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माई लॉर्ड से भाई साहब तक

कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय भाजपा में शामिल हो गए. उत्तर दिनाजपुर जिले में पश्चिम बंगाल सिविल सेवा में बतौर 'ए' ग्रेड अधिकारी के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले अभिजीत गंगोपाध्याय ने जिस भ्रष्टाचार से लड़ाई का कारण बता कर उच्च न्यायालय इस्तीफा दिया है, इसी वजह से उन्होंने वर्षों पहले अधिकारी की नौकरी छोडी थी. वैसे अभिजीत गंगोपाध्याय इसी साल अगस्त में उच्च न्यायालय से रिटायर होने वाले थे.

2022 में न्यायमूर्ति रहते हुए अभिजीत गंगोपाध्याय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो को पश्चिम बंगाल सरकार स्कूलों में शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती में कथित अनियमितताओं की जांच करने का निर्देश दिया था. पिछले साल ही जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय को शिक्षकों की भर्ती घोटालों से संबंधित लंबित मामले में एक समाचार चैनल कों इंटरव्यू देने के बाद सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी का सामना करना पड़ा था.

हाल ही में जनवरी महीने में इसी मामले में ईडी ने छापेमारी की थी. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीमों पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी के करीबियों के परिसरों की तलाशी ली. इसके लिए एजेंसी ने कोलकाता में जिन तीन स्थानों पर एक साथ रेड की. उनमें से एक स्कूल नौकरी मामले के आरोपी प्रसन्ना रॉय के करीबी सहयोगी रोनित झा का आवास है, जो हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं.

पिछले दिनों जस्टिस अभिजीत गंगोपाध्याय तब भी सुर्खियों में आए, जब उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट के अपने सहयोगी जज जस्टिस सौमेन सेन पर 'राज्य के सत्ताधारी दल के लिए काम करने' का आरोप लगाया. जस्टिस गंगोपाध्याय ने यह आरोप तब लगाया था जब एक डिवीजन बेंच का हिस्सा रहे जस्टिस सौमेन सेन ने पुलिस को एक केस से जुड़े दस्तावेज सीबीआई को सौंपने के आदेश पर रोक लगा दी थी. यह मामला राज्य में एमबीबीएस एडमिशन में कथित "अनियमितताओं" के बारे में था.

वैसे पद छोड़ने के बाद और सक्रिय राजनीति में शामिल होने से पहले किसी भी प्रैक्टिसिंग जज के लिए कूलिंग-ऑफ अवधि के लिए कोई प्रावधान नहीं हैं. लेकिन क्या ये घटना केवल नियमों तक सीमित प्रभाव रखती है, शायद नहीं. इस घटना से उठने वाले सवाल बडे हैं वो सवाल है कि क्या न्यायपालिका में जस्टिस पदों पर काम कर रहें व्यक्तियों को कंपनियों, जिनके मामले उनके सामने न्याय के लिए आएं हो या फिर जिन जजों ने राजनातिक दलों से जुडे मामलों पर फैसले दिए हों, उन्हे उन्ही राजनीतिक दल या फिर कंपनियों में रिटायरमेंट के बाद काम करने का अधिकार होना चाहिए. क्योंकि सुबह बड़े फैसले देने वाले जज जब शाम को राजनीतिक पार्टी के को 'यस माई लॉर्ड' कहेंगे तो सवाल उठेगा कि क्या हमारे देश में न्यायपालिका राजनीति से आजाद है?

राहुल महाजन के इस ओपिनियन को इंग्लिश में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें 

राजनीति में शामिल हुए न्यायाधीशों का इतिहास पुराना है:

* के एस हेगड़े, जो 1935 में कांग्रेस में शामिल हुए उन्हे 1952 और 1954 में कांग्रेस ने राज्यसभा भेजा. उन्होने अगस्त 1957 में राज्यसभा से त्यागपत्र देकर मैसूर हाईकोर्ट में जज बन गए और बाद में जुलाई 1967 में सर्वोच्च न्यायालय के जज बने. जब इंदिरा गांधी सरकार ने 1973 में उन्हे और तीन अन्य जजों को अधिक्रमण कर ए एन राय को मुख्य न्यायधीश नियुक्त कर दिया तो उन्होने त्यागपत्र देकर 1977 में जनता पार्टी से बैंगलोर नार्थ की सीट से चुनाव लडा और जीत हासिल की. बाद में वो लोक सभा स्पीकर बने और जनता पार्टी के टूटने के बाद बीजेपी में
शामिल हो गए.
 
