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Ethanol: माइलेज घटा और इंजन खराब हुआ तो जिम्मेदारी किसकी? E20 पेट्रोल पर भड़के ट्रांसपोर्टर्स, सरकार पर दागे सवाल

E20 Petrol News: देश में ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. एसोसिएशन ने कहा है कि करोड़ों के कमर्शियल वाहन 'नीतिगत प्रयोग' का जरिया नहीं हैं.

Transporters on Ethanol Blending: देशभर में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित E-20 पेट्रोल को तेजी से लागू किया जा रहा है. सरकार इसे हरित ऊर्जा, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में अहम कदम बता रही है. हालांकि, ट्रांसपोर्ट उद्योग ने इस नीति के तकनीकी और आर्थिक प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. ट्रांसपोर्ट संगठनों का कहना है कि यदि E-20 पेट्रोल के इस्तेमाल से इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित होती है, माइलेज कम होता है या रखरखाव का खर्च बढ़ता है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी, इस पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए.

छोटे ट्रांसपोर्टरों पर बढ़ सकता है आर्थिक दबाव

ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन का कहना है कि देश में लाखों छोटे और मध्यम ट्रांसपोर्टर बैंक से ऋण लेकर ट्रक, हल्के वाणिज्यिक वाहन और अन्य कमर्शियल वाहन संचालित कर रहे हैं. ऐसे में यदि E-20 पेट्रोल के कारण ईंधन की खपत बढ़ती है या वाहनों के रखरखाव पर अतिरिक्त खर्च आता है, तो इसका सीधा असर ट्रांसपोर्ट कारोबार की लागत पर पड़ेगा.

माइलेज घटने का दावा, बढ़ सकती है परिवहन लागत

एसोसिएशन का दावा है कि विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में E-20 ईंधन के उपयोग से लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक माइलेज कम होने की बात सामने आई है. भले ही यह आंकड़ा देखने में छोटा लगे, लेकिन रोजाना लंबी दूरी तय करने वाले व्यावसायिक वाहनों के लिए यह हर महीने हजारों रुपये का अतिरिक्त ईंधन खर्च बन सकता है. ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि यदि ऐसा होता है तो अंततः इसका असर मालभाड़े, व्यापारिक लागत और आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा.

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पुराने वाहनों की तकनीकी सुरक्षा पर भी उठे सवाल

ट्रांसपोर्ट संगठनों ने यह भी चिंता जताई है कि जो पुराने कमर्शियल वाहन E-20 ईंधन के अनुरूप डिजाइन नहीं किए गए हैं, उनमें फ्यूल पाइप, रबर सील, गैस्केट, फ्यूल पंप और ईंधन प्रणाली के अन्य हिस्सों पर अतिरिक्त प्रभाव पड़ सकता है. उनका कहना है कि यदि भविष्य में ऐसे वाहनों में तकनीकी खराबियां सामने आती हैं, तो वाहन निर्माता कंपनियां, तेल कंपनियां या सरकार में से कौन इसकी जिम्मेदारी लेगा, यह पहले से स्पष्ट होना चाहिए.

'नीतिगत प्रयोग' का माध्यम न बनें करोड़ों के वाणिज्यिक वाहन

एसोसिएशन का कहना है कि देश में करोड़ों रुपये मूल्य के वाणिज्यिक वाहनों को किसी नई नीति का प्रयोगात्मक आधार नहीं बनाया जाना चाहिए. संगठन का मानना है कि किसी भी नई ईंधन नीति को व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों का स्वतंत्र, पारदर्शी और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप परीक्षण कराया जाना चाहिए तथा उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए.

सरकार के सामने रखे गए चार बड़े सवाल

ट्रांसपोर्ट उद्योग ने केंद्र सरकार से कई अहम सवाल पूछे हैं. इनमें यह जानना शामिल है कि क्या देश में चल रहे सभी वाणिज्यिक वाहन E-20 के लिए पूरी तरह सुरक्षित और प्रमाणित हैं. क्या सरकार के पास ऐसा कोई सार्वजनिक वैज्ञानिक अध्ययन है जो 8 से 15 वर्ष पुराने कमर्शियल वाहनों पर E-20 के सुरक्षित उपयोग की पुष्टि करता हो. यदि भविष्य में इंजन या फ्यूल सिस्टम में खराबी आती है तो उसकी भरपाई कौन करेगा. साथ ही, यदि माइलेज घटने से परिवहन लागत बढ़ती है तो उसका आर्थिक बोझ ट्रांसपोर्टर, व्यापारी या आम उपभोक्ता में से कौन उठाएगा.

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IIT समेत विशेषज्ञों की संयुक्त समिति बनाने की मांग

एसोसिएशन ने कहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और किसानों के हितों के पक्ष में है, लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने के दौरान ट्रांसपोर्ट उद्योग पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ना चाहिए. संगठन ने केंद्र सरकार से मांग की है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT), वैज्ञानिक संस्थानों, वाहन निर्माता कंपनियों, तेल कंपनियों और ट्रांसपोर्ट संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल कर एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जाए. यह समिति वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में E-20 के प्रभावों का विस्तृत अध्ययन करे और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए.

क्षतिपूर्ति नीति और जवाबदेही तय करने की भी मांग

ट्रांसपोर्ट संगठनों का कहना है कि यदि E-20 के कारण किसी वाहन को तकनीकी या आर्थिक नुकसान होता है, तो उसके लिए स्पष्ट जवाबदेही तय की जानी चाहिए. साथ ही प्रभावित वाहन मालिकों और ट्रांसपोर्टरों के लिए क्षतिपूर्ति की पारदर्शी व्यवस्था भी घोषित की जानी चाहिए.

'यह केवल ईंधन का नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था का मुद्दा'

एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेन्द्र कपूर ने कहा कि यह मामला केवल ईंधन बदलने तक सीमित नहीं है. इसका संबंध करोड़ों वाहन मालिकों, लाखों ट्रांसपोर्ट कारोबारियों, व्यापारिक गतिविधियों और देश की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा हुआ है. उन्होंने मीडिया और जनप्रतिनिधियों से भी इस विषय को गंभीरता से उठाने की अपील करते हुए कहा कि नई नीति लागू करने से पहले वैज्ञानिक पारदर्शिता, आर्थिक सुरक्षा और स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है.

अभिषेक नयन का पत्रकारिता में लंबा अनुभव है. साल 2011 से ABP News से जुड़े हैं. दिल्ली-NCR की राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक समस्याओं की जमीनी इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग करते हैं.

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