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रुपया गिरने से इतनी बढ़ी US में जॉब करने वाले भारतीयों की सैलरी, बिना इंक्रीमेंट कितना हुआ फायदा?

रुपया कमजोर होने से अमेरिका में काम करने वाले भारतीयों की डॉलर वाली सैलरी भारत में बिना इंक्रीमेंट ही ज्यादा कीमत देने लगी है. आइए जानते हैं कैसे...

भारतीय रुपये में लगातार गिरावट देखी जा रही है और इसका असर हर सेक्टर पर दिखाई देता है. लेकिन इस गिरावट के बीच एक ऐसी दिलचस्प बात सामने आई है जो अमेरिका में काम करने वाले भारतीयों और डॉलर में कमाई करने वालों के लिए किसी छुपे हुए बोनस से कम नहीं है. भले ही उनकी सैलरी में एक भी डॉलर का इंक्रीमेंट नहीं हुआ हो, लेकिन भारत में उसकी कीमत पहले से ज्यादा हो गई है. बहुत से लोग सोचते हैं कि रुपये की कमजोरी का मतलब सिर्फ नुकसान है, लेकिन डॉलर में सैलरी पाने वालों के लिए यही कमजोरी उनकी कमाई को मजबूत बना देती है.

असल में होता यह है कि जब रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरती है, तो एक डॉलर बदलने पर पहले से ज्यादा रुपये मिलते हैं. मान लीजिए पहले एक डॉलर की कीमत 80 रुपये थी और अब बढ़कर 90 रुपये हो गई है, तो ऐसे समय में अमेरिका में रहने और काम करने वाले भारतीयों की डॉलर में मिलने वाली सैलरी तो वही रहती है, लेकिन अगर वही पैसा भारत भेजा जाए या भारतीय रुपये में बदला जाए, तो रकम काफी ज्यादा हो जाती है. इसी वजह से भारत में बैठे उनके परिवार को भी बड़ा फायदा होता है और बिना किसी सैलरी हाइक के ही उनकी आमदनी रुपये में बढ़ जाती है.

अगर किसी भारतीय की सैलरी 5,000 डॉलर प्रति माह है, तो जब डॉलर 80 रुपये के बराबर था, तब भारत में उसकी सैलरी की कीमत 4 लाख रुपये होती थी. लेकिन अगर डॉलर 90 रुपये तक पहुंच गया है, तो वही सैलरी अब 4 लाख 50 हजार रुपये बन जाती है. यानी बिना एक भी डॉलर बढ़े, सिर्फ एक्सचेंज दर बदलने से 50 हजार रुपये का फायदा हो गया. यही कारण है कि कई NRI परिवार रुपये की गिरावट को एक तरह का आर्थिक बोनस मानते हैं, क्योंकि उनके घर आने वाली रकम पहले की तुलना में अधिक हो जाती है.

कितनी मिल रही रकम

बहुत से लोग अपने परिवार के खर्च, स्कूल की फीस, हेल्थकेयर, ईएमआई और निवेश को इसी पैसे से संभालते हैं. कोई NRI अपने परिवार को हर महीने 1,000 डॉलर भेजता है, तो जब डॉलर 80 रुपये था, तब परिवार को 80,000 रुपये मिलते थे. लेकिन अब अगर डॉलर 90 रुपये का हो गया है, तो वही रकम बढ़कर 90,000 रुपये हो जाएगी. यानी परिवार के पास 10,000 रुपये की अतिरिक्त राशि पहुंच जाती है, वह भी बिना किसी अतिरिक्त मेहनत या काम के.

इन्हें भी फायदा

यह फायदा सिर्फ अमेरिका में काम करने वाले भारतीयों को ही नहीं मिलता, बल्कि उन लाखों फ्रीलांसर्स और रिमोट वर्कर्स को भी मिलता है जो भारत में बैठकर अमेरिकी कंपनियों या क्लाइंट्स के लिए काम करते हैं. आज भारत में आईटी, डिजाइन, कंटेंट राइटिंग, डिजिटल मार्केटिंग, ऐप डेवलपमेंट जैसे कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग डॉलर में पेमेंट प्राप्त कर रहे हैं. रुपये का कमजोर होना इन सभी के लिए सीधे-सीधे ज्यादा कमाई का मौका बन जाता है. अगर किसी फ्रीलांसर को किसी प्रोजेक्ट के लिए 200 डॉलर मिलते थे, तो वह पहले 16,000 रुपये के बराबर होते थे. लेकिन अब वही प्रोजेक्ट उसे 18,000 रुपये तक दे सकता है.

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रजनी उपाध्याय बीते करीब छह वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली रजनी ने आगरा विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. बचपन से ही पढ़ने-लिखने में गहरी रुचि थी और यही रुचि उन्हें मीडिया की दुनिया तक ले आई.

अपने छह साल के पत्रकारिता सफर में रजनी ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया. उन्होंने न्यूज, एंटरटेनमेंट और एजुकेशन जैसे प्रमुख वर्टिकल्स में अपनी पहचान बनाई. हर विषय में गहराई से उतरना और तथ्यों के साथ-साथ भावनाओं को भी समझना, उनकी पत्रकारिता की खासियत रही है. उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ खबरें लिखना नहीं, बल्कि समाज की धड़कन को शब्दों में ढालने की एक कला है.

रजनी का मानना है कि एक अच्छी स्टोरी सिर्फ हेडलाइन नहीं बनाती, बल्कि पाठकों के दिलों को छूती है. वर्तमान में वे एबीपी लाइव में कार्यरत हैं, जहां वे एजुकेशन और एग्रीकल्चर जैसे अहम सेक्टर्स को कवर कर रही हैं.

दोनों ही क्षेत्र समाज की बुनियादी जरूरतों से जुड़े हैं और रजनी इन्हें बेहद संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ संभालती हैं. खाली समय में रजनी को संगीत सुनना और किताबें पढ़ना पसंद है. ये न केवल उन्हें मानसिक सुकून देते हैं, बल्कि उनकी रचनात्मकता को भी ऊर्जा प्रदान करते हैं.

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