजली काट दी गई और प्रेस पर पूरी तरह से सेंसरशिप लगा दी गई. इमरजेंसी में नागरिकों के सारे मौलिक अधिकार छीन लिए गए थे.
आज के दौर में क्यों नहीं हो सकते इमरजेंसी जैसे हालात?
वक्त बदला और देश ने 1975 के उस कड़वे सबक को सीखते हुए साल 1978 में अपने संविधान में 44वां संशोधन किया. इस एतिहासिक सुधार ने आपातकाल जैसे नियमों को लागू करने को इतना कड़ा और पारदर्शी बना दिया है कि आज के दौर में कोई भी सरकार उस तरह की मनमानी करने के बारे में सोच नहीं सकती है. आज कोई भी प्रधानमंत्री अपनी मर्जी से या सिर्फ मौखिक या लिखित सलाह लेकर देश में इमरजेंसी नहीं लगा सकता है. इसके लिए पूरी कैबिनेट की लिखित मंजूरी मिलना कानूनी रूप से अनिवार्य है. इस बड़े बदलाव ने लोकतंत्र के ढांचे के लिए सुरक्षा कवच का काम किया.
तो क्या कहते हैं 44वें संशोधन के नियम?
नए नियमों के अनुसार अब केवल आंतरिक अशांति जैसा बहाना करके कोई भी सरकार देश में आपातकाल लागू नहीं कर सकती है. संविधान में आंतरिक अशांति जैसे शब्द को हटाकर उसकी जगह पर सशस्त्र विद्रोह कर दिया गया है. इसके अलावा अगर राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा को मंजूरी देते भी हैं तो उसे एक महीने के अंदर ही संसद के दोनों सदनों से विशेष बहुमत से पास कराना होगा. हालांकि इसके लिए पहले सरकार के पास अच्छा खासा समय होता था, लेकिन अब सीमित समय कर दिया गया है. संसद की मंजूरी के बाद भी आपातकाल सिर्फ छह महीने लागू रह सकता है.
कोई नहीं छीन सकता नागरिकों के अधिकार
1975 के दौर में नागरिकों के सभी अधिकार छीन लिए गए थे, लेकिन आज की संवैधानिक व्यवस्था में ऐसा होना कहीं से भी संभव नहीं है.संविधान के अनुच्छेद 20, 21 किसी भी आम इंसान को सम्मान के साथ जीने का अधिकार और कानूनी सुरक्षा की गारंटी देते हैं. उन्हें किसी भी आपदा में हटाया नहीं जा सकता है. साथ ही अदालत की शक्तियों को भी पूरी तरह से बहाल कर दिया गया है. अगर कोई सरकार ऐसा कदम उठाती है और लोगों को उनका इरादा गलत लगता है तो इसको सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. अदालतें न्यायिक समीक्षा करके इसे तुरंत खारिज भी कर सकती हैं.
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