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Carbon Credit: क्या है कार्बन क्रेडिट, हवा बेचकर अरबों रुपये कैसे कमा रहे हैं ये देश?

कार्बन क्रेडिट एक तरह का सर्टिफिकेट होता है. एक कार्बन क्रेडिट का मतलब की 1 टन कार्बन डाइऑक्साइड या उसके बराबर किसी दूसरे ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम किया गया है.

Carbon Credit: दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है. ऐसे में कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कई देशों ने कार्बन क्रेडिट जैसी व्यवस्था अपनाई है. आज यह केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि अरबों डॉलर का वैश्विक कारोबार भी बन चुका है. बड़ी संख्या में कंपनियां अपने देश और अपने कार्बन उत्सर्जन की भरपाई के लिए कार्बन क्रेडिट खरीद रही है. जबकि प्रदूषण कम करने वाले देशों, संस्थाओं और किसानों के लिए यह अतिरिक्त कमाई का जरिया बनता जा रहा है. भारत भी अपना कार्बन मार्केट विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि कार्बन क्रेडिट क्या है और हवा बेचकर यह देश अरबों कैसे कमा रहे हैं. 

क्या होता है कार्बन क्रेडिट? 

कार्बन क्रेडिट एक तरह का सर्टिफिकेट होता है. एक कार्बन क्रेडिट का मतलब की 1 टन कार्बन डाइऑक्साइड या उसके बराबर किसी दूसरे ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम किया गया है. अगर कोई व्यक्ति, संस्था या कंपनी ऐसे काम करती है, जिससे प्रदूषण कम होता है तो उसे कार्बन क्रेडिट मिल सकता है. वहीं जो कंपनियां तय सीमा से ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करती है, वह इन क्रेडिट्स को खरीद कर अपने अतिरिक्त उत्सर्जन की भरपाई करती है. 

कार्बन क्रेडिट की शुरुआत कैसे हुई? 

कार्बन क्रेडिट की अवधारणा 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के बाद सामने आई. इसके तहत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को सीमित करने का टारगेट रखा गया. बाद में 2015 के पेरिस समझौते में भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए देशों ने उत्सर्जन घटाने की प्रतिबद्धता जताई. इस व्यवस्था के तहत देशों और उद्योगों के लिए कार्बन उत्सर्जन की एक सीमा तय की जाती है. अगर कोई संस्था उस सीमा से ज्यादा उत्सर्जन करती है, तो उसे अतिरिक्त कार्बन क्रेडिट खरीदने पड़ते हैं. 

कार्बन क्रेडिट का कारोबार कैसे चलता है? 

कार्बन क्रेडिट को खरीदा और बेचा जा सकता है. इसे ही कार्बन ट्रेडिंग कहा जाता है. मान लीजिए कोई कंपनी अपने कारखाने से तय सीमा से ज्यादा प्रदूषण कर रही है. ऐसे में उसके पास दो ऑप्शन होते हैं, पहला वह नई तकनीक अपनाकर अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करें और दूसरा वह किसी ऐसे प्रोजेक्ट में निवेश करें, जिससे कार्बन उत्सर्जन घटे, जैसे बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायो मीथेन परियोजना या ऊर्जा तकनीक में. ऐसे प्रोजेक्ट में जितना कार्बन उत्सर्जन कम होता है, उसके आधार पर कार्बन क्रेडिट मिलते हैं. इसके बाद में इन्हें जरूरतमंद कंपनियों को बेचा जा सकता है. 

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भारत में कैसे बन रहा कार्बन मार्केट 

ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 में संशोधन के बाद भारत ने घरेलू कार्बन मार्केट विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं. सरकार का उद्देश्य ऐसे बाजार तैयार करना है, जहां कार्बन क्रेडिट का लेनदेन हो सके और उद्योगों के साथ-साथ किसानों को भी इसका लाभ मिले. एक्सपर्ट्स के अनुसार भारत में फ्यूचर में ऑफसेट मार्केट और इमीशन ट्रेडिंग स्कीम दोनों तरह की व्यवस्थाएं साथ-साथ चल सकती है.

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कविता गाडरी बीते कुछ साल से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ी हुई है. राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाली कविता ने अपनी पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स और अपेक्स यूनिवर्सिटी जयपुर से बैचलर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में की है. 
पत्रकारिता में अपना सफर उन्होंने राजस्थान पत्रिका से शुरू किया जहां उन्होंने नेशनल एडिशन और सप्लीमेंट्स जैसे करियर की उड़ान और शी न्यूज के लिए बाय लाइन स्टोरी लिखी. इसी दौरान उन्हें हेलो डॉक्टर शो पर काम करने का मौका मिला. जिसने उन्हें न्यूज़ प्रोडक्शन के लिए नए अनुभव दिए. 

इसके बाद उन्होंने एबीपी नेटवर्क नोएडा का रुख किया. यहां बतौर कंटेंट राइटर उन्होंने लाइफस्टाइल, करंट अफेयर्स और ट्रेडिंग विषयों पर स्टोरीज लिखी. साथ ही वह कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी लगातार सक्रिय रही. कविता गाडरी हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में दक्ष हैं. न्यूज़ राइटिंग रिसर्च बेस्ड स्टोरीटेलिंग और मल्टीमीडिया कंटेंट क्रिएशन उनकी खासियत है. वर्तमान में वह एबीपी लाइव से जुड़ी है जहां विभिन्न विषयों पर ऐसी स्‍टोरीज लिखती है जो पाठकों को नई जानकारी देती है और उनके रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़ती है.

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