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Opinion: सपा नेता जावेद अली ने बहुसंख्यक जहर वाले यूं ही नहीं दिया बयान, इसके पीछे छिपे बड़े सियासी मायने

समाजवादी पार्टी (सपा) के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान ने मुरादाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान आरोप लगाया कि बीजेपी ने बहुसंख्यक आबादी में जहर घोल दिया गया है. राजनीतिक विश्लेषक राहुल लाल उनके बयान को चौंकाने वाला और बड़काऊं बताया. उन्होंने कहा कि जावेद अली खान के इस बयान से पार्टी को लाभ होने की संभावना कम दिखती है. यदि यह माना जाए कि बहुसंख्यक समाज जहरीला हो गया है, तो हमें 2024 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में देखना होगा. उस समय बीजेपी ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के माध्यम से एक लहर बनाने की कोशिश की थी, बावजूद इसके उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव का भी रिकॉर्ड तोड़ते हुए 37 सीटें जीतीं.

जावेद अली के बयान से 'रिवर्स पोलराइजेशन' का खतरा

इसका मतलब है कि उन्हें मुस्लिम समाज के साथ-साथ मौर्य, शाक्य, सैनी, पाल, कुर्मी और निषाद जैसे बहुसंख्यक समाज का भी भारी समर्थन प्राप्त हुआ. यहां तक कि दलितों ने भी, जो कभी सपा से नाराज माने जाते थे, उन्हें जमकर वोट दिया और सामान्य सीटों पर भी सपा के दलित उम्मीदवार जीते. ऐसे में जब जावेद अली यह कहते हैं कि बहुसंख्यक समाज जहरीला हो गया है, तो इस बयान को स्वीकार करना मुश्किल होता है. यह एक प्रकार का "सेल्फ गोल" है जो भारतीय जनता पार्टी के नैरेटिव को ही आगे बढ़ाता है. वर्तमान में देश महंगाई (जो 9% पार कर चुकी है), बेरोजगारी और NEET पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है. युवाओं ने बीजेपी से नाराज होकर सपा और कांग्रेस को भारी वोट दिए थे. इसलिए सपा को PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के सर्व-समावेशी स्लोगन और जन सरोकार के मुद्दों को गंभीरता से उठाना चाहिए. जावेद अली का यह कहना कि बहुसंख्यक क्षेत्रों में समझाना मुश्किल है, सपा की रणनीति के विपरीत "रिवर्स पोलराइजेशन" पैदा कर सकता है.

अखिलेश यादव की छवि हिंदू विरोधी होने का डर

अखिलेश यादव ने 2017 और 2019 की गलतियों से सीखकर बहुत कठोर परिश्रम किया है, जिसके परिणामस्वरूप सपा देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी है. ऐसे में इस तरह के बयान उन ओबीसी और दलित मतदाताओं को आहत कर सकते हैं जो बीजेपी छोड़कर सपा की तरफ आए थे और वे फिर बीजेपी की ओर रुख कर सकते हैं. इससे बीजेपी को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि सपा "बहुसंख्यक विरोधी" या "हिंदू विरोधी" है. जबकि अखिलेश यादव स्वयं हिंदू सेंटीमेंट की रक्षा के लिए इटावा में भव्य मंदिर बनवा रहे हैं और अयोध्या में जमीन घोटाले जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं. इन्ही प्रयासों के कारण 2024 में अयोध्या और उसके आसपास की सीटों पर इंडिया गठबंधन को जीत मिली.

मुस्लिम वोटों का बिखराव रोकने की कोशिश

विपक्ष के लिए यह जरूरी है कि वह सर्वसमावेशी और मूलभूत मुद्दों पर ही केंद्रित रहे. जनता में पहले से ही आक्रोश और निराशा है. जावेद अली जैसे नेताओं को समझना चाहिए कि चाहे यह बयान अति-उत्साह में दिया गया हो या किसी दबाव में, यह अखिलेश यादव द्वारा संविधान की सुरक्षा, 69000 शिक्षक भर्ती और जातिगत जनगणना के लिए किए जा रहे प्रयासों को नुकसान पहुंचाता है. कुछ लोग तर्क देते हैं कि यह बयान मुस्लिम वोटों के बिखराव को रोकने के लिए दिया गया होगा, लेकिन जो लोग सांप्रदायिक राजनीति से दूर विकास चाहते हैं, उनमें ऐसे बयानों से असंतोष पैदा होता है.

अब जबकि सबकी निगाहें 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर टिकी है, इस तरह की बयानबाजी उचित नहीं है. चाहे ओवैसी बंधुओं का प्रभाव कम करना हो या मुस्लिम वोटों को सुरक्षित करना, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बजाय महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और बिजली कटौती जैसे जन सरोकार के मुद्दों को उठाना ही सपा के लिए बेहतर होगा. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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