Opinion: उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाज में जाति धर्म के आगे प्रेम-हत्या क्यों बढ़ रही है?

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के लालगंज में पिता ने रेस्टोरेंट में बेटी और उसके प्रेमी को गोली मार दी. गौरतलब है कि आजमगढ़ में इस दौरान कई ऐसी घटनाएं हुई जहां लड़के लड़की के बीच प्रेम संबंधों की वजह से हत्याएं या हिंसक वारदातें हुई है और उन घटनाओं में इसाफ की मांगों की आवाज उंचे स्वरों में गूंजी. लेकिन लालगंज घटना में इंसाफ की मांग उस तरह से नहीं उठी. आखिर क्यों ? क्या शायद इसलिए कि पिता ने बेटी को मारा. क्या इसका मतलब यह कि हमारा समाज इस क़त्ल को इंसाफ के बतौर देखता है. इस तरह के सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश यहां हम कर सकते हैं.
लाल गंज की घटना के बाद शायद ही कोई राजनीतिक या सामाजिक संगठन के लोग लड़की और लड़के के घर गए हो और घटना पर प्रतिक्रिया दी हो. एक तरह से चुप्पी और सन्नाटा. फिर सवाल इस तरह से उभरा कि क्या ये सब इसलिए देखने को मिल रहा है क्योंकि दोनों एक ही जाति के है. जिसे क्षत्रीय जाति कहते हैं. अगर दोनों अलग जातियों के होते तो ऐसा नहीं होता.क्या प्रेम संबंधों की हत्या कोई राजनीतिक दायरे का विषय नहीं है? बेटी की पिता द्वारा की गई हत्या की कारवाई पितृसत्तात्मक विचारधारा के विरोध का आधार नहीं बनता है ? क्या इनकी हत्या के बाद इंसाफ का दायरा सिकुड़ ही नहीं जाता है बल्कि इंसाफ के दरवाजे बंद हो जाते हैं. अगर हम इंसाफ की मांग नहीं करते तो क्या इस हत्या को जायज मानते हैँ या इससे मुँह छिपा लेना ही उचित समझा जाता है. इस तरह भारतीय समाज में जडता के समर्थक होने के अलावा कोई और प्रमाण नहीं दे रहे हैं.
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इस घटना के दूसरे दिन लालगंज उस रेस्टोरेंट पर गया जिसके मालिक रेस्टोरेंट का सामान हटा रहे थे. पूछने पर कहा कि बंद कर रहे हैँ. वे कुछ व्यक्तियों से लड़की और लड़के के घर के बारे में पूछने पर पिता द्वारा की गई वारदात को जायज ठहराते हुए गौरवान्वित भाव में घटना की कहानी सुनाते हैँ. आखिर उस लड़की के इंसाफ की बात किससे करते. लड़के के घर का पताकर पहुंचे तो मालूम चला कि वाराणसी में किसी अस्पताल में भर्ती है जहां उसका आपरेशन होने वाला है.
इस घटना के अलावां पिछले दिनों कई घटनाओं में देखने को आया कि समाज में प्रेम को लेकर हो रही घटनाओं में जाति और धर्म के इर्द गिर्द ज़्यदा बहसें हुई है. निश्चित रूप से जाति और धर्म हमारे समाज पर अपना वर्चस्व रखता है . पर प्रेम को अस्वीकार करता समाज भी वास्तविकता है और सम्मान के लिए हत्या या हिंसा को जायज ठहराते हुए दिखता है. क्या यही जाति और धर्म का भी सच है ?
