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BLOG: सुप्रीम कोर्ट का डंडा: यूपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों से इक बंगला छिने न्यारा!

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी गौर करने लायक है- ‘एक बार सीएम अपना पद छोड़ दे तो वह आम आदमी के बराबर है.’ और ‘यूपी सरकार ने कानून में संशोधन कर जो नई व्यवस्था दी थी, वह असंवैधानिक है.’

अपने सर पर एक अदद छत जुटाने के लिए इस देश का आम आदमी कैसे-कैसे पापड़ नहीं बेलता और सरकारी बंगला हासिल करने के लिए इस देश के राजनेता कैसे-कैसे धतकरम नहीं करते! मिसाल के तौर पर, अगस्त 2016 में एक एनजीओ ‘लोक प्रहरी’ की याचिका पर जब सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने का निर्देश दिया तो यूपी की तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने उसी माह उप्र मंत्रिगण (वेतन, भत्ते और विविध प्रावधान) कानून 1981 में संशोधन करके यूपी मिनिस्टर सैलरी एलॉटमेंट एंड फैसिलिटी अमेंडमेंट एक्ट 2016 विधानसभा से पास करा लिया और सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले में आजीवन निवास करने की सुविधा दिला दी.

गौरतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से कांग्रेस, बीएसपी और बीजेपी के अन्य पूर्व मुख्यमंत्रियों के साथ-साथ उनके पिताश्री मुलायम सिंह यादव को भी लखनऊ के 5, विक्रमादित्य मार्ग स्थित सरकारी बंगले से निकलना पड़ता, जो अप्रैल 1991 में उन्हें आवंटित किया गया था और जिसमें वो अपनी दूसरी पत्नी, बेटे प्रतीक और बहू अपर्णा यादव के साथ रहते हैं. अखिलेश सरकार के उस निर्णय ने न सिर्फ मुलायम बल्कि यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह (अब केंद्रीय गृह मंत्री), पूर्व कांग्रेसी दिग्गज एनडी तिवारी, कल्याण सिंह (अब राजस्थान के राज्यपाल) और बसपा सुप्रीमो मायावती को भी अभयदान दे दिया था.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी गौर करने लायक है- ‘एक बार सीएम अपना पद छोड़ दे तो वह आम आदमी के बराबर है.’ और ‘यूपी सरकार ने कानून में संशोधन कर जो नई व्यवस्था दी थी, वह असंवैधानिक है.’ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे मनमाना, पक्षपातपूर्ण और समता के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाला संशोधन करार दिया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मुमकिन है कि अन्य राज्यों से भी ऐसी ही जनहित याचिकाएं दाखिल की जाएं और सरकारी बंगलों को निजी संपत्ति समझने वाले जनप्रतिनिधियों के होश ठिकाने आएं.

यूपी के कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों ने न सिर्फ सरकारी बंगलों पर कब्जा जमाए रखा बल्कि मनमाने ढंग से उनका कायापलट भी कर डाला. एनडी तिवारी ने माल एवेन्यू स्थित बंगले के भीतर बड़ा-सा बागीचा लगवा दिया था और उसके अंदर मंदिर का निर्माण भी किया था. मुलायम सिंह यादव ने सरकारी बंगला तोड़कर उसकी जगह नया निजी टाइप का विशाल बंगला खड़ा कर लिया. बहन मायावती ने तो अपने सरकारी बंगले के बगल में स्थित गन्ना आयुक्त का ऑफिस ध्वस्त करवा दिया और उसकी भी जमीन सम्मिलित करके उस पर महल खड़ा कर लिया है. चौथी बार जब वह यूपी की सीएम बनीं थीं तो सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए उस महल के रिनोवेशन पर खर्च किए गए!

