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BLOG: देश भर से किसान मांगने नहीं, हक छीनने दिल्ली पहुंचे हैं!

कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद के कालजयी उपन्यास ‘गोदान’के प्रमुख किसान पात्र होरी का मरते वक्त अपनी पत्नी धनिया से आखिरी संवाद है- ‘सब दुर्दशा तो हो गई. अब मरने दे!’

लेकिन इक्कीसवीं सदी का किसान उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों से चलकर देश की राजधानी दिल्ली में अपनी मांगें मनवाने का प्रण लेकर डट गया है. इनमें आज के लाखों होरी भी शामिल हैं और धनिया भी. प्रेमचंद के समय और वर्तमान में यह बुनियादी फर्क है. किसानों का दो दिवसीय विरोध कार्यक्रम अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की अगुवाई में हो रहा है, जिससे अलग-अलग 208 किसान एवं सामाजिक संगठन जुड़े हुए हैं. इस अपूर्व एकजुटता की मांग है कि 11 दिसंबर से शुरू होने जा रहे शीतकालीन सत्र से पहले ही किसानों के लिए अलग से संसद-सत्र बुलाया जाए, जिसमें किसान व किसानी के समक्ष छाए संकट पर विस्तार से अर्थपूर्ण चर्चा हो. किसान अपने लिए मंत्री-संत्री पद या हीरे-जवहारात नहीं मांग रहे बल्कि वे कह रहे हैं कि किसानों को लूट, आत्महत्या, बिचौलियों के शोषण और शासन-प्रशासन के दोहरेपन एवं अन्याय से मुक्ति दिलाई जाए. इसके लिए किसान की पूर्ण कर्ज माफी हो, फसलों की लागत का डेढ़ गुना मुआवजा मिले, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए और कर्मचारियों ही तरह किसानों को भी पेंशन दी जाए.

किसानों की ये मांगें कहीं से भी नाजायज नहीं हैं क्योंकि सभी जानते हैं कि किसान का काम आठ घंटे का नहीं बल्कि चौबीसों घंटे का होता है, और जन बच्चे से लेकर परिवार के सभी सदस्य किसानी में जुटे रहते हैं. राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह ने कहा है कि वे दिल्ली में अपना हक मांगने नहीं बल्कि छीनने आए हैं. जब किसान ही देश को खिलाता है, तो देश को किसानों की इज्जत रखनी ही चाहिए.

किसानों की इस अभूतपूर्व किंतु प्रत्याशित जुटान का सबसे बड़ा कारण यह है कि चाहे राज्य सरकारें हों या केंद्र सरकार या किसी भी पार्टी की सरकार, सब उन्हें गरीब की लुगाई समझती हैं. कर्ज का बोझ डालने के अलावा विकास के नाम पर उनकी जब चाहे जमीन हड़प ली जाती है. नासिक जिले के किसानों की हजारों एकड़ कृषि भूमि मुंबई-नागपुर समृद्धि कॉरीडोर के नाम पर अधिग्रहीत कर ली गई थी. मुंबई-अहमदाबाद बुलट ट्रेन के लिए जमीन अधिग्रहण की शर्तें स्पष्ट नहीं हैं. बाढ़ और सूखे की मार सहते-सहते किसान अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे, बच्चियों की शादियां नहीं कर पा रहे हैं. पीएम नरेंद्र मोदी ने चुनावी वादा किया था कि वह पांच सालों में किसानों की आय दुगुनी कर देंगे. लेकिन हुआ यह कि उनके कार्यकाल के प्रथम वर्ष में ही आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या लगभग दुगुनी हो गई!

‘एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया' शीर्षक से प्रकाशित एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 2014 में जहां आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5,650 थी, वहीं 2015 में यह 8,007 हो गई. महाराष्ट्र में 2015 में 3,030 किसानों ने आत्महत्या की, तेलंगाना में 1,358 और कर्नाटक में 1,197 किसानों ने जान दे दी. छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य में भी 854 किसानों ने अपनी इहलीला समाप्त कर ली थी. मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में तो यह आंकड़ा और दुखद रहा. किसान आत्महत्या की मुख्य वजह यह है कि अशिक्षा और गरीबी के चलते सरकार की किसान कल्याण योजनाओं का लाभ किसानों को नहीं बल्कि बिचौलियों को मिलता है. जब कुछ किसान आत्महत्या की जगह संघर्ष या विरोध प्रदर्शन का रास्ता चुनते हैं तो उन्हें पुलिस से पिटवाया जाता है, उन पर किसी विपक्षी दल का एजेंट होने की तोहमत मढ़ी जाती है और उनका मजाक बना दिया जाता है, जैसा कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों के साथ हुआ था.

