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भीषण गर्मी को कैसे मात दे भारत, कौन चुका रहा इसकी सबसे ज्यादा कीमत?

आपने तपती गर्मी में आइसक्रीम खाने या छांव वाली जगह पर पहुंचने पर महसूस किया होगा कि गर्मी से राहत मिलना कैसा होता है. अब खुद से एक सवाल पूछिए, आपको ऐसी तमाम सेवाएं देने पहुंचाने वालों को क्या गर्मी से राहत मिल पाती है? गोवा के मिरामार बीच पर खड़े एक दुकानदार ने कहा, 'हम गर्मी में लोगों को सुकून पाने में मदद करते हैं, लेकिन हमारे पास अपनी मदद करने का कोई उपाय नहीं है.' कुल मिलाकर भीषण गर्मी अब वैश्विक औसत तापमान में सिर्फ अमूर्त की दिखने वाली बढ़ोतरी नहीं रह गई. यह भारत सहित संपूर्ण दक्षिण एशिया में गंभीर मानवीय संकट का रूप ले चुकी है. इसका सीधा असर मानव गरिमा, कार्यक्षमता और जीवन पर पड़ रहा है. इसकी सर्वाधिक कीमत रेहड़ी-पटरी वालों, गिग वर्कर्स, निर्माण श्रमिकों और किसानों को चुकानी पड़ रही है.

भारत में लू के जोखिम वाले राज्यों की संख्या 23 है. इनमें से लगभग 57 प्रतिशत जिलों में तापमान का उच्च से बहुत उच्च जोखिम मौजूद है, जहां देश की तीन-चौथाई आबादी रहती है. अगर एशिया की बात करें तो यह वैश्विक औसत तापमान की तुलना में लगभग दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है. भले ही गर्मी अपने पीछे बाढ़ या चक्रवात जैसे तबाही के निशान नहीं छोड़ती है, लेकिन यह अदृश्य रहकर हमारी काम करने की क्षमता को घटा देती है, स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव डालती है और असमानता को बढ़ाती है. 

गर्मी का सामना करने के लिए देश में एक व्यवस्थित क्षमता बनाने की शुरुआत हो चुकी है. हालांकि, इसे पूर्ण रूप से विस्तार देने की जरूरत है. 2013 में अहमदाबाद में हीट एक्शन प्लान मॉडल लागू हुआ था, जो अब लगभग 23 राज्यों के 200 से अधिक शहरों तक पहुंच चुका है. इसे बनाने में स्थानीय जरूरतों का ध्यान रखना और बजट आवंटन के जरिए इसे मजबूत बनाना बहुत जरूरी है. सामुदायिक नेतृत्व वाले 'कूल रूफ' कार्यक्रम और महिला श्रमिकों के लिए 'पैरामीट्रिक हीट इंश्योरेंस' जैसे उपाय बताते हैं कि गर्मी का सामना करने क्षमता (रेजिलियंस) तैयार की जा सकती है और इसके लिए वित्त भी जुटाया जा सकता है. ऐसा करने के लिए सभी जरूरी घटक मौजूद हैं. अगर कमी है तो उस राजनीतिक और संस्थागत इच्छाशक्ति की, जो सभी घटकों को मिलाकर इन्हें प्रभावी ढंग से लागू कर सके. इस दिशा में ये उपाय मददगार हो सकते हैं:

