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Opinion: बीजेपी के इशारे पर उपेन्द्र कुशवाहा कर रहे खेल, नीतीश कुमार से हिस्सेदारी मांगने के पीछे ये है पूरी साजिश

जब नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होने का फैसला किया और आरजेडी के साथ हाथ मिलाया, उसके पहले उपेन्द्र कुशवाहा ने अपनी पार्टी आरएलएसपी का विलय जेडीयू में कर दिया था. उन्हें कुछ अच्छे की उम्मीद थी क्योंकि उनकी एक अलग पहचान है. कुशवाहा बिरादरी का बिहार में जो वोट है, उसको किसी न किसी तरह से उपेन्द्र कुशवाहा कंट्रोल करते ही हैं. उस बिरादरी में इनका जनाधार है. 

2014 में उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए का हिस्सा रहे. बीजेपी ने उन्हें टिकट भी दिया और केंद्रीय मंत्री भी बनाया. लेकिन ये वहां भी असंतुष्ट ही रहे और बाद में वहां से अलग भी हो गए. उसके बाद नीतीश के साथ आ गए.

नीतीश लगातार करते रहे हैं उपेक्षा

जब जेडीयू ने बीजेपी से अलग होकर आरजेडी से गठबंधन कर सरकार बनाई, उस वक्त कहीं न कहीं उपेन्द्र कुशवाहा की ये ख्वाहिश थी कि उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया जाए. लेकिन उपमुख्यमंत्री आरजेडी नेता तेजस्वी यादव बनाए गए. उसके बाद जब कैबिनेट का विस्तार हुआ, तब भी उपेन्द्र कुशवाहा को उम्मीद थी कि उन्हें एक महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया जाएगा. वहां भी नीतीश कुमार ने उपेन्द्र कुशवाहा की उपेक्षा की और उनको मंत्री की बजाय पार्टी संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया. इसी बात को लेकर उपेन्द्र कुशवाहा कहते हैं कि उन्हें झुनझुना थमा दिया गया. जाहिर है कि कोई पार्टी सत्ता में रहती है, तो उसके नेता मंत्री पद चाहते हैं. ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार को ये भय लगने लगा कि उपेन्द्र कुशवाहा का कद बड़ा न हो जाए. नीतीश को डर सताने लगा कि अति पिछड़े वोटों की राजनीति जो वे करते हैं, खिसक कर उपेन्द्र कुशवाहा के पास न चला जाए. नीतीश का भी जो वोट बैंक कुर्मी-कोइरी है, वो पांच-छह फीसदी से ज्यादा तो है नहीं. कुशवाहा का भी वोट पर्सेंट में यहीं मामला है.

जेडीयू को तोड़ना चाहते हैं उपेन्द्र कुशवाहा

एबीपी सी वोटर का जो हाल के दिनों में सर्वे आया है, इसमें ये दिखाया गया है कि आज के तारीख में केंद्र में चुनाव होता है, तो स्पष्ट बहुमत के साथ बीजेपी सरकार बनाएगी, लेकिन सीटों में कमी आएगी. जिन राज्यों में सीट में कमी दिखाया गया है, उनमें कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड शामिल हैं. कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे राज्यों के विपरीत हिंदी बेल्ट के साथ बीजेपी की परेशानी ये रही है कि ऐसे किसी भी राज्य में तोड़-फोड़ करके सरकार बनाने की रणनीति कामयाब नहीं हो पा रही है. झारखंड में ऐसी कोशिश नाकाम हो गई थी. बिहार में भी ये रणनीति सफल नहीं हो पा रही है.

उपेन्द्र कुशवाहा जब ये कहते हैं कि वे अपना हिस्सा लिए बगैर कहीं नहीं जाएंगे, इससे साफ जाहिर होता है कि बीजेपी उपेन्द्र कुशवाहा के जरिए बिहार में जेडीयू को तोड़ना चाह रही है. इसलिए उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि वे जेडीयू नहीं छोड़ेंगे. उपेन्द्र कुशवाहा के बयानों से साफ है कि उनकी कोशिश पार्टी तोड़ने की है. जैसे एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र में कहा था कि वे शिवसेना नहीं छोड़ेंगे और समर्थक विधायकों के साथ दावा कर दिया कि वे ही असली शिवसेना हैं. उपेन्द्र कुशवाहा की भी यही कोशिश है कि पार्टी को तोड़कर ये साबित करें कि असली जेडीयू वे ही हैं.

सीएम बनना चाहते हैं उपेन्द्र कुशवाहा

उपेन्द्र कुशवाहा के सामने एक दिक्कत भी है. वे रामविलास पासवान के पैटर्न पर राजनीति कर रहे हैं. रामविलास पासवान तो अपनी राजनीति में कामयाब रहे. वे जब तक जीवित रहें, चाहे एनडीए के साथ रहें या फिर यूपीए के साथ, केंद्र में हमेशा मंत्री रहें. तीन-चार बार तो उपेन्द्र कुशवाहा ने भी अपना पाला बदला है. उनकी नजर एक बार फिर से बीजेपी की तरफ है. अब इनकी भी ख्वाहिश वहीं है कि एकनाथ शिंदे की तरह बिहार का मुख्यमंत्री बन जाएं और जेडीयू को तोड़ लें. रामविलास पासवान की राजनीति हमेशा केंद्र पर फोकस रही.

लेकिन उपेन्द्र कुशवाहा बिहार की राजनीति करते हुए केंद्र के नेता के तौर पर खुद को देखते रहे हैं. वो चाहते हैं कि केंद्र में जिस पार्टी की सत्ता हो, बिहार में उसके सहयोगी बनकर वे रहें और यहां का मुख्यमंत्री बन सके. उनकी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा हमेशा रही है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या उपेन्द्र कुशवाहा जेडीयू को तोड़ने में सफल हो पाएंगे, इसमें बहुत शंका है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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