यह देख कर भी किसानों का जी जलता है कि उनकी वार्षिक औसत आय किसी चपरासी से भी कम है जबकि वे अन्नदाता कहे जाते हैं. वे यह गणित भी नहीं समझ पाते कि जब देश के बड़े-बड़े कारोबारियों का अरबों-खरबों का लोन बट्टा खाता में डाला जा सकता है तो उनका मामूली कर्ज पूरी तरह माफ क्यों नहीं किया जा सकता! जाहिर है कि किसान बदहाली और अपमान झेलकर देश की सबसे मजबूर बिरादरी नहीं बने रहना चाहते. वे समझ गए हैं कि अगर अनाज उगाने की उनकी बुनियादी और अनिवार्य उपयोगिता नहीं होती तो वे कब के समाप्त कर दिए गए होते! विडंबना देखिए कि जो सरकार उद्योग लगाने और पूंजी निवेश की सौदेबाजी के लिए उद्योगपतियों को विमान में बिठाकर यूएसए, चीन, मंगोलिया, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक की सैर कराती है, वह चार कदम चलकर किसानों के आंसू पोंछने रैली, प्रदर्शन और धरनास्थलों तक नहीं पहुंच पाती!

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन 2003 में ही सर्वे के जरिए बता चुका है कि अगर विकल्प हो तो 40% से ज्यादा किसान खेती छोड़ने को तैयार बैठे हैं. किसानों की एक गैर-राजनीतिक संस्था भारत कृषक समाज ने 2014 में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) से सर्वे कराया तो 61% किसान खेतीबाड़ी से तौबा करने को तैयार थे! नब्बे के दशक में कॉरपोरेटों को कृषि सेक्टर में प्रवेश देने का नतीजा है कि आसमान छूती लागत से बहुत कम आय और असुरक्षित किंतु भयकारी कर्ज के पाश में फंसे भारत के लाखों किसान कौड़ियों का दाम मिलने पर अपनी ही खून-पसीने से सींची फसल नष्ट करने को मजबूर हो जाते हैं. किसी और सेक्टर में ऐसा देखा है क्या?

चुनावी फायदा उठाने के लिए जब-जब कर्जमाफी की घोषणा होती है तो अर्थशास्त्री इसे ‘बैड इकनॉमिक्स’ और विपक्षी दल ‘सियासी झुनझुना’ बताने लगते हैं. याद ही होगा कि पिछले आम चुनाव से पहले स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अध्यक्ष अरुंधती भट्टाचार्य ने सीआईआई के एक कार्यक्रम में कहा था कि इससे बैंक और कर्ज लेने वालों के बीच अनुशासन बिगड़ता है. उनसे पहले केंद्र द्वारा विभिन्न सरकारों के कृषि कर्जमाफी कार्यक्रमों पर सवाल उठाते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि इस तरह की योजनाओं से किसानों का कर्ज प्रवाह बाधित होता है. जबकि हकीकत यह है कि कर्जमाफी के नाम पर किसानों को 2-2 रुपए तक के चेक थमाए जाते हैं! केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि किसानों की कर्जमाफी राज्यों का मामला है और इसके लिए राशि का प्रबंध राज्यों को अपने संसाधनों से ही करना होगा और राज्य वित्त की किल्लत बताते हुए हाथ खड़े कर देते हैं.

तथ्य यह है कि लघु एवं सीमांत किसान फसली कर्ज बहुत कम लेते हैं इसलिए ऐसी कर्जमाफियों से उन्हें अधिक राहत नहीं मिलती. ये किसान खाद-बीज के अलावा भैंसों, ट्रैक्टर, सिंचाई मशीनों और अन्य कृषि औजार खरीदने के लिए कर्ज लेते हैं. समस्या यह भी है कि लघु (औसतन 1.4 हेक्टेयर) एवं सीमांत (औसतन 0.4 हेक्टेयर) किसान की खेती का रकबा तो परिभाषित हो सकता है लेकिन बुंदेलखंड जैसे देश के कई इलाकों में इसी रकबे की उपज समान नहीं होती. दरहकीकत छोटा किसान सिर्फ राष्ट्रीय बैंकों से ही कर्ज नहीं लेता. वह सहकारी समितियों, पतपेढ़ियों, आढ़तियों और शाहूकारों की शरण में जाता है. आत्महत्या भी देश का छोटा किसान ही करता है. कर्जमाफी का एक दुखद पहलू यह भी है कि किसानों के नाम पर नेता और अफसर मालामाल हो जाते हैं.

इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि किसानों को सस्ते और उन्नत बीज, खाद, सिंचाई के साधन, खेती के औजार तथा कीटाणुनाशक सस्ती दरों पर सहज उपलब्ध कराना पहला तथा कर्जमाफी अंतिम उपाय होना चाहिए. आज की तारीख में पहला कदम होना चाहिए- किसानों की मांगों को सुनना, गुनना और उन पर विचार करके सटीक समाधान निकालना. वक्त का तकाजा यह भी है कि केंद्र सरकार सबसे पहले दिल्ली में जमा हुए किसानों को बागी न समझे बल्कि सच्चे मन से उनकी पूरी बात ध्यान से सुने!

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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