आजमगढ़ के जीयनपुर में एक दलित युवक की एक यादव जाति की लड़की से प्रेम के चलते सरेराह पीटने के वीडियो के साथ उसकी मृत्यु की चर्चा खूब हुई. मृतक के घर वालों का आरोप था कि उसे पीटने के बाद दवा के नाम पर जहर खिला दिया गया. वहीं लड़की की तरफ वालों का कहना था कि उसने खुद जहर खाया. इस मामले में जब लड़की भी सामने आई तो उसने कहा कि उसने खुद जहर खाकर उसके घर वालों को आरोप लगा दिया. इसके बाद तो सोशल मीडिया पर लड़के और लड़की की फोटो वायरल होने लगी. जाँच और कानून तय करेगा कि हकीकत क्या है. पर जो बातें आईं उससे साफ है कि यह प्रेम का मामला था. चाहे वह आपस में किसी तरफ से कम या ज्यादा रहा हो. उस दलित युवक को पीटा गया यह हकीकत वायरल वीडियो से स्पष्ट है. आखिर उस दलित युवक को प्रेम की
वजह से ही पीटा गया. यह पिटाई जातीय विद्वेष के साथ सामाजिक ऊंच-नीच तथाकथित सम्मान के नाम पर ही की गई. जैसे पहली घटना जिसमें क्षत्रीय जाति लड़का लड़की का था उसमें दबे स्वर में यही कहा जा रहा था कि एक ही जाति के थे सुलझा लेना चाहिए था .उसी तरह दलित युवक जो कि सरकारी नौकरी करता था , उसके सम्बद्ध में कहा गया कि जाति को भूल जाना चाहिए था. आखिर लड़का सरकारी नौकरी कर रहा था.
इससे अलग आजमगढ़ के ही तरवाँ थाने में दलित युवक की हिरासत में मौत के बाद बड़े पैमाने पर विरोध और आगजनी हुई. लड़के के परिवार का कहना था कि जिस लड़की की वजह से यह सब हुआ उसी लड़की के घर के सामने अंतिम संस्कार करेंगे. मामला यह था कि लड़का-लड़की एक जाति के थे. लड़की के पिता अध्यापक और लड़के के पिता देश के एक महानगर में मजदूर. घटना के कुछ दिनों पहले ही लड़की के घर वालों ने पुलिस को शिकायत की जिसको लेकर दोनों पक्षो में समझौता हुआ कि दोनों बात नहीं करेंगे. फिर हुआ कि दोनों बात फिर से करने लगे. जिसकी शिकायत थाने को की गई. थाने ने फिर से लड़के को हिरासत में लिया और हिरासत में लड़के की मौत हो गई.
राजनीतिक-सामाजिक संदर्भों में हिरासत में दलित युवक की हत्या और इंसाफ का सवाल ही उठा. जिस प्रेम की वजह से हत्या हुई उसके विषय में बातचीत नहीं हुई क्योंकि उसकी सामाजिक अस्वीकारता है. जबकि उस युवक की मौत का कारण प्रेम था. दो व्यक्तियों के प्रेम को कैसे समाज-परिवार तय करेगा.परिवार की भी क्या सीमाएं हो सकती है. क्या प्रेम इसलिए अस्वीकार कर दिया जाएगा कि दोनों एक ही गांव में चंद फासले पर उनके घर थे. यहाँ शायद एक जाति होने के बाद भी यह बात नहीं कही गई क्योंकि कि दोनों एक जाति के.
यहाँ ग्रामीण-शहरी समाज, आधुनिकता बनाम रूढ़ि और एक जाति के होने के बावजूद वर्ग के अन्तर्विरोधों को नजर अंदाज किया जा रहा. एक फिल्मी गाना है मेरे सामने वाली खिड़की में चांद का टुकड़ा रहता है. क्या इस गाने को जिस ग्रामीण समाज में गांव की लड़की को पूरे गांव की लड़की, बहन या मां के रूप में देखा जाता है वहां सोचा जा सकता है. अगर सोचेंगे तो क्या वह ग्रामीण ढांचा इसकी इज़ाज़त देगा. एक नजरिए से देखें तो यह परम्परा ग्रामीण ढांचे को मजबूत करती है.
ऐसे में व्यक्ति के लिए स्वयत्ता-स्वतंत्रता जैसे शब्द बेमानी हो जाते हैं. आधुनिकता बनाम रूढ़ि के इस संघर्ष में वर्गीय चरित्र भी अहम है .लड़की का पिता अध्यापक और लड़के का पिता मजदूर. प्रेम तो जाति-पूंजी को भुला देता है. पर इन प्रेमियों का जो सामाजिक घेराव है ,वह इसी आधार पर खड़ा है. उसका अस्तित्व,मान-सम्मान, स्वाभिमान सब इसी पर टिका है. यह इतना मजबूत है कि सामाजिक राजनीतिक संगठन भी इसके खिलाफ तो दूर इस पर बात नहीं करेंगे.
