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DETAIL: गलती से भी उम्मीदवारों ने कर दी ये गलतियां तो गिर सकती है चुनाव आयोग की गाज

आदर्श आचार संहिता लागू किए जाने के बाद मंत्रियों और अन्य अधिकारियों को इस बात की सख्त हिदायत दी जाती है कि वे किसी भी तरह के अनुदानों के साथ नई योजनाओं का ऐलान नहीं करेंगे.

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर देश भर में आदर्श आचार संहिता लागू कर दी गई है. हालांकि, इस दौरान चुनाव में भाग ले रहे उम्मीदवारों को जनता के बीच जाने और अपनी नीतियों और कार्यक्रमों के बारे में बताने का समान अवसर दिया जाता है. आदर्श आचार संहिता के तहत राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार करने की छूट देने के साथ ही उनसे भाषा पर संयम बरतने और संविधानिक सौहार्द बनाए रखने की भी अपील की जाती है. राजनीतिक दलों को गाइडलाइन जारी की जाती है कि वे चुनाव में लाभ लेने के लिए सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग न करें. यदि वे ऐसा करते हुए पाए जाते हैं तो चुनाव आयोग की तरफ उन उम्मीदवारों पर गाज गिर सकती है.

चुनाव आयोग किस तरफ से कैसे गिरा सकती है उम्मीदवारों पर गाज

अभद्र भाषा का इस्तेमाल है मना आदर्श आचार संहिता में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों से सामान्य आचरण की अपील की जाती है. साथ ही चुनाव प्रचार के दौरान नीतियों और कार्यक्रमों के बारे में जनता से बताते वक्त वक्ता को अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना होगा. चुनावी भाषण देने के दौरान उम्मीदवार को इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा कि कहीं वह अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर विरोधी पार्टी के उम्मीदवारों को जनता के सामने नीचा दिखाने की कोशिश तो नहीं कर रहा है. ऐसी एक्टिविटी में कोई उम्मीदवार लिप्त पाया जाता है तो चुनाव आयोग उसके खिलाफ कड़ा कदम उठा सकता है.

सरकारी मशीनरी की नहीं हो इस्तेमाल चुनावों के दौरान खास तौर पर सत्ता में काबिज राजनीतिक पार्टियों को खास गाइडलाइंस जारी की जाती हैं कि वह चुनाव में लाभ लेने के लिए सरकारी मशीनरी का किसी भी तरह से इस्तेमाल नहीं करेंगे. आदर्श आचार संहिता लागू किए जाने के बाद मंत्रियों और अन्य अधिकारियों को इस बात की सख्त हिदायत दी जाती है कि वे किसी भी तरह के अनुदानों के साथ नई योजनाओं का ऐलान नहीं करेंगे. इसके साथ ही किसी मंत्री या सरकारी पदों पर आसीन व्यक्ति को सरकारी दौरे पर चुनाव प्रचार करने की इजाजत नहीं है. इन प्रावधानों का उल्लंघन किसी सत्ताधारी पार्टी के मंत्रियों या उम्मीदवारों की तरफ से किया जाता है तो चुनाव आयोग की गाज उन पर गिर सकती है.

पब्लिक प्लेस का सामान्य तरह से हो इस्तेमाल चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी या उम्मीदवारों को चुनावी सभा जैसे- रैलियों, जुलूस निकालने और अन्य बैठकों के लिए चुनाव आयोग से अनुमति लेनी पड़ती है. किसी भी तरह के पब्लिक प्लेस जैसे- सरकारी बंगले, सरकारी गेस्ट हाउस, हैलीपैड आदि जगहों पर सभी राजनीतिक दलों के उम्मीदावारों का समान अधिकार होता है. ऐसे में यदि सत्ता में काबिज कोई व्यक्ति इसके लिए मना करता है तो चुनाव आयोग इसके खिलाफ एक्शन ले सकता है.

प्रचार में नहीं सरकारी खर्च चुनावों में पोस्टर, बैनर, कटआउट्स और विज्ञापनों में भारी धन खर्च होता है. इस खर्च के वहन में किसी भी तरह की सरकारी भागीदारी नहीं होनी चाहिए. इस प्रावधान को चुनाव आयोग सख्ती से लागू करता है यदि ऐसी कोई संलिप्तता पाई जाती है तो चुनाव आयोग अपने कड़े कदम उस निश्चित उम्मीदवार के खिलाफ उठा सकता है.

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की न हो कोशिश सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का इल्जाम तमाम राजनीतिक पार्टियों पर आए दिन लगता रहता है. चुनाव के प्रचार के दौरान सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वाले शब्दों पर आचार संहिता लागू हो जाने के बाद चुनाव आयोग की पैनी नजर रहती है. यदि ऐसा किसी के द्वारा किया जाता है तो उस उम्मीदवार की उम्मीदवारी खतरे में पड़ सकती है.

DETAIL: गलती से भी उम्मीदवारों ने कर दी ये गलतियां तो गिर सकती है चुनाव आयोग की गाज
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