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पत्रकारों पर चिल्लाना नहीं PR, मीडिया को दबाने की कोशिशों की हो आलोचना, Netflix अब ये फैसला आपके हाथ

मैंने बरसों तक अलग-अलग क्षेत्रों और बैकग्राउंड के लोगों के इंटरव्यू लिए हैं. हर बातचीत अलग होती है. कुछ लोग खुलकर बात करते हैं, कुछ बहुत नाप-तौल कर बोलते हैं, तो कुछ इंटरव्यू बेहद आपाधापी में होते हैं. यह सब इस नौकरी का हिस्सा है. लेकिन नेटफ्लिक्स की फिल्म 'मां बहन' की स्टार कास्ट के साथ बातचीत के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसने उस सीमा को पार कर दिया जो मीडिया में काम करने वाले हर व्यक्ति के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए.

माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी और धारणा दुर्गा का यह इंटरव्यू फिल्म के प्रमोशन के हिस्से के रूप में रखा गया था. इस पूरे कैंपेन और मीडिया बातचीत की जिम्मेदारी पीआर (PR) एजेंसी MSL इंडिया के पास थी. इंटरव्यू की रिकॉर्डिंग पूरी तरह से पीआर टीम के कैमरों पर ही हो रही थी, और हमारे पास (ABP के पास) उस फुटेज का कोई एक्सेस नहीं था. शुरुआती कुछ मिनटों में सब कुछ ठीक वैसा ही रहा जैसी उम्मीद थी. कलाकार बातचीत में दिलचस्पी ले रहे थे, बातें सहजता से आगे बढ़ रही थीं और एक अच्छा तालमेल दिख रहा था. लेकिन जैसे ही मैंने रणवीर सिंह और फरहान अख्तर की फिल्म 'डॉन 3' से जुड़े विवाद पर सवाल उठाया, सब कुछ बदल गया.

जैसे ही कलाकारों ने जवाब देना शुरू किया और मैंने अगला सवाल पूछा, तभी अचानक पीआर की एक प्रतिनिधि ने बीच में टोक दिया. वह भी शालीनता से नहीं. न ही उन्होंने बीच में आकर बात को मोड़ने की कोशिश की. बल्कि, वह कमरे के दूसरे छोर से चिल्लाईं, और उनका लहजा इतना रुखा था कि वहां मौजूद सभी लोग, यहाँ तक कि खुद कलाकार भी चौंक गए.

मैंने इस पर आपत्ति जताई, क्योंकि मेरा सवाल जायज था, समय के हिसाब से सही था और फिल्म इंडस्ट्री में चल रही एक बड़ी चर्चा से सीधे तौर पर जुड़ा था. लेकिन दोबारा टोक दिया गया. इस बार और तेज़ आवाज़ में.

थोड़ी देर बाद, मैंने धारणा दुर्गा से एक और ज़रूरी सवाल पूछा. यह सवाल प्रमोशन के दौरान हुई उस दुखद घटना के बारे में था, जहाँ पैपराजी (फोटोग्राफर्स) ने धारणा को एक तरफ हटने के लिए कह दिया था ताकि कैमरे सिर्फ माधुरी और तृप्ति पर फोकस कर सकें. इससे पहले कि बातचीत आगे बढ़ती, उसी पीआर प्रतिनिधि ने फिर से दखल दिया और ज़ोर देकर कहा कि इंटरव्यू को तुरंत खत्म किया जाए.

पूरे अनुभव का यह हिस्सा सबसे ज़्यादा असहज करने वाला था.

पत्रकारिता मंज़ूरी (Approval) के भरोसे नहीं चल सकती

आजकल फिल्मों के प्रमोशन पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी जाती हैं. कई इंटरव्यू सिर्फ प्रोडक्शन या पीआर टीम के कैमरों से ही रिकॉर्ड किए जाते हैं, और पत्रकारों को अपने उपकरण (इक्विपमेंट) इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं होती. इसके पीछे अक्सर व्यवस्था और सुविधा का तर्क दिया जाता है. लेकिन, यह एक ऐसा सिस्टम बना देता है जहाँ सारी कमान और कंट्रोल सिर्फ एक पक्ष के हाथ में आ जाता है.

