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पान: एक ज़ायका, एक तहज़ीब, एक यादें 

बचपन से जब होश संभाला तो अपने वालिद, जिन्हें हम “डैडी” कहते थे, उन्हें पान खाते देखा. दिन भर में अनगिनत पान वो खाते थे. उम्र के आख़िरी पड़ाव में पान की वजह से उनकी आवाज़ भी कुछ बदल गई थी. जब बात करते तो बाज़ दफ़ा बातें समझने के लिए ध्यान देना पड़ता था. उनके क़रीबी भी उन्हें सलाह देते थे - “शमीम भाई, पान छोड़ दीजिए.”

लेकिन पान भी अजीब चीज़ है. कुछ दिनों के लिए छोड़ा, फिर जब बेचैनी बढ़ी तो दोबारा शुरू कर दिया. आख़िर में पान और सुपारी की उसी पुरानी दोस्ती ने उनके जिस्म को ऐसा नुक़सान पहुँचाया कि पैंक्रियाज़ में इंफेक्शन हुआ और एक दिन वो दुनिया को ख़ैरबाद कह गए. डैडी अक्सर हमें या बड़े भाई को और फिर छोटी बहन को आवाज़ देकर कहते- “बेटा, एक पान बना कर ले आओ.”

उनके पान का मतलब होता था — कत्था थोड़ा ज़्यादा, सुपारी कुछ मोटी और वो भी चार-पाँच दाने. ऐसे में मैं भी सरौते से सुपारी जिसे बिहार में कसैली भी कहते हैं काटते वक़्त चुपके से दो-चार मोटी सुपारी अपने मुँह में डाल लिया करता था. माँ देखतीं तो फ़ौरन टोकतीं - “सुपारी मत खाओ, ज़ुबान मोटी हो जाएगी.”
मैं सोचता था, भला ज़ुबान भी कहीं मोटी होती है?

बरसों बाद जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आया, एक रात न्यूज़ चैनल में कोई वॉइस आर्टिस्ट नहीं था. मैंने खुद वॉइसओवर किया. पैकेज चला, तभी महसूस हुआ कि कुछ अल्फ़ाज़ सही से अदा नहीं हो रहे. ज़ुबान भारी-सी लग रही थी, कुछ फंबल भी आ गए. उसी पल माँ की बात याद आई. बचपन में जिस बात पर हँसी आती थी, उसकी सच्चाई स्टूडियो के माइक्रोफोन के सामने समझ में आ गई.

ग़ौर कीजिए तो पान सिर्फ़ खाने की चीज़ नहीं, पूरे हिंदुस्तान की तहज़ीब का हिस्सा रहा है. किसी के लिए ये शौक़ है, किसी के लिए लत, किसी के लिए मेहमाननवाज़ी और किसी के लिए मोहब्बत का इज़हार. वालिद साहब के पान के शौक़ ने मुझे बहुत छोटी उम्र में ही बता दिया था कि पान की भी कई क़िस्में होती हैं और हर इलाक़े का पान अपने अंदर एक अलग कहानी समेटे रहता है.

एक ज़माने तक डैडी “सिक्की वाला पान” खाते थे. बिहार के मगध के इलाक़े और गया ज़िले में पैदा होने वाला मगही पान आकार में छोटा, बेहद नाज़ुक और जल्दी ख़राब हो जाने वाला होता है. पंसारी लकड़ी के पतले ख़िलाल में चार छोटे-छोटे पान एक साथ लगाकर पेश करते हैं और ऊपर से कत्थे की हल्की परत भी लगा देते हैं. उसे सिक्की पान कहते हैं, दिल्ली में सिक्की पान बहुत कम जगह मिलता है. नॉर्थ एवेन्यू में पांडेय जी की मशहूर दुकान उन गिनी-चुनी जगहों में है जहाँ आज भी सिक्की पान का ज़ायक़ा और उसकी ख़ुशबू से आप की मुलाक़ात हो जाएगी. इंदौर में भी एक पान वाले हैं,उनकी ख़ासियत ये है की अपने हाथ से पान खिलाते हैं,तम्बाकू वाला पान मैंने खाया है,बहुत लज़ीज़ पान होता है.

फिर आता है “पान का बीड़ा”.

भारतीय इतिहास में इसका ज़िक्र सिर्फ़ खाने की चीज़ के तौर पर नहीं, बल्कि चुनौती और ज़िम्मेदारी के प्रतीक के रूप में भी मिलता है. कहा जाता है कि राजपूत राजा जब किसी कठिन युद्ध पर अपने सरदारों को भेजते, तो दरबार में पान का बीड़ा आगे बढ़ाया जाता. जो उस बीड़े को उठा लेता, समझिए उसने मौत या फ़तह — दोनों में से किसी एक को गले लगाने का इरादा कर लिया.

