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UGC के नए नियमों में क्या था 3C, यह पुराने नियम 3E से कितना अलग?

यूजीसी के नए नियमों में शामिल नियम 3(C) को लेकर विवाद गहरा गया है. जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है और 2012 के पुराने नियम लागू रखने का आदेश दिया है.

देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर बड़े सवालों के घेरे में है. वजह है यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी यूजीसी के नए नियम, जिनमें खास तौर पर नियम 3(C) को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई है. इसी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने इन नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है और साफ कहा है कि अभी 2012 में लागू पुराने नियम ही देश के सभी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मान्य रहेंगे. सवाल यह है कि आखिर नया नियम 3(C) क्या था पुराना नियम 3(E) क्या कहता है. दोनों में ऐसा क्या फर्क है, जिस पर इतना बवाल मच गया.

यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” नाम से नए नियम लागू किए थे. इनका मकसद बताया गया था कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में समानता का माहौल बने और भेदभाव की शिकायतों पर सख्ती से कार्रवाई हो. लेकिन नियम लागू होते ही कई छात्र संगठनों, शिक्षाविदों और वकीलों ने इन पर सवाल खड़े कर दिए.

नियम 3(C) क्या कहता है

नए नियमों का सबसे विवादित हिस्सा है नियम 3(C). इसमें पहली बार “जाति आधारित भेदभाव” की साफ परिभाषा दी गई. नियम 3(C) के मुताबिक, जाति आधारित भेदभाव का मतलब है - अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों के साथ केवल उनकी जाति या जनजाति के आधार पर किया गया भेदभाव.

यानी इस नियम में यह साफ तौर पर कहा गया कि अगर इन तीन वर्गों के छात्रों या कर्मचारियों के साथ जाति के कारण भेदभाव होता है, तो उसे गंभीर माना जाएगा और उस पर कार्रवाई होगी.

पुराना नियम 3(E) क्या कहता था

अब समझते हैं 2012 के पुराने नियमों में मौजूद नियम 3(E) को. यह नियम कहीं ज्यादा व्यापक था. इसमें कहा गया था कि किसी भी छात्र या कर्मचारी के साथ जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, लिंग, जन्म स्थान, शारीरिक स्थिति या किसी भी अन्य आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता. यानी नियम 3(E) सभी वर्गों के लिए समान सुरक्षा देता था. इसमें यह नहीं देखा जाता था कि छात्र किस जाति या वर्ग से आता है. अगर किसी के साथ गलत व्यवहार हुआ है, तो वह शिकायत कर सकता था.

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई के दौरान चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में ये नियम अस्पष्ट लगते हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत ने बीते 75 सालों में समाज को जोड़ने की दिशा में काफी प्रगति की है. कॉलेज और विश्वविद्यालय ऐसे स्थान हैं, जहां अलग-अलग पृष्ठभूमि के युवा साथ रहते हैं, पढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं. अगर कैंपस में जाति के आधार पर नई रेखाएं खींची जाएंगी, तो यह समाज के लिए ठीक नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने साफ किया है कि जब तक अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक 2012 के पुराने नियम, यानी नियम 3(E) ही लागू रहेंगे. कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूजीसी से जवाब मांगा है.

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रजनी उपाध्याय बीते करीब छह वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली रजनी ने आगरा विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. बचपन से ही पढ़ने-लिखने में गहरी रुचि थी और यही रुचि उन्हें मीडिया की दुनिया तक ले आई.

अपने छह साल के पत्रकारिता सफर में रजनी ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया. उन्होंने न्यूज, एंटरटेनमेंट और एजुकेशन जैसे प्रमुख वर्टिकल्स में अपनी पहचान बनाई. हर विषय में गहराई से उतरना और तथ्यों के साथ-साथ भावनाओं को भी समझना, उनकी पत्रकारिता की खासियत रही है. उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ खबरें लिखना नहीं, बल्कि समाज की धड़कन को शब्दों में ढालने की एक कला है.

रजनी का मानना है कि एक अच्छी स्टोरी सिर्फ हेडलाइन नहीं बनाती, बल्कि पाठकों के दिलों को छूती है. वर्तमान में वे एबीपी लाइव में कार्यरत हैं, जहां वे एजुकेशन और एग्रीकल्चर जैसे अहम सेक्टर्स को कवर कर रही हैं.

दोनों ही क्षेत्र समाज की बुनियादी जरूरतों से जुड़े हैं और रजनी इन्हें बेहद संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ संभालती हैं. खाली समय में रजनी को संगीत सुनना और किताबें पढ़ना पसंद है. ये न केवल उन्हें मानसिक सुकून देते हैं, बल्कि उनकी रचनात्मकता को भी ऊर्जा प्रदान करते हैं.

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