*एक राजनेता से न्यायाधीश और फिर राजनेता बने जस्टिस बहारुल इस्लाम ने अप्रैल 1962 में कांग्रेस की तरफ से राज्य सभा के लिए चुने गए. वो 1968 में पुनः निर्वाचित हुए. इस बीच में उन्होने असम में असफल विधानसभा चुनाव लड़ा. 1972 में राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया और गौहाटी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने और सेवानिवृत्त होते ही एक बार फिर राजनीति का हाथ थाम लिया. सेवानिवृत्त होने के केवल 9 महीने बाद इंदिरा गांधी सरकार ने दिसंबर 1980 को उन्हे सर्वोच्च न्यायालय का जज बना दिया. उन्होने बिहार के कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री जगननाथ मिश्रा के बारपेटा लोकसभा सीट से चुनाव लडने को लेकर भ्रष्टाचार से जुडे मामले में 1983 में जगननाथ मिश्रा के पक्ष में निर्णय दिया. इस निर्णय के कुछ हफ्ते बाद उन्होने सर्वोच्च न्यायालय के जज के पद से त्यागपत्र दे दिया. जिसके बाद कांग्रेस ने उन्हे छह साल के लिए राज्यसभा के लिए नामजद कर दिया.

*वीआर कृष्णा अय्यर, जो राजनेता से न्यायाधीश बने और जज से राजनेता बने. सीपीआई सदस्य के रूप में, वह मद्रास के लिए चुने गए और फिर तीन बार केरल विधानसभा में रहे और 1965 तक सक्रिय राजनेता बने रहे. 1968 में अय्यर हाई कोर्ट जज बन गए और राजनेताओं के समर्थन से पांच साल में ही सुप्रीम कोर्ट के जज बन गये. ये कुछ अकल्पनीय था, क्योंकि एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय पंहुचने में न्यूनतम 10 से 15 साल लग जाते हैं. 1987 में उन्होंने विपक्षी दलों के संयुक्त उम्मीदवार के तौर पर राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा लेकिन असफल रहे.

*1967 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश कोका सुब्बा राव ने कांग्रेस के ज़ाकिर हुसैन के खिलाफ विपक्षी उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए अपनी सेवानिवृत्ति से तीन महीने पहले इस्तीफा दे दिया था.

*1983 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बहारुल इस्लाम ने असम की बारपेटा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए अपनी सेवानिवृत्ति से छह सप्ताह पहले इस्तीफा दे दिया था.

*वाराणसी डिस्ट्र्किट और सेशन जज अजय कृष्ण विश्वेश ने ज्ञानवापी मस्जिद केस में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI को वैज्ञानिक सर्वे का आदेश दिया और बाद में अपने रिटायरमेंट के दिन 31 जनवरी 2024 को ज्ञानवापी मस्जिद के व्यास तहखाने को हिंदू पक्ष को सौंपने और वहां पूजा शुरू कराने का फैसला सुनाया. अजय कृष्ण विश्वेश के जज के पद से रिटायर होने के एक महीने के अंदर ही सरकार ने डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय का लोकपाल नियुक्त कर दिया.

* सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गोगोई को रिटायरमेंट के चार महीने बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया था.

* जस्टिस एस अब्दुल नजीर को रिटायरमेंट को एक 2 महीने के अंदर आंध्र प्रदेश के 24 वें राज्यपाल बनाया गया.

*जस्टिस अशोक भूषण रिटायरमेंट के 4 महीने के अंदर को राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया.

*जस्टिस आदर्श कुमार गोयल 6 जुलाई 2018 को रिटायर हुए और उसी दिन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए गए.

*जस्टिस अरुण मिश्रा 2 सितंबर, 2020 को रिटायर हुए और रिटायरमेंट के करीब एक साल बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए गए.

* जस्टिस आफताब आलम जो की सीपीआई के मेंबर थे और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे ने हाई कोर्ट के जज बनने से पहले पार्टी के त्यागपत्र दे दिया. जस्टिस आफताब आलम ने सोहराबुद्दीन फेक एनकाउंटर केस की सुनवाई. के दैरान तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए काफी मुश्किलें पैदा की यहां तक कि तब वरिष्ठ अघिवक्ता राम जेठमलानी को सार्वजनिक रुप से कहना पडा कि उनका व्यवहार मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और तब गुजरात के गृहमंत्री के विरुद्द पक्षपात भरा है.

* बंबई हाईकोर्ट न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से पहले एफ आई रेबेलो, गोवा में जनता पार्टी के एमएलए थे. वो आगे जाकर इलाहबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश बने.

* जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के जस्टिस हसनैन मसूदी ने सेवानिवृत्ति के बाद नेशनल कांफ्रेस के टिक्ट पर अनंतनाग से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.

* हाई कोर्ट से न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद जस्टिस ए एम थिप्से, विजय भौगुना, एम रामा जोइस और राजिंदर सच्चर सभी सक्रिय राजनीति में उतरे.

* सेवानिवृत्त सीजेआई रंगनाथ मिश्रा और रंजन गोगोई द्वारा राज्यसभा की सीटें ले ली गई.

* जबकि पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के जज फातिमा बीवी और देश के पूर्व मुख्य न्यायधीश पी सदाशिवम नेगवर्नर का पद स्वीकार किया है.

