Blog: राहुल की जाति की जंजीर में गुजरात क्यों?

आजादी को भले 70 साल पूरे हो गए हैं लेकिन सच्चाई यही है कि देश में अभी धर्म और जाति के नाम पर ही चुनाव लड़े जाते हैं. यही वजह है कि चुनावी मौसम में वोटरों के सामने पाटी धर्म और जाति के नाम पर झोली फैलाने से परहेज नहीं करती है. खासकर राहुल गांधी जिस तरह गुजरात में चुनाव जीतने के लिए जातियों का गुलदस्ता बना रहे हैं वो खास चौकानेवाले और बड़ी रणनीति का हिस्सा प्रतीत हो रहा है. चौकानेवाले इसलिए कि कांग्रेस का कभी नारा हुआ करता था जात पर न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर. उसी पार्टी के राहुल गांधी अब गुजरात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हराने के लिए जाति का चक्रव्यूह रच रहे हैं.
ये चक्रव्यूह इसलिए रच रहें हैं ताकि इस बार गुजरात की राजनीति में धर्म का बोलबाला न हो. वैसे ये नई बात नहीं है क्योंकि आजादी के बाद से ही कांग्रेस पार्टी भी जाति या धर्म की राजनीति को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तवज्जो देती आ रही है. कांग्रेस में पढ़े लिखे लोगों और खासकर उच्च जाति का हमेशा बोलबाला रहा है. बीजेपी पर भी धर्म के आधार पर राजनीति करने का आरोप लगता रहा है और खासकर टिकट बंटवारे के समय ये भेदभाव साफ दिखता है. पार्टी इसे अपने अपने ढंग से जरूरत के हिसाब से व्याख्या करती है. कांग्रेस और बीजेपी ही नहीं बल्कि देश में अधिकतर ऐसी पार्टियां हैं जिनकी दुकान सिर्फ एक खास जाति के नाम पर ही चलती है.

जाति पर राहुल का जोर क्यों?
राजनीति और रणनीति बड़ी अजीब होती है जो पार्टी ओबीसी को आरक्षण देने के नाम पर कतराती थी वही पार्टी अब पाटीदार को ओबीसी में शामिल करने की बात कर रही है. कांग्रेस शासनकाल में मंडल कमीशन को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था जब विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के प्रधानमंत्री बने तो मंडल कमीशन को लागू किया गया. उस समय वीपी सिंह की सरकार को बीजेपी भी समर्थन कर रही थी. ये अलग बात है कि बीजेपी ने मंडल की राजनीति की काट के लिए कमंडल की राजनीति शुरू की थी. अब वही कांग्रेस हर जाति को अपनी पार्टी में जोड़ने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपना रही है.
नरेन्द्र मोदी गुजरात की विकास की खूब बात करते हैं. गुजरात में चुनाव के शंखनाद के बाद ऐसा ही लग रहा था कि विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़े जाएंगे लेकिन विकास के मुद्दे को जाति की जंजीरों से कैद कर लिया गया है. राहुल को लगता है कि विकास के मुद्दे पर और मोदी की छवि के सामने सीधे टक्कर देना आसान नहीं होगा. गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला भी कहा जाता है और चुनाव में किसी न किसी रूप में धर्म का मुद्दा भी आ जाता है. भले ये दिखता नहीं हो लेकिन गुजरात की राजनीति का हिस्सा बन चुका है. इसीलिए राहुल गांधी ने ऐसी चाल चली जिसमें इस बार का चुनाव धर्म के नाम पर नहीं, बल्कि जाति के नाम पर करने की कोशिश कर रहे हैं.
उन्हें पता है कि जाति का बोलबोला रहेगा तो धर्म की राजनीति खुद दम तोड़ देगी. राहुल अब छोटी से बड़ी जातियों के नेताओ को अपनी तरफ मोड़ने में लगे हुए हैं. अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विकास और हिन्दुत्व के मुद्दे पर जाति के मुद्दे को भारी करने की कोशिश हो रही है.
दरअसल कांग्रेस सालों से गुजरात में सत्ता से बेदखल रही है और इस बार चुनाव जीतने के लिए जातिगत आंकड़ों के मुताबिक राज्य में सियासी बिसात बिछाई जा रही है. राहुल गांधी माधव सिंह सोलंकी के जाति फार्मूले के जरिए गुजरात की कुर्सी हासिल करना चाहते हैं. दरअसल 1985 में माधव सिंह सोलंकी ने खाम के जरिए कांग्रेस को जीत दिलाई थी वो कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत थी. माधव सिंह सोलंकी ने खाम को कांग्रेस की ओर मोड़ लिया था. खाम (KHAM) मतलब के से क्षत्रिय, एच से दलित, ए से आदिवासी और एम से मुस्लिम लेकिन 1990 में चली हिंदुत्व की आंधी में खाम तहस नहस हो गया था.

बीजेपी अलग जाति और धर्म के ताने बाने बुन चुकी थी फिर भी मुस्लिम, दलित और आदिवासी के ज्यादातर मतदाता कांग्रेस के साथ जुड़े रहे, लेकिन मोदी के सीएम बनने साथ ही आदिवासी और दलित जाति में भी बीजेपी की सेंध लग गई. हालांकि पूरे देश में सामाजिक विस्तार करने की बीजेपी की यही नीति थी. राहुल की कोशिश है कि जो जाति कांग्रेस के साथ कभी नहीं जुड़ी रही है उसे भी कांग्रेस के साथ जोड़ा जाए. पाटीदार जाति जो बीजेपी की कट्टर समर्थक रही है उसे भी कांग्रेस के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
यही बात है कि हार्दिक पटेल से राहुल की सांठगांठ चल रही है. वहीं ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर, कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं. दलित नेता जिग्नेश मेवाणी को भी राहुल रिझाने में लगे हुए हैं. अहिर नेता प्रवीण राम को भी कांग्रेस में जोड़ने की कोशिश हो रही है. अब बीजेपी कह रही है कि राहुल समाज को बांट रहें हैं. अब सवाल ये भी है कि 15 फीसदी की आबादी वाली पाटीदार जाति के 38 फीसदी विधायक बीजेपी में ही हैं. इस खेल में किसी भी पार्टी का दामन साफ नहीं है. कांग्रेस इस बार जातीय समीकरण का खेल खेलकर बीजेपी के वोट में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रही है.
विकास और गुजरात मॉडल से देशभर में मशहूर धरती पर जाति की बदबू आने लगी है. कभी गुजरात के बारे में विकास की बात होती थी, अब उसी धरती पर जाति की बात हो रही है. हार्दिक पटेल पाटीदारों की बात कर रहे हैं. जिग्नेश मेवाणी दलितों की बात कर रहे हैं. अल्पेश ठाकोर ओबीसी की बात कर रहें हैं और प्रवीण राम अहिर जाति की बात कर रहें हैं, यानि इस बार गुजरात में जाति की राजनीति हिलोरे मार रही है. सत्ता पाने की रेस में राहुल गांधी ऐसी राजनीति खेल रहे हैं जो, यही उनकी पार्टी के लिए आगे जंजाल बन सकता है.
धर्मेन्द्र कुमार सिंह राजनीतिक-चुनाव विश्लेषक हैं और ब्रांड मोदी का तिलिस्म के लेखक हैं.
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