US-ईरान डील: मिडिल ईस्ट के भयावह युद्ध का अंत नजदीक, अगले 60 दिन काफी महत्वपूर्ण, जानें क्यों?

मिडिल ईस्ट में कई महीनों से जारी तनाव और सैन्य टकराव का आखिरकार खात्मा हो चुका है. अब ऐसा माना जा सकता है कि दुनिया ने इस संकट से राहत की सांस ली है, भले इजरायल इस डील से नाखुश हो. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक व्यापक समझौता हो गया है, जबकि ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने भी युद्ध समाप्ति से जुड़े एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग को अंतिम रूप दिए जाने की पुष्टि की है. अगर आने वाले दिनों में यह समझौता औपचारिक रूप से लागू हो जाता है तो इसे पिछले कई दशकों में मिडिल ईस्ट की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियों में गिना जा सकता है.
यह समझौता सिर्फ युद्धविराम तक ही सीमित नहीं है. इसके राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक पहलू इतने व्यापक हैं कि इनके असर पूरी दुनिया में महसूस किए जा सकते हैं. इस जंग की वजह से कॉर्पोरेट जगत में जो शिथिलता आ गई थी, अब जल्द ही इसमें तेजी देखने को मिलेगी, खास कर एशिया के बाजारों में.
डील के मुख्य बिंदु क्या हैं?
अब तक सामने आई जानकारी के मुताबिक समझौते के सात बड़े पहलू हैं.
सबसे पहला और महत्वपूर्ण बिंदु है सैन्य कार्रवाइयों का तत्काल और स्थायी अंत. ईरानी और अमेरिकी पक्ष का कहना है कि सभी सक्रिय मोर्चों पर सैन्य गतिविधियां रोकी जाएंगी. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि लेबनान में चल रही सैन्य गतिविधियां भी इस व्यवस्था के दायरे में आएंगी.
दूसरा बड़ा बिंदु है स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ का दोबारा खुलना. दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. हाल के तनावों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भारी अनिश्चितता पैदा हो गई थी. यूरोपीय देशों ने भी इस जलमार्ग को तत्काल और बिना शर्त खोलने की मांग की थी.
तीसरा बिंदु है अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी का अंत. ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक पाबंदियां हटाएगा, जिससे टैंकर और मालवाहक जहाज़ सामान्य रूप से काम कर सकेंगे.
चौथा और शायद आर्थिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण पहलू है प्रतिबंधों में राहत. रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र पर लगाए गए प्रतिबंधों को निलंबित करेगा. इससे ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक दोबारा पहुंच मिल सकती है.
पांचवां बिंदु है विदेशों में फ्रीज किए गए ईरानी फंड्स की वापसी. पिछले तकरीबन सैतालिस सालों से कई देशों में जमे अरबों डॉलर के ईरानी संसाधनों को चरणबद्ध तरीके से रिलीज़ करने की चर्चा है. ईरान लंबे समय से इसे अपनी प्रमुख मांगों में शामिल करता रहा है.
छठा बिंदु है ईरान के पुनर्निर्माण और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए लगभग 300 अरब डॉलर तक के संभावित निवेश और सहायता कार्यक्रम. यदि यह योजना व्यवहारिक रूप लेती है तो ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए यह ऐतिहासिक राहत साबित हो सकती है. ऊर्जा, परिवहन, उद्योग और सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में बड़े निवेश की संभावना जताई जा रही है.
सातवां और सबसे संवेदनशील मुद्दा है ईरान का परमाणु कार्यक्रम. अमेरिकी प्रशासन ने साफ तौर पर ये कहा है कि किसी भी अंतिम समझौते का आधार यह होगा कि ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दोहराया है कि ईरान कभी भी परमाणु बम हासिल नहीं करेगा. दूसरी ओर, ईरान इस बात पर जोर देता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है.
अभी अंतिम समझौता नहीं हुआ है
हालांकि इन घोषणाओं ने दुनिया भर में सुर्खियां बटोरी हैं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह अभी अंतिम और व्यापक शांति संधि नहीं है. मौजूदा जानकारी के मुताबिक स्विट्ज़रलैंड में प्रस्तावित हस्ताक्षर के बाद अगले 60 दिनों तक लंबी बातचीत जारी रहेगी. इन्हीं वार्ताओं में परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों की पूरी समाप्ति, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े जटिल मुद्दों पर आखिरी फैसले लिए जाएंगे.
पाकिस्तान और कतर की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
दिलचस्प बात यह है कि ईरानी बयान में पाकिस्तान और कतर का विशेष रूप से धन्यवाद किया गया है. इससे संकेत मिलता है कि पर्दे के पीछे कई महीनों से चल रही मध्यस्थता में इन देशों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. हाल के वर्षों में कतर ने अमेरिका और विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों जैसे की तालिबान के बीच संवाद स्थापित कराने में सक्रिय भूमिका निभाई है, जबकि पाकिस्तान भी समय-समय पर क्षेत्रीय कूटनीति में मध्यस्थ के रूप में सामने आता रहा है.
इजरायल की चिंता अभी खत्म नहीं हुई
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू अमेरिका और इजरायल के बीच उभरते मतभेद हैं. ट्रंप ने हालिया बयान में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को "मुश्किल व्यक्ति" बताते हुए कहा कि उन्होंने लगभग इस समझौते को पटरी से उतार दिया था. ट्रंप का यह बयान असामान्य माना जा रहा है और यह दिखाता है कि ईरान को लेकर वॉशिंगटन और तेल अवीव की प्राथमिकताओं में अंतर मौजूद है.
इजरायल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक संसाधनों की वापसी से ईरान क्षेत्रीय स्तर पर अधिक प्रभावशाली हो सकता है. वहीं अमेरिका का तर्क है कि नियंत्रित समझौता और कूटनीति, निरंतर टकराव से बेहतर विकल्प है.
क्या यह वास्तव में ऐतिहासिक मोड़ है?
फिलहाल दुनिया की निगाहें 19 जून पर टिकी हुई हैं, जब इस समझौते पर स्विट्ज़रलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर होने की उम्मीद है. यदि हस्ताक्षर सफलतापूर्वक हो जाते हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह खुल जाता है तो तेल बाजारों से लेकर वैश्विक व्यापार तक कई क्षेत्रों में राहत देखने को मिल सकती है.
हालंकि मिडिल ईस्ट का इतिहास यह भी बताता है कि कागज पर हुए समझौते और जमीन पर उनके सफल क्रियान्वयन के बीच अक्सर लंबा फासला होता है. इसलिए अभी जश्न मनाने से पहले यह देखना होगा कि आने वाले 60 दिनों की बातचीत किस दिशा में जाती है.
फिर भी, अगर बंदूकें खामोश रहती हैं, प्रतिबंधों में वास्तविक राहत मिलती है और परमाणु विवाद का शांतिपूर्ण समाधान निकलता है, तो यह समझौता केवल अमेरिका और ईरान के बीच नहीं बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हो सकता है.
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]




