बीजेपी नेता और पूर्व कानून मंत्री अरुण जेटली ने 5 सितंबर 2013 को राज्‍यसभा में ये बयान दिया था. कि रिटायरमेंट के बाद पद पाने की इच्‍छा रिटायरमेंट से पहले के फैसलों को प्रभावित करती है. यह न्‍यायपालिका की स्‍वतंत्रता के लिए खतरा है.

ऐसा बिलकुल नहीं है कि केवल न्‍यायपालिका से जुडे लोगों के राजनीति में शामिल होने से ही सवाल उठते हैं. माथा तब भी ठनकता है जब एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अपनी सेवानिवृत्ति के तीन साल बाद 2004 में राज्यसभा सदस्य और मंत्री बने. बात तब भी होनी चाहिए जब सेवानिवृत्त सीएजी को राज्य के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया जाता है. कई नौकरशाह भी सेवा से इस्तीफा देने या सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राजनीतिक दलों में शामिल हो जाते हैं और चुनाव लड़े हैं. सबसे अधिक जब सेवानेवृत्त सेना प्रमुख राजनीतिक दल का साथ थाम ले.

सवाल पहले भी उठे हैं

चुनाव आयोग ने 2012 में केंद्र सरकार से शीर्ष नौकरशाहों को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक दलों में शामिल होने और चुनाव लड़ने से पहले कूलिंग-ऑफ अवधि प्रदान करने की सिफारिश की थी. हालाँकि, सरकार ने अटॉर्नी जनरल की राय के आधार पर इस सिफारिश को खारिज कर दिया था कि यह संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने मई 2022 में एक रिट याचिका खारिज कर दी थी जिसमें शीर्ष अदालत से विधायिका को राजनीति में शामिल होने से पहले सेवानिवृत्त नौकरशाहों के लिए कूलिंग-ऑफ अवधि लगाने वाला कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी. अदालत ने कहा कि यह विधायिका को तय करना है कि सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में शामिल होने से पहले नौकरशाहों के लिए कूलिंग-ऑफ अवधि की आवश्यकता है या नहीं.

वैसे विभिन्न संस्थानों की स्वतंत्रता निश्चित कार्यकाल, वित्तीय स्वतंत्रता, कठोर निष्कासन प्रक्रिया और कार्यालय छोड़ने के बाद प्रतिबंधों की गारंटी के माध्यम से सुनिश्चित की कोशिश की गई है. सर्वोच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश पद छोड़ने के बाद भारत में किसी भी अदालत या प्राधिकरण के समक्ष वकील के रूप में उपस्थित नहीं हो सकता है. उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पर सर्वोच्च न्यायालय या अन्य उच्च न्यायालयों के समक्ष उपस्थिति को छोड़कर समान प्रतिबंध हैं. सीएजी और लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष/सदस्य पद छोड़ने के बाद केंद्र या राज्य सरकारों में कोई अन्य रोजगार नहीं ले सकते. ये प्रतिबंध ऐसे पदों पर रहने की अवधि के दौरान, सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी लाभ को हासिल करने के इरादे से सत्ता में मौजूद सरकार के प्रति पक्षपात से बचने के लिए लगाए गए हैं. वर्तमान में ऐसे नियम हैं जो किसी वरिष्ठ नौकरशाह को भी सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद कम से कम एक वर्ष तक निजी नौकरी में शामिल होने से रोकते हैं.

2012 में संसद की एक स्थायी समिति की बैठक में, सांसदों ने रक्षा कंपनियों के लिए या बिचौलियों के संपर्ककर्ता के रूप में काम करने वाले पूर्व सैन्य अधिकारियों की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए सख्त मानदंडों का आह्वान किया. अभी, सेवानिवृत्त अधिकारी सरकार की अनुमति से एक साल या उससे भी कम अंतराल के बाद रक्षा कंपनियों के साथ काम कर सकते हैं. कुछ समिति के सदस्यों ने सेवानिवृत्ति के बाद कम से कम दो साल का ब्रेक लेने का आह्वान किया, जबकि पैनल के विचार-विमर्श में भाग लेने वाले एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी न केवल सांसदों से सहमत हुए बल्कि सुझाव दिया कि कार्यकाल कम से कम पांच साल होना चाहिए.

होना क्या चाहिए?

संविधान विभिन्न अंगों के बीच नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत पर काम करता है. कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह है. एक स्वतंत्र न्यायपालिका राज्य की इन दोनों शाखाओं पर निगरानी रखती है. चुनाव आयोग, लोक सेवा आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) जैसे अन्य स्वतंत्र निकाय भी हैं जिन्हें सरकार के किसी भी हस्तक्षेप के बिना अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक है. ऐसे में उच्च पदों पर बैठे नौकरशाहों और न्यायधीशों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए ये जरुरी है कि सेवानिवृत्त होने के बाद उनके ऐसे निजी कंपनियों या राजनीतिक दलों में शामिल होने या उनसे राजनीतिक पद लेने पर रोक होनी चाहिए, जिनके संबंधित विषय उनके निर्णयों से प्रभावित हुए हों या जिनसे जुडे विषय उनके विचाराधीन रहें हों.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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