जब फुटेज का मालिकाना हक सिर्फ एक पक्ष के पास होता है, तो फाइनल एडिट में क्या बचेगा और क्या कटेगा, यह भी वही तय करते हैं.

यह एक असहज करने वाला लेकिन ज़रूरी सवाल खड़ा करता है: क्या इंटरव्यू आज भी असल बातचीत रह गए हैं, या वे धीरे-धीरे पहले से तय (प्री-क्लियर्ड) प्रमोशनल कंटेंट बनते जा रहे हैं, जिसमें से मुश्किल पलों को दर्शकों तक पहुँचने से पहले ही काट दिया जाता है?

बतौर पत्रकार, हमें भी इस बात पर आत्ममंथन करने की ज़रूरत है कि हम इन शर्तों को क्यों स्वीकार करते जा रहे हैं.

PR की एक भूमिका है, लेकिन यह नहीं

मनोरंजन उद्योग (एंटरटेनमेंट इकोसिस्टम) के लिए पब्लिसिस्ट (PR) बहुत ज़रूरी हैं. वे शेड्यूल तय करते हैं, मुलाकातों का तालमेल बिठाते हैं और इंटरव्यू संभव बनाते हैं. लेकिन एक कमरे को मैनेज करने और उस पर तानाशाही चलाने में साफ फर्क होता है.

पत्रकारों को सवाल के बीच में ही टोक देना, एक प्रोफेशनल बातचीत के दौरान चिल्लाना और लाइव बातचीत में यह तय करना कि किस विषय पर बात नहीं हो सकती-यह मीडिया मैनेजमेंट नहीं है. यह संदेश देता है कि बातचीत सिर्फ शर्तों पर होगी और असहज करने वाले सवालों को सरेआम चुप करा दिया जाएगा.

यह सारी घटना एजेंसी के कैमरों में कैद हुई है. मैं उन्हें चुनौती देता हूँ कि वे पूरा और बिना एडिट किया हुआ फुटेज जारी करें, ताकि हर कोई देख और सुन सके कि बॉलीवुड के एक जायज और मौजूदा मुद्दे पर सवाल पूछने पर कितने रुखे और पूरी तरह से अस्वीकार्य तरीके से इंटरव्यू को बंद कराया गया.

जिस बात ने मुझे सबसे ज़्यादा परेशान किया, वह सिर्फ वो दखलअंदाज़ी नहीं थी. बल्कि यह था कि वह पूरा माहौल कितना सामान्य लग रहा था. कलाकार अपनी सीटों पर बैठे रहे, बातचीत आगे बढ़ गई और कैमरे चलते रहे. यह बड़ा मुद्दा किसी एक इंटरव्यू या एक पीआर टीम से कहीं बढ़कर है. यह इस बारे में है कि क्या पत्रकार बिना किसी डर के, बिना चुप कराए जाने या एडिट आउट किए जाने के डर के, जायज सवाल पूछना जारी रख सकते हैं या नहीं.

प्रमोशन का मकसद फिल्म को आगे बढ़ाना होता है. यह बुनियादी पेशेवर सम्मान (Professional Respect) की कीमत पर नहीं होना चाहिए. क्योंकि जिस दिन सवालों को इस कदर आक्रामक तरीके से कंट्रोल किया जाने लगेगा, उस दिन इंटरव्यू, इंटरव्यू नहीं रह जाएंगे बल्कि सिर्फ एक परफॉरमेंस (दिखावा) बनकर रह जाएंगे.

नेटफ्लिक्स, अब फैसला आपके हाथ में है.

[यह आर्टिकल में पूरी तरह से निजी विचारों के ऊपर आधारित है]

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