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IAS Success Stories: किसी के पिता थे सिक्योरिटी गार्ड तो किसी के टेलर, बच्चे मेहनत से बने IAS अधिकारी

मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है, कम से कम इन आईएएस अधिकारियों की कहानियां तो यही साबित करती हैं.

Success Story Of Some IAS Officers Who bloomed Out Of Poverty: असफल और सफल लोगों के बीच का मुख्य फर्क शायद यही होता है कि असफल लोग रास्ते में मिलने वाले पत्थरों का दुखड़ा रोने में ही उलझे रहते हैं और सफल लोग खुद पर फेंके जा रहे पत्थरों से भी घर बना लेते हैं. परेशानियां हर किसी के जीवन में होती हैं, कहीं बहुत ज्यादा तो कहीं कम लेकिन इन परेशानियों की आड़ में वहीं छिपते हैं जिनमें जंग जीतने का जज्‍बा नहीं होता. आज हम जिन युवाओं के बारे में आपको बताने जा रहे हैं, उनमें से किसी के पिताजी ऑटो चलाते थे तो किसी के यहां कपड़े सिलने का काम होता था. जाहिर है ऐसे में घर की आर्थिक स्थिति कैसी होगी. पर इन युवाओं ने गरीबी को कभी अपनी सफलता के राह में रोड़ा नहीं बनने दिया और तमाम विसंगतियों के बावजूद वो कर दिखाया जो तमाम लोग सपने में भी पूरा नहीं कर पाते.

पिता थे सिक्योरिटी गार्ड –

इस सूची में सबसे पहले आता है कुलदीप द्विवेदी का नाम जिनके पिता जी लखनऊ यूनिवर्सिटी में सिक्योरिटी गार्ड का काम करके परिवार चलाते थे. जिस घर में रोटी कमाना सबसे बड़ा संघर्ष हो, उस घर के लोगों को यूपीएससी के बारे में समझाना पानी गाढ़ा करने के बराबर था लेकिन कुलदीप ने वो भी किया. चार भाई बहनों में सबसे छोटे कुलदीप को बचपन से ही सिविल सर्विसेस में जाना था. 2009 में स्नताक और 2011 में परास्नातक पास करने के बाद कुलदीप ने 242वीं रैंक के साथ यूपीएससी की परीक्षा में सफलता हासिल की. अपनी गरीबी के बावजूद जितना संभव था उनके पिता ने उन्हें सहयोग किया. शायद इसीलिए परिणाम आने पर किसी को विश्वाश नहीं हो रहा था कि यह सच हो सकता है. कुलदीप ने कभी अभावों पर ध्यान दिया ही नहीं बस एकाग्रचित होकर लक्ष्य प्राप्ति में लगे रहे.

पिता चलाते थे ऑटो –

अंसार अहमद शेख दूसरा नाम हैं, जिनकी मेहनत और एकाग्रता की जितनी तारीफ की जाये कम है. अंसार के पिता ऑटो चलाते थे और भाई मैकेनिक थे. लेकिन महाराष्ट्र के जालना गांव के अंसार का रुझान पढ़ाई की तरफ ज्यादा था. उनके परिवार ने कभी उन्हें अजीविका कमाने की इस जंग में नहीं डाला और वे लगातार लगन और कड़ी मेहनत से पढ़ते रहे. उन्होंने राजिनीति शास्त्र से बीए किया और एक दो नहीं पूरे तीन साल तक दिन-रात पढ़ाई करने के बाद यूपीएससी की परीक्षा दी. जहां न जाने कितने अटेम्पटे्स के बाद भी लोगों का चयन नहीं होता वहीं अपनी मेहनत के दम पर सभी विसंगतियों से जीतते हुये अंसार ने पहले ही अटेम्पट में जीत हासिल की. अंसार ने मात्र 21 वर्ष की उम्र में 361वीं रैंक के साथ यह परीक्षा पहली बार में पास की और अपने परिवार के भरोसे को सही साबित कर दिखाया.