सबसे पहले क्लाइमेट इंटेलिजेंस को एक सार्वजनिक ढांचे के रूप में विकसित करें और इसे दैनिक फैसलों का आधार बनाएं. इस काम में एआई प्लेटफॉर्म 'क्लाइमेट रेजिलिएंस एनालिटिक्स एंड विज़ुअलाइजेशन इंटेलिजेंस सिस्टम' (CRAVIS) मदद कर सकता है, जिसे सीईईडब्ल्यू ने ‘कोलैबोरेटिव डेटा कॉमन्स’ के रूप में विकसित किया है. यह प्लेटफॉर्म 40 वर्षों से अधिक समय के जलवायु आंकड़ों का आकलन करता है और इसे 2070 तक के अनुमानों से जोड़ता है. इसका इस्तेमाल करके जिला मजिस्ट्रेट, शहरी नियोजक या जनस्वास्थ्य अधिकारी जैसे तमाम निर्णयनकर्ता सरल भाषा में अपने सवालों के जवाब पा सकते हैं. उदाहरण के लिए, यह बढ़ती गर्मी से बिजली की मांग पर क्या असर होगा, कहां पर असामान्य रूप से गर्म रातें होंगी या किन जिलों को लंबे सूखे का सामना करना पड़ सकता है, जैसे कई सवालों के जवाब दे सकता है. क्रैविस ने अगले दो दशकों में भारत में प्रतिवर्ष 15 से 40 असामान्य रूप से गर्म दिन और 20 से 40 असामान्य रूप से गर्म रातें बढ़ने का अनुमान लगाया है. मौसम पूर्वानुमान की तरह ऐसी जानकारियों को नियमित बनाने से आपदा के बाद प्रतिक्रिया करने की जगह पर पूर्वानुमान आधारित पूर्व-सक्रिय उपायों को लाया जा सकता है.

दूसरा, गर्मी और स्वास्थ्य के क्षेत्रीय पारिस्थितिकी तंत्र को संस्थागत रूप देना होगा, क्योंकि भीषण गर्मी सीमाओं से नहीं बंधी है और दक्षिण एशिया के सभी देशों में इसके जोखिम का पैटर्न भी एक जैसा है. क्षेत्रीय स्तर पर पहले से व्यावहारिक अनुभवों का खजाना मौजूद है. बस उसे एक ऐसे मंच की जरूरत है, जो इन्हें साझा मानकों, संयुक्त प्रशिक्षणों और सह-वित्तपोषित प्रयासों में बदल सकें. इसमें हाल ही में शुरू हुआ ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क (जीएचएचआईएन) का 'दक्षिण एशिया हब' अहम भूमिका निभा सकता है. यह प्रमुख अनुसंधान, नीति और विकास संगठनों का एक समूह है. इसका लक्ष्य 60 से अधिक संस्थानों को जोड़ना, स्वास्थ्य, जलवायु व शहरी लचीलेपन में 500 से अधिक पेशेवरों को प्रशिक्षित करना और कम से कम चार देशों में हीट एक्शन प्लान को मजबूती देना है.

तीसरा, गर्मी को एक संरचनागत जोखिम मानकर, जो कि पहले ही बन चुका है, वित्तीय व्यवस्था को नए सिरे से ढालना होगा. अब तापमान एक सीमा से ऊपर जाने पर ऑटोमेटिक भुगतान करने वाला 'पैरामीट्रिक हीट इंश्योरेंस', बुनियादी ढांचे में जलवायु आधारित निवेश और नगर निगम के बजट में हीट रेजिलिएंस लाने की शर्तें जोड़ने जैसे काम सिर्फ पायलट प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं रह सकते हैं. ये नए सामाजिक अनुबंधों की बुनियाद बनने चाहिए, जिसमें गर्मी को व्यक्तिगत समस्या के रूप में नहीं, बल्कि एक सामूहिक जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाए और सार्वजनिक तंत्र को समाधान उपलब्ध कराने में सक्षम बनाया जाए.

चूंकि, भीषण गर्मी के जोखिम पूर्वानुमान किया जा सकता है, इसलिए उचित संस्थागत व्यवस्थाओं के जरिए इसे रोका भी जा सकता है. अपने प्रयासों से भारत इस बात का उदाहरण पेश कर सकता है कि अगर योजनाबद्ध तरीके से नीतिगत प्रयास हो तो सबसे अधिक गर्मी वाली जगहें भी रेजिलिएंट (लचीले) बन सकती हैं.

(लेखकों के विचार निजी हैं)

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