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मदरसा बोर्ड को खत्म कर रहा यह राज्य, जानें इसमें पढ़ने वाले बच्चों का क्या होगा?

उत्तराखंड सरकार ने मदरसा बोर्ड को खत्म करने का फैसला लिया है. नया विधेयक 2026 से लागू होगा और इसके बाद सभी अल्पसंख्यक समुदायों को शैक्षणिक संस्थान चलाने की अनुमति मिलेगी.

उत्तराखंड सरकार ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है. राज्य मंत्रिमंडल ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान विधेयक, 2025 को मंजूरी दे दी है. इस नए विधेयक के लागू होने के बाद राज्य में मदरसा बोर्ड खत्म हो जाएगा और उसके तहत चल रहे नियम भी निरस्त कर दिए जाएंगे.

क्या है नया प्रस्ताव?

नए कानून का उद्देश्य सिर्फ मुस्लिम समुदाय तक सीमित मदरसा शिक्षा को अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी तक भी विस्तार देना है. यानी अब राज्य में केवल मुसलमानों को ही नहीं बल्कि सभी मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक समुदायों को शैक्षणिक संस्थान चलाने की अनुमति होगी.

सरकार का मानना है कि इससे शिक्षा का दायरा बढ़ेगा और अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर मिलेंगे. हालांकि, मुस्लिम समुदाय के बीच इस प्रस्ताव को लेकर चिंता जताई जा रही है. उनका कहना है कि यह संविधान के अनुच्छेद 26 और 30 के तहत उनके अधिकारों का हनन कर सकता है. ये अनुच्छेद धार्मिक संस्थान चलाने और शिक्षा संस्थान स्थापित करने का अधिकार देते हैं.

कब होगा लागू?

अगर विधानसभा में यह विधेयक पास हो जाता है तो 1 जुलाई 2026 से नया कानून लागू हो जाएगा. इसके साथ ही उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016 और उत्तराखंड गैर-सरकारी अरबी और फ़ारसी मदरसा मान्यता नियम, 2019 भी खत्म हो जाएंगे. दिलचस्प बात यह है कि नए कानून के बाद मदरसों में गुरुमुखी और पाली जैसी भाषाओं की पढ़ाई की भी अनुमति होगी.

अभी कैसे काम करता है मदरसा बोर्ड?

वर्तमान में मदरसा बोर्ड को पाठ्यक्रम तैयार करने, परीक्षाएं आयोजित करने और मदरसों का निरीक्षण करने का अधिकार है. बोर्ड की मान्यता समिति में कुल 13 सदस्य होते हैं, जिनमें डिप्टी रजिस्ट्रार, एक हेडमास्टर रैंक का सदस्य और अन्य शैक्षणिक सदस्य शामिल रहते हैं. यही समिति तय करती है कि कौन सा मदरसा मान्यता प्राप्त करेगा और कौन सा नहीं. फिलहाल राज्यभर में 452 मान्यता प्राप्त मदरसे चल रहे हैं.

नए कानून के बाद क्या होगा?

नए बिल के लागू होने के बाद मदरसों की मान्यता को लेकर सख्त नियम बनाए जाएंगे. कोई भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान तभी मान्यता पाएगा जब वह सोसाइटी एक्ट, ट्रस्ट एक्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकृत होगा. संस्थान की जमीन, बैंक खाते और संपत्तियां भी संस्थान के नाम पर होनी जरूरी होंगी. अगर किसी संस्थान में वित्तीय गड़बड़ी, पारदर्शिता की कमी या धार्मिक-सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने वाली गतिविधियां होती हैं, तो उसकी मान्यता वापस ली जा सकेगी.

छात्रों पर असर

वर्तमान में मदरसों से जुड़े हजारों छात्र धार्मिक और सामान्य शिक्षा दोनों प्राप्त कर रहे हैं. नया कानून लागू होने के बाद इन छात्रों के लिए पढ़ाई का दायरा बढ़ सकता है क्योंकि उन्हें अब केवल अरबी-फारसी तक सीमित नहीं रहना पड़ेगा, बल्कि वे अन्य भाषाएं भी सीख सकेंगे.

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