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NMC में स्टाफ की भारी कमी, पारदर्शिता पर सवाल और भ्रष्टाचार के आरोप; मेडिकल छात्रों को भुगतना पड़ रहा खामियाजा

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में NMC में स्टाफ की भारी कमी, जरूरी पदों के खाली रहने और पारदर्शिता की कमी को मेडिकल शिक्षा व्यवस्था में देरी का बड़ा कारण बताया गया है.

देश में मेडिकल शिक्षा को नियंत्रित करने वाली संस्था नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) सवालों के घेरे में है. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता मनींदर सिंह ने अपनी रिपोर्ट में NMC में लंबे समय से खाली पड़े पदों, प्रशासनिक देरी, पारदर्शिता की कमी और कथित अनियमितताओं पर गंभीर चिंता जताई है.

सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी देने, सीटों के नवीनीकरण, निरीक्षण, अपीलों के निपटारे और काउंसलिंग प्रक्रिया में लगातार देरी हो रही है. इसका सबसे ज्यादा नुकसान मेडिकल छात्रों को उठाना पड़ रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि सालों से सुधार के दावों के बावजूद हालात में अपेक्षित बदलाव नहीं हो सका है और हर साल प्रवेश प्रक्रिया निर्धारित समय से काफी आगे खिंच रही है.

रिपोर्ट्स के अनुसार 2025-26 सेशन के लिए पोस्ट ग्रेजुएट (PG) मेडिकल कोर्सों में दाखिले फरवरी 2026 तक चलते रहे, जबकि अंडरग्रेजुएट (UG) दाखिले दिसंबर 2025 तक जारी रहे. कई मामलों में मेडिकल कॉलेजों को मंजूरी और सीटों के नवीनीकरण की प्रक्रिया अकादमिक सत्र शुरू होने के बाद तक चलती रही. इससे छात्रों और कॉलेजों दोनों के सामने अनिश्चितता की स्थिति पैदा हुई.

स्टाफ को लेकर बड़ा सवाल

रिपोर्ट में NMC की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल स्टाफ की कमी को लेकर उठाया गया है. NMC अधिनियम 2019 लागू होने के छह साल बाद भी आयोग और उसके स्वायत्त बोर्डों में कई महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं. आयोग के विभिन्न अध्यक्षों, सदस्यों और सचिव जैसे प्रमुख पदों पर नियमित नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं. रिपोर्ट का कहना है कि इन पदों के खाली रहने से नियम बनाने, कॉलेजों के आवेदन निपटाने, निरीक्षण कराने और अपीलों पर फैसला लेने में देरी हो रही है.

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इस पर भी जताई चिंता

एमिकस क्यूरी ने पारदर्शिता की कमी पर भी चिंता जताई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि मेडिकल कॉलेजों के निरीक्षण से जुड़ी रिपोर्टें और नियामकीय फैसले पहले की तरह सार्वजनिक नहीं किए जा रहे हैं, जबकि कानून में इनके प्रकाशन का प्रावधान है.

मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में लंबे समय से यह आरोप लगते रहे हैं कि निरीक्षण, मान्यता और सीट वृद्धि जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है. हालांकि रिपोर्ट में सीधे तौर पर किसी व्यक्ति या संस्था पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया गया है, लेकिन नियामकीय प्रक्रियाओं में देरी और जानकारी सार्वजनिक न होने से व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट भी कई बार मेडिकल सीटों के खाली रहने और छात्रों के हित प्रभावित होने पर चिंता जता चुका है. हाल के फैसलों में अदालत ने कहा है कि मेडिकल सीटें देश का बहुमूल्य संसाधन हैं और प्रशासनिक लापरवाही के कारण इन्हें खाली नहीं छोड़ा जा सकता.

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रजनी उपाध्याय बीते करीब छह वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली रजनी ने आगरा विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. बचपन से ही पढ़ने-लिखने में गहरी रुचि थी और यही रुचि उन्हें मीडिया की दुनिया तक ले आई.

अपने छह साल के पत्रकारिता सफर में रजनी ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया. उन्होंने न्यूज, एंटरटेनमेंट और एजुकेशन जैसे प्रमुख वर्टिकल्स में अपनी पहचान बनाई. हर विषय में गहराई से उतरना और तथ्यों के साथ-साथ भावनाओं को भी समझना, उनकी पत्रकारिता की खासियत रही है. उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ खबरें लिखना नहीं, बल्कि समाज की धड़कन को शब्दों में ढालने की एक कला है.

रजनी का मानना है कि एक अच्छी स्टोरी सिर्फ हेडलाइन नहीं बनाती, बल्कि पाठकों के दिलों को छूती है. वर्तमान में वे एबीपी लाइव में कार्यरत हैं, जहां वे एजुकेशन और एग्रीकल्चर जैसे अहम सेक्टर्स को कवर कर रही हैं.

दोनों ही क्षेत्र समाज की बुनियादी जरूरतों से जुड़े हैं और रजनी इन्हें बेहद संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ संभालती हैं. खाली समय में रजनी को संगीत सुनना और किताबें पढ़ना पसंद है. ये न केवल उन्हें मानसिक सुकून देते हैं, बल्कि उनकी रचनात्मकता को भी ऊर्जा प्रदान करते हैं.

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