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क्या है हलाला? जानें- कैसे मुल्लाओं ने की है इस अच्छे नियम से शरारत

शादी और तीन तलाक की इस सीरीज़ में वादे को तो तोड़ते हुए आज जानने की कोशिश करते हैं कि क्या है हलाला? और जो वादा है उसे अगली कड़ी में पूरा किया जाएगा.

मुसलमानों ने अपने 1400 साल के इस्लामी इतिहास में हलाला जैसे प्रोग्रेसिव नियम के साथ जो भद्दा मज़ाक़ किया उसकी मिसाल नहीं मिलती. ये वो मुद्दा है जिसके बचाव में कोई भी मौलवी-मौलाना तर्क पेश नहीं कर सकता. जो मौलवी-मौलाना इस भद्दे मज़ाक़ से खुद को अलग करते हैं तो वे सरासर झूठे हैं और फरेबी हैं. इसे उनकी मक्कारी की इंतेहा से ताबीर किया जा सकता है.

हां! ये बात सही है कि हलाला जैसे प्रोगेसिव नियम से भद्दे मज़ाक़ करने वालों में सीधे तौर पर बड़े मौलाना शामिल नहीं हैं, लेकिन उसे रोकने के लिए उन्हें जो कदम उठाने चाहिए वो भी उन्होंने नहीं किए. बल्कि उनकी मौन सहमति रही. सवाल है कि आखिर क्या है हलाला.

आखिर क्या है हलाला?

इस सीरीज़ की पहली कड़ी में हम तलाक के बारे में बता चुके हैं. अब बात हलाला की. अगर कोई पति अपनी पत्नी को पूरी तलाक (तलाक-ए-मुगल्लज़ा) यानी तीन तलाक दे देता है तो अब पति अपनी उस बीवी से दोबारा शादी नहीं कर सकता. याद रहे कि ये तीन तलाक तीन महीने में दिए जाए या एक ही बार में तीन तलाक दे दिए गए हों. पूरी तलाक का मतलब है कि अब उस महिला और पुरुष के बीच दोबारा शादी नहीं हो सकती... और अब ये पुरुष और महिला किसी दूसरे से शादी करने को आज़ाद हैं.

नियम ये है कि महिला ने किसी दूसरे शख्स से शादी की और फिर उससे तलाक हो गया या पति मर गया तो अब महिला फिर से किसी दूसरे शख्स से शादी करने को आज़ाद है. और अब औरत अपने पहले पति से भी शादी कर सकती है. मेरा मानना है कि ये नियम एक प्रोगेसिव नियम है और शादी को आसान बनाया गया है.

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हां! शर्त ये भी रखी कि ये महज़ इत्तेफाक़ होना चाहिए. यानी कोई महिला जानबूझकर दूसरे शख्स से शादी करे और फिर तलाक लेकर पहले पति से शादी करना चाहे तो ऐसा नहीं हो सकता. ये नियम कुरआन का है जिसका इनकार करने वाला मुसलमान नहीं हो सकता. लेकिन यहीं से शुरू होती है मौलानाओं की शैतानी और उन्होंने इस्लाम के इस नियम की ऐसी तैसी कर दी.

मौलानाओं ने खेल क्या किया?

ये सच है कि मुल्ला-मौलानाओं की जमाअतें भी सियासी खेल में माहिर होती हैं, लेकिन यहां उन्होंने खुद अपने मज़हब से खेल किया. खेल ये किया कि अगर पति ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया और फिर उस औरत से दोबारा शादी करना चाहता है तो मौलानाओं ने दबे पांव हलाला की सलाह दे डाली.

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अब तलाकशुदा हो चुकी महिला की शादी किसी दूसरे मर्द से की जाती है. फिर उससे तलाक लिया जाता और फिर उसकी शादी उसके पहले पति से कर दी जाती है. ये सभी काम जानबूझकर होता है, जो हराम है, लेकिन काज़ी इस काम को अंजाम देते हैं और पैसा भी कमाते हैं. इसे निकाह-ए-हलाला  भी कहते हैं. ये तरीका महिलाओं के साथ ज़ुल्म है. अब जब सुप्रीम कोर्ट इस निकाह-ए-हलाला की भी समीक्षा कर रहा है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी अपने जवाब में इसे बैन करने की वकालत की है.

अब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड आबे जम जम से चाहे कितना भी वजू करे... ये पाप धुलने वाले नहीं हैं. खास बात ये है कि इस पाप में सूफी, बरेलवी और देवबंदी सभी बराबर के शरीक हैं.

अब अगली कड़ी में जानेंगे कि मुसलमानों के बीच एक से ज्यादा शादी का चलन कितना है और कैसे घोर राष्ट्रवादी हिंदू इसे लेकर मुसलमानों को बदनाम करते हैं. साथ ही अलग-अलग समुदायों के लिए पर्सनल लॉ क्या हैं?, क्या सभी राज्यों और सभी समुदायों के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाना और उसे लागू करना मुमकिन है? और क्या हैं सियासत की शरारतें? इन सब मुद्दों पर भी चर्चा होगी.

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