पिताजी थे टेलर –

मध्य प्रदेश के भिंड जिले के एक छोटे से गांव मऊ के रहने वाले नीरीश राजपूत इस परीक्षा के लिये आवश्यक कड़ी मेहनत, अनुशासन और धीरज का सटीक उदाहरण हैं. उनकी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा बहुत ही सामान्य स्कूल और कॉलेज से हुयी थी. लेकिन नीरीश राजपूत का मन यह जानता ही नहीं था कि गरीबी बड़े सपने देखने या उनको पाने की राह में बाधा भी बन सकती है. उन्हें बस ये पता था कि सच्ची लगन से कुछ भी संभव हो सकता है. पहले पहल तो ऐसा लगा मानों नीरीश का सपना, सपना ही रह जायेगा जब एक दो नहीं पूरे तीन बार वे यूपीएससी परीक्षा में असफल रहे. पर इतनी विफलताओं के बावजूद न उनका संकल्प डगमगाया न उनके परिवार का उन पर भरोसा. तभी शायद नीरिश के बड़े भाइयों ने जो सामान्य से शिक्षक थे अपनी अधिकतर पूंजी नीरीश पर लगा दी. उन्हें हिम्म्त और भरोसा दिलाया की वे सफल हो सकते हैं. परिवार का ऐसा साथ पाकर नीरीश भी पुरानी असफलताओं को भूलकर नये सिरे से जुट जाते थे जैसे तय कर चुके हों कि देर से ही सही पर मंजिल पर पहुंचकर ही दम लेंगे. आखिरकार चौथे प्रयास में नीरीश ने 370वीं रैंक के साथ यह परीक्षा पास की और अपने धैर्य के बल पर दिखा दिया की कभी कभी मंजिल मिलने में देरी हो सकती है पर इरादा अटल हो तो सफलता मिलती जरूर है.

पिताजी हैं पंसारी –

इस सूची में अगला नाम है श्वेता अग्रवाल का जो भद्रेश्वर की रहने वाली हैं. श्वेता के पिताजी की पंसारी की दुकान थी, जिस पर सब आश्रित थे. लेकिन श्वेता के सपने को उनके माता-पिता ने हमेशा तवज्जो दी और पैसे की कमी को कभी उनकी पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया. अपने अभिभावकों के इस सहयोग के लिये श्वेता हमेशा उन पर फक्र महसूस करती हैं. चाहे स्कूली शिक्षा हो जो सेंट जोसेफ बंदेल से पूरी हुयी या चाहे उच्च शिक्षा हो जो सेंट जेवियर्स कॉलेज से हुयी, श्वेता के माता पिता ने हमेशा सब जगह कटौती करके बेटी को पढ़ाया. अपने मां-बाप के इस त्याग का महत्व समझते हुये श्वेता ने भी कामयाबी की नई इबारतें लिखीं. श्वेता ने कुल तीन बार यूपीएससी परीक्षा दी पर दो बार मन का पद न मिलने पर अगली बार फिर प्रयास करने की ठानी. उन्हें आईएएस बनना था और जब तक वर्ष 2015 में 19वीं रैंक लाकर श्वेता ने अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर लिया वे बार-बार दोगुनी मेहनत से लगी रहीं. उन्होंने अपने मां-बाप के भरोसे को सही साबित कर दिखाया.

किसान का बेटा –

दुनिया का पेट भरने वाले किसानों की जब खुद की बात आती है तो कई बार उन्हें भूखे पेट ही रह जाना पड़ता है. ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले के सुदूर गांव अंगुलाई के रहने वाले ह्दय कुमार इसी का उदाहरण हैं. इनके पिता किसान थे और गरीबी का आलम यह के बीपीएल धारक और इंदिरा आवास योजना के तहत मिले आवास में निवास. कोई बैकग्राउंड, कोई बैकअप और कोई सपोर्ट न होने के बावजूद ह्दय कुमार ने साल 2014 में 1079वीं रैंक के साथ यूपीएससी परीक्षा पास की और अपने वर्तमान को बदलने का जिम्मा उठाया. ह्दय कुमार बाकी कैंडिडेट्स की तरह हमेशा से पढ़ाई में होनहार नहीं थे न सिविल सेवा में जाने का उनका कोई सपना था. शुरुआती शिक्षा सामान्य से सरकारी स्कूल से पूरा करने के बाद उन्होंने दूसरी श्रेणी में कक्षा 12 पास की. ह्दय को किक्रेट में बहुत रुचि थे और वे अच्छा खेलते भी थे लेकिन उन्होंने जल्द ही इस क्षेत्र की अनिश्चितता को भांप लिया और हायर स्टडीज़ के दौरान मिलने वाले पढ़ाई के माहौल का लाभ उठाकर यूपीएससी की परीक्षा दे डाली. पहले दो प्रयासों में असफल होने के बावजूद उन्होंने पूरी लगन से तीसरा अटेम्पट दिया और उसे पास भी कर लिया. ह्दय की कहानी बताती है कि जीवन की दिशा बदलने के लिये जरूरी मेहनत करने को अगर आप तैयार हैं तो फिर नयी शुरुआत करने के लिये कभी देर नहीं होती. जब जागें तभी सवेरा मानकर बस निकल पड़िये, निसंदेह जीत आपकी होगी.

ऊपर दिये संघर्षों की कहानियां हमें यही सिखाती हैं कि, विकल्प मिलेंगे बहुत राह भटकाने के लिये, संकल्प एक ही काफी है मंजिल तक जाने के लिये.

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