आज भी “बीड़ा उठाना” मुहावरा उसी दौर की याद दिलाता है.

पान का एक और अंदाज़ है — “गिलोरी”.

ये सिर्फ़ पान नहीं, एक अदब था. अवध और लखनऊ के कोठों से इसकी ख़ास पहचान जुड़ी. तवायफ़ें चाँदी के वर्क से सजी गिलोरियाँ ख़ास अंदाज़ में तश्तरी में रखकर पेश करतीं. नवाब, रईस और शायर महफ़िलों में बैठते, ग़ज़लें होतीं, तबले बजते और फिर नफ़ासत से गिलोरी पेश की जाती. कहते हैं कि कई नवाबज़ादे तहज़ीब सीखने कोठों पर भेजे जाते थे और वहाँ बातचीत के सलीक़े से लेकर पान पकड़ने तक का अंदाज़ सिखाया जाता था.

हिंदुस्तान में बनारसी पान का अपना रुतबा है. बनारस की गलियों में पान सिर्फ़ मुँह का ज़ायका नहीं, शहर की रूह है. वहाँ “मीठा पान” भी मिलता है जिसमें गुलकंद, चेरी, सौंफ, नारियल और कई तरह की मिठास भरी जाती है. शादी-ब्याह में तो मीठा पान कई घरों में आज भी रस्म का हिस्सा है. मगर पान की कहानी सिर्फ़ हिंदुस्तान तक महदूद नहीं.

बांग्लादेश में पान को “पान-सुपारी” के नाम से जाना जाता है. वहाँ मेहमान के सामने पान पेश करना इज़्ज़त की निशानी माना जाता है. गाँवों में आज भी औरतें छोटी पीतल की डिब्बियों में चूना और सुपारी लेकर बैठती हैं. पाकिस्तान, ख़ासकर कराची और लाहौर में “कराची पान” और “मीठा पान” बेहद मशहूर हैं. वहाँ के कई पुराने पानवाले दावा करते हैं कि उनके मसाले की रेसिपी दादा-परदादा के ज़माने से चली आ रही है.

श्रीलंका में पान को “बुलाथ” कहा जाता है. वहाँ लोग पान के पत्ते में सुपारी और तंबाकू रखकर चबाते हैं. कई बुज़ुर्ग आज भी खेतों या बाज़ारों में काम करते हुए जेब में छोटी-सी पोटली रखते हैं जिसमें पान का सामान होता है. म्यांमार और थाईलैंड में भी पान जैसी चीज़ खाई जाती रही है. म्यांमार में उसे “कुन-या” कहते हैं. वहाँ सड़क किनारे छोटी दुकानों पर पान बनता है और लोग चाय की तरह उसे रोज़मर्रा की आदत समझते हैं.

दिलचस्प बात ये है कि हिंदुस्तानी मज़दूर जब अंग्रेज़ों के दौर में गिरमिटिया मज़दूर बनकर फ़िजी, सूरीनाम, मॉरीशस और त्रिनिदाद पहुँचे, तो अपने साथ रामचरितमानस, भोजपुरी गीत और पान खाने की आदत भी ले गए. आज भी त्रिनिदाद और सूरीनाम में कई बूढ़े लोग “बेटल लीफ़” यानी पान का पत्ता चबाते दिखाई दे जाते हैं. वहाँ पान अब सिर्फ़ स्वाद नहीं, पुरखों की याद बन चुका है.
हाँ, वक़्त के साथ पान ने अपना रंग भी बदला.

कहीं वो ज़र्दे और तंबाकू के साथ बीमारी बन गया, तो कहीं “चॉकलेट पान” और “फ़ायर पान” बनकर सोशल मीडिया का तमाशा. पुराने पानवाले अक्सर कहते हैं — “साहब, असली पान तो वो था जो इत्मीनान से चौकी पर बैठकर बनाया जाता था, जिसमें हाथों की ख़ुशबू भी शामिल होती थी.” अब शहर बदल गए, लोगों की आदतें बदल गईं.

पहले दावत के बाद पान पेश किया जाता था, ये रस्म अभी भी है लेकिन कहीं कहीं. लेकिन सच कहूँ, आज भी कहीं से कत्थे और केवड़े की मिली-जुली ख़ुशबू आ जाए, तो मुझे डैडी शिद्दत के साथ याद आ जाते हैं. सफ़ेद कुरता, दाहिने हाथ की एक ऊँगली में सिमटा हल्का सा चुना,पास में रखा उगालदान,...और वो आवाज़ —
“बेटा, ज़रा एक पान बना कर लाना…”

[ये लेखक के निजी विचार है]

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