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‘जातिवादी फिक्सिंग’ जब बिहार का मुकद्दर हो तो बदलाव की बयार कैसे बह पाएगी!

चुनावी दंगल के आखिरी दौर में कयास, अनुमान, राय, भविष्यवाणी या अटकलबाजी अपने चरम पर है. खासकर राष्ट्रीय राजधानी की दूषित और विषाक्त हवा से निकलकर पत्रकार जब सूबे की गलियों में चुनावी पर्यटन करते हैं तो इनके जेहनों में इलहाम की बारिश बरस पड़ती है. और सुरूर के आलम में अजब गज़ब ‘ऑब्जर्वेशन’ पेश करने से खुद को नहीं रोक पाते. इसी क्रम में एक दावे ने मुझे चौंकाया- ‘चुनाव बाद बिहार में जो राजनीतिक उथल-पुथल होने वाली है, उसका असर केंद्र तक देखने को मिलेगा’

अब यहां तक तो बात सही है कि चुनाव बाद की उथल-पुथल का असर केंद्र तक देखने को मिलेगा. मगर मेरा सवाल ये है कि क्या कोई उथल-पुथल सचमुच होगी भी?

अगर आप हाल के दिनों में बिहार दौरे से लौटे हैं या पटना में सक्रिय पत्रकारों के टच में हैं, तो वहां बदलाव की कोई नई बयार नहीं बह रही. बाद के नतीजे भी इसी माहौल का ‘आउट-कम’ होंगे! हां, उन्हें कोई अलग ‘अंडर करंट’ दिख रहा हो तो बात दूसरी है.

'जनता को सरकार नहीं जाति संरक्षण देती है...'

यूं तो इस देश में जाति पर वोट कश्मीर से कन्याकुमारी तक गिरता है, मगर बिहार में ये सबसे ज्यादा और खुल्लम-खुल्ला है. पटना में चार दशक से ज्यादा प्रोफेसर रहे कर्मेंदु शिशिर लगभग तिक्त स्वर में कहते हैं- ‘बिहार विशुद्ध रुप से एक सामंती राज्य रहा है. यहां की बेबस जनता अगर अपनी जाति की छतरी से बाहर रहे तो वह जी ही नहीं सकती. यहां जनता को सरकार नहीं जाति संरक्षण देती है. जनता के पास वही जीवन रक्षक कार्ड हैं. जंगल में निहत्था होना खतरनाक है. बिहार में जाति के बगैर जीना खतरनाक है.‘

कर्मेंदु शिशिर ठीक कह रहे हैं. इसी जातीय समीकरण के सहारे नीतीश कुमार 20 साल से सत्ता में हैं. लालू परिवार ने 15 साल राज किया, जिसमें राजनीति से सर्वथा अनजान राबड़ी देवी के ही अकेले 8 साल हैं.

बिहार में सियासी जातिवाद का मतलब वोटों का जातिवादी समीकरण है. किसी विधान सभा क्षेत्र में जातियों के कुछ ब्लॉक मिले और नया समीकरण तैयार.

बहरहाल एक किस्सा सुनिए- दिल्ली से चुनावी दौर पर गयी एक टीम नालंदा के सिलाव पहुंची. सिलाव अपनी खाजा मिठाई के लिए दूर दूर तक मशहूर है. यूं भी नालंदा सीएम नीतीश कुमार का जिला है. सिलाव में इस टीम को खाजे की दर्जनों दुकानें नजर आयीं. हर दुकान का नाम माता काली, कालिका, श्रीकाली मां के नाम से. जैस आगरे में पेठे की हर दुकान पंक्षी पेठे के नाम से. जाहिर है ऐसे में जिज्ञासा स्वाभाविक थी -

‘भाई इनमें असली और सबसे पुरानी दुकान कौन है? ‘

सवाल का जवाब दो-टूक और बेबाक मिला-

‘अरे काहे की असली और काहे की पुरानी, सबका नाम काली माता के नाम पर है, मगर खाजा बिकता है प्रोपराइटर की जाति पर. हर आदमी अपनी जाति की दुकान से ही खाजा खरीदता है.‘

ये जवाब वोटिंग से बमुश्किल दस दिन पहले का है. अब आप अंदाजा लगा लीजिए कि जब ‘जातिवादी फिक्सिंग’ इस लेवल पर है तो चुनाव में कितनी ही उथल-पुथल होगी ?

अब दूसरी नजीर दुलार चंद यादव मर्डर केस की ले लीजिए. दुलार चंद यादव कभी लालू-नीतीश के करीबी होते थे. मोकामा स्थित टाल के इलाके में दुलार चंद का एकछत्र साम्राज्य था. तकरीबन दर्जन भर बूथ अकेले जिताने का माद्दा रखते थे. मगर उनका भी सियासी सूरज ढल गया, प्रशांत किशोर की जन सुराज के उम्मीदवार के समर्थक बने. उनके मर्डर की कहानी लगभग सबके सामने है, जो बची है, उसकी जांच जारी रहेगी.

मामला इतना सिंपल नहीं...

मगर दुलार चंद मर्डर केस में अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार का नाम आते ही नीतीश सरकार ने उन्हें जेल भेजा. जेल में उन्हें तमाम सुविधाएं हासिल हैं. एक पुलिस अधिकारी ने तो कुछ पत्रकारों से ये तक कह दिया कि छोटे सरकार को उनकी सहमति से गिरफ्तार किया गया. छोटे सरकार नीतीश की पार्टी से ही उम्मीदवार हैं. हर चुनाव से पहले जेल से बाहर लाए जाते हैं, इस बार भीतर चले गए.

मगर मामला इतना सिंपल नहीं है. मोकामा में कोई इसके लिए नीतीश सरकार को कुछ नहीं कह रहा. ‘पोलराइजेशन’ यादव बनाम भूमिहार हो गया है. इस यादव बनाम भूमिहार का फायदा देखिये. अनंत सिंह के मुकाबले मोकामा से है कि दूसरे भूमिहार बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी आरजेडी की उम्मीदवार हैं.

कहा जा रहा है कि सूरजभान की वजह से जो भी भूमिहार वोट कटता, अब सिम्पैथी वोट में तब्दील होगा. दूसरी बात नीतीश ने तो छोटे सरकार को जेल भेजा, मगर उनके केंद्रीय मंत्री ललन लिंह ने अंतिम दौर तक छोटे सरकार का प्रचार किया. ललन सिंह ने अपील की - मोकामा का एक-एक व्यक्ति अनंत सिंह बनकर चुनाव लड़े और उनको जितावे. इतना ही नहीं वो तो यहां तक कह गए- जो विरोधी हैं, उनको घर से ही निकलने मत दो.

ये सब जातिवाद की ही सियासत है. केंद्रीय मंत्री ललन सिंह भी भूमिहार हैं. बहरहाल जब वोटिंग के पहले चरण से ठीक पहले तक समीकरण ऐसे बिठाए जा रहें हों-तो कोई बिहार में किस उथल-पुथल और केंद्र में किस असर की बात करे. फिलहाल आप भी देखिए- हम भी देखते हैं. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)

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