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Opinion: दलगत भावना से ऊपर सीएम योगी आदित्यनाथ का राजधर्म

राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का अपना व्याकरण होता है और कोई भी राजनेता अपने विरोधी पर आक्रमण से नहीं चूकता. ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि हर दल की अपनी विचारधारा होती है, चुनावी रणनीतियां होती हैं और इसी के आधार पर जनता उनका आकलन करती है. लेकिन, जब कोई शासक दलगत सीमाओं को लांघकर समाज के समग्र हित में खड़ा होता है, तो वह राजनीति में विशिष्ट दिखाई देने लगता है. वह राजधर्म का पालन करने वाले शासक के रूप में दिखाई देने लगता है. ऐसे समय में जबकि राजनीतिक संस्कृति का क्षरण होने लगा है, जहां विरोधी दल के नेता को शत्रु मानकर बयानबाजियां की जाने लगी हैं, यहां तक कि परिवार तक को निशाने पर लिया जाने लगा है, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजधर्म का पालन करते हुए राजनीति का आदर्श प्रस्तुत करते हुए एक सामान्य राजनेता से ऊपर दिखाई देते हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की बेटी को लेकर जब कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर भ्रामक और आपत्तिजनक सामग्री फैलाई तो सीएम योगी ने न सिर्फ इसे गंभीरता से लेते हुए मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया बल्कि आजमगढ़ में सभा के दौरान ऐसे लोगों को स्पष्ट संदेश भी दिया- ‘बेटी के खिलाफ कोई भी अपमानजनक टिप्पणी स्वीकार नहीं है. बेटी तो बेटी है. हम उन संस्कारों में पले-बढ़े हैं जहां गांव की बेटी सबकी बेटी होती है, बहन पूरे गांव की होती है.’ ऐसे संकल्प मुख्यमंत्री के सांस्कारित सामाजिक बोध को दर्शाते हैं.  राजनीति में प्रतिद्वंद्विता की परिभाषा में विरोधी को कमज़ोर करना, उसके आधार क्षेत्रों की उपेक्षा करना और उसके अतीत से गड़े मुर्दे उखाड़कर वार करना आदि तरीके शामिल हैं.

सोशल मीडिया में यह तरीके और भी आक्रामक हो जाते हैं जिसमें अब नेताओं के परिवार को शामिल करने की विकृति भी दिखाई देने लगी है. यह राजनीतिक संस्कृति का वह क्षरण है जिस पर समाज के हर सचेत व्यक्ति को चिंता होनी चाहिए. ऐसे में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की बेटी को लेकर की गई टिप्पणी पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो कदम उठाया, वह राजनीतिक आचार-व्यवहार का आदर्श है जिसमें यह संदेश निहित है कि सत्ता का उपयोग केवल अपने दल के हितों की रक्षा के लिए न होकर समता का होना चाहिए. लोकतंत्र में मतभेद संभव है, विवाद संभव है, तीखी बहसें भी स्वीकार्य हैं लेकिन व्यक्तिगत गरिमा का हनन नहीं होना चाहिए और मन भेद भी नहीं होना चाहिए. 

योगी सरकार में यह वैचारिक परिपक्वता और गहरी तथा व्यापक नज़र आती है. उत्तर प्रदेश में चल रहे विकास कार्यों की ही बात करें. प्रदेश की राजनीति में एक अलिखित और पक्षपातपूर्ण नियम दशकों से चला आ रहा था, विकास वहीं जहां सत्ता के विधायक हों. इस व्यवस्था का कोई आदेश नहीं जारी होता था लेकिन नेता, अधिकारी और यहां तक कि  जनता भी जानती थी. सत्ता के इस सौतेलेपन को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तोड़ा. आजमगढ़ का ही उदाहरण लें, जहां आतंकवाद की जड़ें थीं, पिछड़ेपन का बोझ था, अपराधियों का बोलबाला था, योगी सरकार की प्राथमिकता से वहां बदलाव हुआ. राजनीतिक रूप से आजमगढ़ में सपा का वर्चस्व रहा है. पहले मुलायम सिंह यादव फिर अखिलेश यादव का प्रभाव रहा है .

वर्तमान में भी यहां न भाजपा का कोई विधायक है और न ही सांसद. मुख्यमंत्री ने राजनीतिक प्रतिशोध की राह नहीं अपनाई और आज़मगढ़ को पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, विश्वविद्यालय, एयरपोर्ट, संगीत महाविद्यालय आदि क्या कुछ नहीं मिला.  योगी मानते हैं कि विकास को वोट के तराजू पर नहीं तौला जाना चाहिए. रामपुर उनकी इस अवधारणा को चरितार्थ करता है. रामपुर वर्षों तक एक ऐसा राजनीतिक किला बना रहा, जहां एक नेता की इच्छा ही कानून था. केंद्र व राज्य की योजनाएं भी उक्त नेता के अनुग्रह की मोहताज थीं. वहां की किलेबंदी टूटी तो समावेशी भाव में विकास भी हुआ. मैनपुरी को भी इस श्रृंखला में रखा जा सकता है जो सपा की भावनात्मक धड़कन है. वहां भी सरकारी योजनाओं ने अपना रास्ता बनाया.

जल जीवन मिशन का पानी उन घरों की रसोई तक भी पहुंचा जिनके दरवाजों पर समाजवादी पार्टी का झंडा लहरा रहा था. यह भी सबका साथ सबका विकास कि नीति पर केंद्रित था. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने कई सीटों पर जीत हासिल की लेकिन योगी सरकार ने संकुचित मानसिकता नहीं दिखाई और वहां भी अनवरत विकास कार्य होते रहे. सदियों से पलायन और सूखे का दंश झेल रहा बुंदेलखंड किसी एक दल का अभेद्य गढ़ भले ही नहीं रहा लेकिन योगी सरकार में बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का उपहार उसे भी मिला.

विकास को वोटों की दृष्टि से न देखना ही लोकतांत्रिक परिपक्वता की असली पहचान है. सत्ता में ऐसा ही नैतिक साहस होना चाहिए.  राजनीति में पूर्ण निस्पृहता का दावा करना उचित नहीं होगा, लेकिन इस पर तो विचार किया ही जाना चाहिए कि कौन शासक वोट के लिए काम कर रहा है और कौन सिर्फ इसलिए अच्छा काम कर रहा क्योंकि वह उसे अपना धर्म समझता है. जब कोई शासक अपने राजनीतिक विरोधी की बेटी की अस्मिता से स्वयं को जोड़कर प्रभावी कदम उठाता है तो यह उसकी अंतरात्मा की शुचिता को सामने रखता है. भारतीय संविधान की प्रस्तावना से लेकर उसके अनुच्छेदों तक, सभी जगह यही भाव है कि राज्य का संरक्षण और उसके संसाधन किसी एक वर्ग, जाति, दल या क्षेत्र के लिए नहीं हो सकते. शासन को निष्पक्ष होना चाहिए.

दलगत भावना से ऊपर उठकर काम करना उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है और इस मानसिकता को चुनौती देती है जो यह मानकर चलती हैं कि राजनीति की कोई मर्यादा नहीं होती, नैतिकता नहीं होती. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की बेटी के प्रति अशोभनीय टिप्पणी लोग  कल भूल जाएंगे लेकिन एक बात यह जरूर याद रहेगी कि योगी जी के रूप में एक मुख्यमंत्री ने यह उदाहरण रखा था कि सत्ता मनुष्यता की दुश्मन नहीं होती. यह बोध जब सभी राजनीतिक दलों में आ जाएगा तो लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप और स्वर्णिम दिखाई देगा.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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