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नीट पेपर लीक और दांव पर 22 लाख बच्चों का भविष्य, उनका क्या कसूर, जिन्होंने कुछ नहीं किया?


जब नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने 12 मई को NEET-UG 2026 परीक्षा रद्द की, परीक्षा के नौ दिन बाद, जब 22 लाख से ज़्यादा छात्र इसमें शामिल हो चुके थे तो वह घोषणा बेहद औपचारिक और ठंडी थी. कुछ पंक्तियां, एक सरकारी आदेश, और बस. उसमें उस भारी मानसिक बोझ का कोई उल्लेख नहीं था, जो उन लाखों छात्रों पर अचानक आ गिरा, जिन्होंने वर्षों की मेहनत इसी एक दिन के लिए लगाई थी और जिन्हें अब ऐसी रद्दगी स्वीकार करनी पड़ी, जिसमें उनकी कोई गलती नहीं थी.

तथ्य किसी से छिपे नहीं हैं. अप्रैल के मध्य में, परीक्षा से हफ्तों पहले, 410 सवालों का एक “गेस पेपर” कुछ चुनिंदा लोगों के बीच प्रसारित होने लगा था. इसमें असली पेपर के सभी 90 जीव विज्ञान और 45 रसायन विज्ञान के सवाल शामिल थे. यानी कुल 720 में से 600 अंकों के प्रश्न पहले से उपलब्ध थे. इसकी कीमत भी सब कुछ बयान करती है. शुरुआत में 10 से 25 लाख रुपये, 1 मई तक 5 लाख, और परीक्षा की रात तक महज 30,000 रुपये. यह पेपर व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए इतनी तेज़ी से फैला कि कोई एजेंसी उसे रोक नहीं सकी.

यह नेटवर्क केरल, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र और उत्तराखंड तक फैला हुआ था. लातूर के एक कोचिंग संस्थान में परीक्षा से पहले हुए मॉक टेस्ट में 42 सवाल असली पेपर से हूबहू मेल खाते पाए गए. इससे साफ है कि कुछ लोगों के पास पहले से ही असली प्रश्न बैंक तक पहुँच थी. यह कोई हाशिए का अपराध नहीं था, बल्कि मेडिकल एडमिशन सिस्टम की जड़ों तक फैला हुआ नेटवर्क था.

वो बच्चे जिन्होंने कुछ नहीं किया

इस पूरे घोटाले का सबसे अहम लेकिन कम चर्चा में रहने वाला पहलू वे छात्र हैं, जिन्होंने कोई गलत काम नहीं किया. 22 लाख से अधिक छात्रों में से अधिकांश का लीक से कोई संबंध नहीं था. उनके लिए NEET सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि दो-तीन साल की पूरी जिंदगी का दांव था. कोचिंग की फीस, घर से दूर रहना, छूटे हुए त्योहार, सीमित सामाजिक जीवन. खासकर छोटे शहरों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह एक पीढ़ी का सबसे बड़ा सपना होता है.

ऐसी रद्दगी का मानसिक असर केवल नई तारीख घोषित कर देने से खत्म नहीं होता. 2024 के NEET विवाद के बाद मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने छात्रों में चिंता, अवसाद और गंभीर मानसिक समस्याओं के मामले दर्ज किए थे. परीक्षा और रद्द होने के बीच का अनिश्चितता भरा समय ही अपने आप में नुकसानदायक होता है. जिन छात्रों ने मई की शुरुआत में अपनी तैयारी चरम पर पहुंचाई थी, उन्हें अब फिर से महीनों तक वही दबाव झेलना होगा. बिना इस भरोसे के कि सिस्टम अब पूरी तरह सुरक्षित है.

यह भी समझना जरूरी है कि सभी छात्रों पर इसका असर समान नहीं पड़ता. आर्थिक रूप से मजबूत परिवारों के छात्र दोबारा तैयारी कर सकते हैं, लेकिन कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए एक साल की देरी कई बार उनके करियर का अंत साबित होती है.

जहाँ तक NTA की बात है, एजेंसी ने AI आधारित CCTV निगरानी, GPS ट्रैकिंग, बायोमेट्रिक सत्यापन और वॉटरमार्क जैसे कई सुरक्षा उपाय लागू किए थे. 120 से अधिक टेलीग्राम और इंस्टाग्राम चैनलों की पहचान की गई और 1500 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं. यानी एजेंसी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं थी. फिर भी सेंध उस स्तर पर लगी जहाँ ये सभी उपाय बेअसर हो जाते हैं-प्रश्नपत्र के निर्माण, छपाई या वितरण के शुरुआती चरण में.

NTA के पास क्या था

यह अंतर समझना जरूरी है. परीक्षा केंद्र की गड़बड़ियों को निगरानी बढ़ाकर सुधारा जा सकता है, लेकिन सिस्टम के अंदर की सेंध को रोकने के लिए पूरे ढांचे-प्रश्नपत्र तैयार होने से लेकर वितरण तक का गहन ऑडिट जरूरी है.

इस बीच, कई गिरफ्तारियाँ हुई हैं और CBI ने जांच अपने हाथ में ले ली है. लेकिन मीडिया ट्रायल भी तेज़ है. गिरफ्तारी के कुछ ही घंटों में नाम और चेहरे टीवी पर दिखने लगते हैं. जनता का गुस्सा जायज़ है, लेकिन न्याय प्रक्रिया तथ्यों और सबूतों पर आधारित होनी चाहिए. जल्दबाज़ी में किया गया न्याय केवल दिखावा होता है. इससे निर्दोष लोग भी प्रभावित हो सकते हैं और असली दोषी बच निकलते हैं.

अंततः, गिरफ्तारियाँ केवल अस्थायी संतोष देती हैं. असली समाधान उस रास्ते को बंद करना है, जहाँ से पेपर लीक हुआ. प्रश्नपत्र की छपाई, हैंडलिंग, सीलिंग और ट्रांसपोर्ट की पूरी प्रक्रिया का सख्त और पारदर्शी ऑडिट ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोक सकता है. 2024 के बाद भी सुधार के सुझाव दिए गए थे, लेकिन 2026 में वही समस्या दोहराई गई. अब जरूरी है कि सिफारिशों को लागू करने योग्य जवाबदेही में बदला जाए—हर उस स्तर पर, जहाँ से प्रश्नपत्र गुजरता है. 22 लाख छात्र इससे कम के हकदार नहीं हैं.

[ये लेखक के निजी विचार हैं]

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