झूठी शान के नाम पर कत्ल
मुस्लिम समाज के ऊपर धार्मिकता का लेबादा लगाकर लव जेहाद का आरोप लगाया जाता है. खासतौर जब हिन्दू लड़की से मुस्लिम लड़का प्रेम विवाह से जुड़ जाता है. उस मुस्लिम समाज में भी लड़के-लड़की के कई मामलों में यह सुना जाता कि मुस्लिम लड़कियां मर गयीं थीं क्या. सबसे बड़ा सवाल लड़की जाति कैसे तय कर सकती है. यह वो मानसिकता है जो किसी की जान तक ले सकती है. यह तय न करने के अधिकार के बगैर कितनी कहानियां अधूरी रह जाती हैँ.
सोचिए वह लड़की जिसके प्रेम की हत्या हो गई, वह क्या जिंदगी भर अपने जीवन की सबसे बड़ी त्रासद घटना को भूल सकेगी. उसे तो उस चाहरदिवारी में रोने-सिसकने का अधिकार नहीं. दूसरी तरफ वो परिवार उसे अपने बेटे को लील ले जाने वाली के रूप में देखता है. वह समाज जो सम्मान के नाम पर हुई हत्या पर दम्भ भरता है, वह उस लड़की के चरित्र का प्रमाणपत्र बांटता है.
इस तरह की मानसिकता जाति विशेष तक सीमित नहीं है. आजमगढ़ के कप्तानगंज में पिछले दिनों दलित समाज की लड़की से फोन पर बात करने को लेकर पिछडी राजभर जाति के लड़के की हत्या हो गई. इसी थाने के एक गांव में एक पिछडी जाति की लड़की और दलित जाति के लड़के के बात करने का मामला थाने गया तो थाने वालों ने सुबह बुलाया. लेकिन सुबह तो सबने देखी सिवाय उस लड़की के. लड़की ने फांसी लगाकर जान दे दी . ऐसा अख़बारों में दर्ज हुआ. ये सब लड़के-लड़कियां लगभग वे हैँ जो अभी कुछ बालिग़ होने की सीढ़ी चढ़ रहे. कुछ प्रेम में बालिग़ हुए जहाँ अपने को परिपक्व कहने वाले समाज की व्यवस्था ने उनकी जान ले ली.
वैसे तो लड़के-लड़कियों दोनों को इसे झेलना पड़ता है. लड़कों की लड़ाई तो पुरूषवादी समाज में आत्म सम्मान स्वाभिमान के नाम पर थोड़ी लड़ ली जाती है. पर लड़कियों के इंसाफ की लड़ाई तो दूर उससे ज़्यादा उठाने पर कोसने के लिए होती है. यही सभ्य समाज कहता है. बंद करो इज्जत की क्यों बाट लगा रहे. हाँ जातीय या धार्मिक दृष्टिकोण सामाजिक-राजनीतिक बहसो में रहती है. प्रेम संबधों को स्वीकारने को खुलेमन से तैयार नहीं.
आजमगढ़ शहर में ही एक स्कूल की बच्ची के छत से कूदने की खबर आई. छत से कूदने से पहले बच्ची को प्रिंसिपल के रूम से निकलते हुए सीसीटीवी फुटेज में देखा गया. सवाल उठा कि ऐसा क्या हुआ जो उसने ऐसा कदम उठाया. आरोप मढ़ देना आसान है. उसके पास से मोबाइल फोन और कुछ आपत्तीजनक वस्तुएं मिली. शायद उसको किसी से प्रेम था ऐसा भी. सवाल है कि प्रेम था तो ऐसा क्या हो गया जो वह बच्ची अपनी जिंदगी से नफरत कर बैठी.
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]































