क्या कोई भी खोल सकता है टोल नाका, जानिए कैसे मिलता है इसका ठेका और क्या होता है प्रोसेस?
Toll Plaza Model and Contract Process : टोल प्लाजा का संचालन अलग-अलग मॉडल के तहत किया जाता है, जिनमें BOT, HAM और TOT जैसे मॉडल शामिल हैं. हर मॉडल का काम करने का तरीका अलग होता है.

Toll Plaza Model and Contract Process : अक्सर लोगों को लगता है कि टोल प्लाजा का ठेका लेने वाले लोग काफी अच्छी कमाई करते हैं. लेकिन इसके पीछे एक लंबी प्रक्रिया और बड़े निवेश की जरूरत होती है. टोल प्लाजा का संचालन अलग-अलग मॉडल के तहत किया जाता है, जिनमें BOT, HAM और TOT जैसे मॉडल शामिल हैं. हर मॉडल का काम करने का तरीका अलग होता है और ठेका लेने वाली कंपनियों की जिम्मेदारियां भी अलग-अलग होती हैं. ऐसे में अगर आप भी जानना चाहते हैं कि टोल प्लाजा का ठेका कैसे मिलता है, कौन-कौन से मॉडल होते हैं और क्या कोई आम व्यक्ति इसमें हिस्सा ले सकता है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि क्या कोई भी टोल नाका खोल सकता है, इसका ठेका कैसे मिलता है और प्रोसेस क्या होता है.
BOT मॉडल क्या होता है?
BOT का पूरा नाम बिल्ड ऑपरेट एंड ट्रांसफर होता है. इस मॉडल में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) टेंडर जारी करता है. जिस कंपनी को टेंडर मिलता है, वह सड़क का निर्माण करती है और फिर उसी सड़क का एक तय समय तक संचालन करती है. आमतौर पर यह अवधि 20 से 30 साल तक हो सकती है. इस दौरान कंपनी सड़क पर टोल प्लाजा लगाकर वाहनों से टैक्स वसूलती है और उसी से अपनी कमाई करती है. कई मामलों में कंपनी का पूरा निवेश 4 से 5 साल में निकल जाता है, जबकि कुछ मामलों में 8 से 10 साल भी लग सकते हैं. हालांकि ट्रैफिक कम होने की स्थिति में जोखिम भी बना रहता है. इसके बाद भी ज्यादातर मामलों में कंपनियां फायदे में रहती हैं.
HAM मॉडल कैसे काम करता है?
HAM यानी हाइब्रिड एन्युटी मॉडल, इस मॉडल को उन कंपनियों के लिए बेहतर माना जाता है जो ज्यादा जोखिम नहीं लेना चाहती हैं. इसमें सड़क निर्माण की कुल लागत का 40 प्रतिशत हिस्सा सरकार देती है, जबकि 60 प्रतिशत निवेश कंपनी करती है. सबसे खास बात यह है कि इस मॉडल में टोल वसूली का काम कंपनी नहीं करती है. कंपनी सड़क निर्माण के लिए अपनी हिस्सेदारी का पैसा लगाती है और बदले में सरकार उसे समय-समय पर एक तय राशि देती रहती है. जैसे अगर किसी सड़क परियोजना की लागत 1000 करोड़ रुपये है, तो कंपनी 600 करोड़ रुपये लगाएगी और 400 करोड़ रुपये सरकार देगी. इसके बदले में कंपनी को हर क्वार्टरली, हाफ ईयरली या फिर हर ईयरली एक फिक्स अमाउंट दिया जाता है वो 15 करोड़, 20 करोड़ या 25 करोड़ इस तरीके से हो सकता है और दुगने अमाउंट तक दिया जाता है. जब तक कंपनी को 1200 करोड़ रुपये नहीं मिल जाते हैं. तब तक वो अमाउंट फिक्स गवर्नमेंट देती रहती है तो यह गवर्नमेंट की एक गारंटी हो जाती है और यहां पर कंपनी को फिक्स अर्निंग मिलते ही मिलती है और कंपनी बिल्कुल भी लॉस में नहीं जा सकती है क्योंकि गवर्नमेंट की गारंटी है.
TOT मॉडल क्या होता है?
TOT मॉडल का मतलब टोल ऑपरेशन या ऑपरेट ट्रांसफर मॉडल होता है. इस मॉडल में सड़क पहले से बनी हुई होती है और उसका शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट पूरा हो चुका होता है. इसके बाद सरकार या NHAI उस सड़क के टोल संचालन का अधिकार किसी दूसरी कंपनी को देना चाहती है. इसके लिए भी टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाती है और जो कंपनी सबसे उपयुक्त बोली लगाती है, उसे यह अधिकार मिल जाता है. इस मॉडल में कंपनी को सड़क की देखरेख करनी होती है. सड़क पर गड्ढे भरने, दुर्घटना की स्थिति में व्यवस्था संभालने और अन्य रखरखाव की जिम्मेदारी भी उसी की होती है. टोल से होने वाली कमाई से कंपनी अपना खर्च और फायदा निकालती है. साथ ही उसे एक तय राशि NHAI या सरकार को भी देनी होती है. बताया जाता है कि इस मॉडल में कई कंपनियां हर महीने 3 से 4 करोड़ रुपये तक बचा लेती हैं.
क्या कोई भी टोल नाका खोल सकता है और इसका ठेका कैसे मिलता है
कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से कहीं भी टोल नाका नहीं खोल सकता है. टोल वसूलने का अधिकार सरकार के पास होता है और नेशनल हाईवे पर इसकी जिम्मेदारी NHAI निभाती है. टोल का ठेका लेने के लिए सबसे पहले प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, अच्छी नेटवर्थ और इस क्षेत्र का एक्सपीरियंस होना जरूरी माना जाता है. इसके बाद NHAI या राज्य सरकार की ओर से जारी टेंडर में हिस्सा लेना पड़ता है. टेंडर में ठेके की अवधि, सिक्योरिटी डिपॉजिट और अन्य शर्तों की पूरी जानकारी दी जाती है. आवेदन करने से पहले टोल प्लाजा की लोकेशन और वहां से गुजरने वाले वाहनों की संख्या को समझना भी जरूरी होता है. राज्य हाईवे पर टोल व्यवस्था राज्य सरकारों के नियमों के अनुसार चलती है. टोल से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल सड़कों के निर्माण, रखरखाव और संचालन पर होने वाले खर्च को पूरा करने के लिए किया जाता है. FASTag भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है.
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बड़े टेंडर के लिए कितनी नेटवर्थ जरूरी होती है?
टेंडर में भाग लेने के लिए कंपनी की नेटवर्थ भी जरूरी होती है. आमतौर पर जितने मूल्य का टेंडर होता है, उसकी लगभग 10 से 20 प्रतिशत नेटवर्थ कंपनी के पास होनी चाहिए. जैसे अगर किसी परियोजना की लागत 1000 करोड़ रुपये है, तो कंपनी की नेटवर्थ लगभग 100 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा होनी चाहिए. बड़े टेंडर में हिस्सा लेने से पहले सिक्योरिटी अमाउंट भी जमा करना होता है. यह राशि 20 से 30 करोड़ रुपये तक हो सकती है. अगर कंपनी का चयन नहीं होता है तो यह राशि वापस कर दी जाती है. वहीं अगर कंपनी को टेंडर मिल जाता है तो आगे बैंक सिक्योरिटी के रूप में भी बड़ी राशि जमा करनी पड़ती है.
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