हालांकि यूपी ने ऐसे सीएम भी देखे हैं जो सादगी से रहते थे. हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने सरकारी बंगले में कभी कोई ताम-झाम नहीं दिखाया. वीपी सिंह ने तो लकड़ी की साधारण कुर्सियां रख छोड़ी थीं. लेकिन सुनते हैं कि अखिलेश यादव ने करीब 20 करोड़ रुपए केवल फर्नीचर पर खर्च कर दिए और 70 करोड़ खर्च करके बंगले का हुलिया बदल डाला!

ध्यान रहे कि यह करदाताओं का पैसा था, जिसे पानी की तरह बहाया गया. कायदे से होना यह चाहिए था कि आपकी मालिक जनता ने जब आपको पदच्युत कर दिया तो आप स्वयं विनम्रतापूर्वक बंगले खाली कर देते. फ्रांस, ब्रिटेन, स्वीडन आदि जैसे कई देशों में हम देखते ही हैं कि हारने के बाद पीएम तक अपना ऑफिस कांख में दबाकर घर निकल लेता है. लेकिन हमारे यहां तो चाहे दिल्ली हो या पटना, मंत्री-संत्री सरकारी संपत्ति को पुस्तैनी माल समझकर कुंडली मारे बैठे रहते हैं.

दरअसल यह औपनिवेशिक मानसिकता है. गोरे अंग्रेज राजधानियों के पॉवर जोन में विस्तृत बंगले बनाकर राजकाज चलाया करते थे. काले अंग्रेज भी उन्हीं के नक्श-ए-कदम पर चलना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि वास्तविक सत्ता सरकारी बंगले में निहित है. बंगला गया तो बची-खुची सत्ता, रुतबा और आबरू भी चली जाएगी! वे भी आम मतदाता जैसे निहत्थे और श्रीहीन हो जाएंगे. आम आदमी जब नौकरी से रिटायर होता है तो वह बच्चों जैसा असुरक्षित महसूस करता है.

कोई व्यापारी दीवालिया होता है तो उसे चना या मूंगफली के दाने तक मयस्सर नहीं होते. लेकिन हमारे यहां एक तो नेता कभी रिटायर होता नहीं, अगर उसकी कुर्सी भी चली जाती है तब भी सैकड़ों सुरक्षाकर्मी उसकी खिदमत में हाजिर रहते हैं. सरकारी बंगले की जरूरत के पक्ष में माननीयों का तर्क है कि आम लोगों के बीच किसी निजी स्थान पर रहने से उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है. वे यह भी कह रहे हैं कि जनसंपर्क के लिए सरकारी बंगला जरूरी है.

एक सज्जन का कहना था कि कोई विदेशी मेहमान, बड़ा अधिकारी या मंत्री-संत्री मिलने आ गया तो उसे कहां बैठाएंगे? अरे भाई! आप यह बताइए कि आपके विशाल पार्टी मुख्यालय किसलिए होते हैं? अपवादों को छोड़ दें तो किस सरकारी बंगले में आम आदमी की इंट्री होती है? वहां तो बिना एपॉंइंटमेंट के खास आदमी भी नहीं घुस सकता... और अगर जनसंपर्क के लिए नेता बुलाए तो उसके समर्थक जंगल और गुफाओं में भी उससे मिलने पहुंच सकते हैं.

चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल भी बार-बार प्रतिज्ञा करते थे कि राजकाज चलाने के लिए वह कोई सरकारी आवास नहीं लेंगे. लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही उन्होंने जनसंपर्क वाले यही तर्क और सुरक्षा कारणों की दुहाई दी और बड़े से आवास में निवास करने लगे.

असल बात यह है कि भारत में मतदाताओं का वर्ग अलग है और सत्तासीन नेताओं का वीआईपी वर्ग अलग. वरना लखनऊ में ही मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के सरकारी बंगले एकदम अगल-बगल स्थित हैं. अगर इतने ही बड़े जनहितैषी और समाजवादी होते तो पिता-पुत्र एक ही बंगले में गुजारा कर सकते थे. खैर, अब तो दोनों को ही अपना बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ेगा.

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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