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कैंपस दूर नहीं लेकिन सपने अब भी दूर, GEN-OBC की तुलना में कॉलेजों में SC-ST आवेदन अब भी कम

कॉलेजों की संख्या और नामांकन तेजी से बढ़े हैं, लेकिन सामाजिक वर्ग और आय के आधार पर उच्च शिक्षा तक पहुंच में अब भी बड़ा अंतर है.

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  • उच्च शिक्षा में सीटें, कोर्स और संस्थान बढ़े हैं.
  • 2022 में 18-23 आयु वर्ग की भागीदारी 28% हुई.
  • SC/ST छात्रों की भागीदारी बढ़ी, पर सामान्य से कम.
  • आय पर निर्भर कोर्स चुनाव, फीस बड़ी बाधा.

देश में कॉलेज और विश्वविद्यालय तेजी से बढ़े हैं. सीटें बढ़ीं, नए कोर्स खुले और शहर-कस्बों तक संस्थान पहुंचे. फिर भी सवाल वही है क्या हर वर्ग के बच्चे बराबरी से उच्च शिक्षा तक पहुंच पा रहे हैं? आंकड़े बताते हैं कि पहुंच बढ़ी जरूर है, लेकिन अवसर अभी भी अमीर-गरीब और अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच बराबर नहीं हैं.

भारत की हायर एजुकेशन ने पिछले वर्षों में तेज रफ्तार पकड़ी है. 1950 में जहां सिर्फ करीब 500 कॉलेज थे, आज उनकी संख्या 50 हजार से अधिक है. विश्वविद्यालयों की गिनती भी सैकड़ों में है. 18-23 साल के युवाओं में कॉलेज जाने वालों की हिस्सेदारी 2012 के 16% से बढ़कर 2022 में 28% हो गई.

सामाजिक वर्गों में अंतर अभी कायम
नामांकन बढ़ा, पर सभी वर्गों में बराबर नहीं. बीते एक दशक में अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों का GER करीब 18% से बढ़कर 26% हुआ. अनुसूचित जनजाति (ST) में यह 12% से 19% तक पहुंच गया. लेकिन अभी भी सामान्य वर्ग और ओबीसी की तुलना में ये आंकड़े पीछे हैं.

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कोर्स का चुनाव भी आय पर निर्भर
एक तरफ बड़ा फर्क कोर्स के चुनाव में दिखता है. बेहतर आय वाले परिवारों के बच्चे इंजीनियरिंग, प्रोफेशनल और तकनीकी कोर्स ज्यादा चुनते हैं. कम आय वाले परिवारों के छात्र मानविकी (Arts) और कॉमर्स की ओर अधिक जाते हैं.

रिपोर्ट्स के अनुसार इंजीनियरिंग की डिग्री पर चार साल में औसतन 6-8 लाख रुपये तक खर्च आ जाता है. निजी कॉलेजों में यह खर्च और बढ़ जाता है. मेडिकल की पढ़ाई तो इससे भी ज्यादा महंगी है. ऐसे में कम आय वाले परिवारों के लिए इन कोर्स तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है.

खर्च बनता है सबसे बड़ी दीवार
कई सर्वे बताते हैं कि गरीब परिवारों के लिए कॉलेज की फीस, हॉस्टल, किताबें और शहर में रहने का खर्च बड़ी रुकावट हैं. कई बार छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं या सस्ते कोर्स चुन लेते हैं. सिर्फ कॉलेज खोल देना काफी नहीं, पढ़ाई सस्ती और सुलभ बनाना भी जरूरी है.

ये भी है एक बड़ा अंतर
दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों में कॉलेजों की संख्या ज्यादा है, जबकि उत्तर और पूर्व के कई जिलों में अब भी कम संस्थान हैं. कुछ जिलों में 10 से भी कम कॉलेज हैं, तो कुछ जगह सैकड़ों. इसी तरह शिक्षक-छात्र अनुपात भी हर जगह एक जैसा नहीं. जहां अच्छे कॉलेज हैं, वहां शिक्षक ज्यादा और सुविधाएं बेहतर हैं; बाकी जगह छात्रों को कम संसाधनों में पढ़ना पड़ता है.

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रजनी उपाध्याय बीते करीब छह वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली रजनी ने आगरा विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. बचपन से ही पढ़ने-लिखने में गहरी रुचि थी और यही रुचि उन्हें मीडिया की दुनिया तक ले आई.

अपने छह साल के पत्रकारिता सफर में रजनी ने कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया. उन्होंने न्यूज, एंटरटेनमेंट और एजुकेशन जैसे प्रमुख वर्टिकल्स में अपनी पहचान बनाई. हर विषय में गहराई से उतरना और तथ्यों के साथ-साथ भावनाओं को भी समझना, उनकी पत्रकारिता की खासियत रही है. उनके लिए पत्रकारिता सिर्फ खबरें लिखना नहीं, बल्कि समाज की धड़कन को शब्दों में ढालने की एक कला है.

रजनी का मानना है कि एक अच्छी स्टोरी सिर्फ हेडलाइन नहीं बनाती, बल्कि पाठकों के दिलों को छूती है. वर्तमान में वे एबीपी लाइव में कार्यरत हैं, जहां वे एजुकेशन और एग्रीकल्चर जैसे अहम सेक्टर्स को कवर कर रही हैं.

दोनों ही क्षेत्र समाज की बुनियादी जरूरतों से जुड़े हैं और रजनी इन्हें बेहद संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ संभालती हैं. खाली समय में रजनी को संगीत सुनना और किताबें पढ़ना पसंद है. ये न केवल उन्हें मानसिक सुकून देते हैं, बल्कि उनकी रचनात्मकता को भी ऊर्जा प्रदान करते हैं.

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