EXPLAINED: CAFE-III लागू, अब हर कार कंपनी को बढ़ानी होगी माइलेज, जानिए पूरा गणित
इसका मुख्य उद्देश्य नई कारों द्वारा होने वाले ईंधन उत्सर्जन और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को कम करना है.

केंद्र सरकार ने 29 सितंबर को पैसेंजर वाहनों के लिए फ्यूल-एफिशिएंसी मानकों के तीसरे चरण यानी CAFE-III नियमों की घोषणा की. इन नए नियमों के तहत वाहन निर्माता कंपनियों को अगले पांच वर्षों में अपने कुल फ्लीट (बिकने वाली सभी गाड़ियों के समूह) की औसतन ईंधन खपत में लगभग 16.7% की कटौती करनी होगी. हालांकि, इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए कंपनियां अपनी पसंद की तकनीक चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं.
भारत में वर्ष 2017 से कार निर्माताओं को अधिक फ्यूल-एफिशिएंट वाहन बनाने के लिए 'कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी' (CAFE) नियमों के तहत प्रोत्साहित किया जाता रहा है. इसका मुख्य उद्देश्य नई कारों द्वारा होने वाले ईंधन उत्सर्जन और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को कम करना है. 'ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001' के तहत लागू किए गए इन नियमों के केंद्र में पैसेंजर गाड़ियां हैं, क्योंकि ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार देश में परिवहन ऊर्जा और जीवाश्म ईंधन की कुल खपत में इस सेगमेंट की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है.
CAFE नियमों का क्या मतलब है और ये कैसे काम करते हैं?
CAFE नियम किसी एक व्यक्तिगत कार मॉडल पर नहीं, बल्कि कंपनी द्वारा बेची जाने वाली सभी गाड़ियों की औसतन बिक्री पर लागू होते हैं.
सरकार एक वित्तीय वर्ष में किसी कंपनी द्वारा बेची गई सबसे छोटी हैचबैक से लेकर सबसे भारी SUV तक की सभी कारों के औसतन ईंधन इस्तेमाल का हिसाब लगाती है. यह कुल औसत उस साल तय की गई सरकारी सीमा के भीतर होना चाहिए. इसका मतलब यह है कि यदि कोई कंपनी ज्यादा ईंधन खपत वाले मॉडल बेचती है, तो उसे अपना कुल औसत संतुलित करने के लिए अधिक माइलेज वाले या इलेक्ट्रिक मॉडल भी बेचने होंगे. नियमों का हर नया चरण इस सीमा को और कड़ा कर देता है.
CAFE-III नियम 1 अप्रैल 2027 से लागू होकर 31 मार्च 2032 तक प्रभावी रहेंगे. इसके तहत फ्लीट-एवरेज ईंधन खपत की सीमा को वर्ष 2027-28 में 3.996 लीटर/100 किमी से घटाकर वर्ष 2031-32 तक 3.3273 लीटर/100 किमी पर लाना होगा.
यह सीमा आधिकारिक लैब टेस्ट के आधार पर तय की जाती है. जिन कंपनियों के पोर्टफोलियो में इलेक्ट्रिक (EV), हाइब्रिड या अन्य वैकल्पिक ईंधन वाहन शामिल हैं, उन्हें ये लक्ष्य हासिल करने में आसानी होगी क्योंकि ये वाहन पारंपरिक ईंधन की खपत को काफी कम कर देते हैं.
CAFE-III में क्या बदलाव हुआ है?
तीसरे चरण में ईंधन खपत के टारगेट को गाड़ियों के औसतन वज़न से और भी बारीकी से जोड़ा गया है. चूंकि भारी SUV को चलाने के लिए छोटी हैचबैक की तुलना में अधिक ईंधन की आवश्यकता होती है, इसलिए हर कंपनी का टारगेट एक विशेष फ़ॉर्मूले से तय होता है.
CAFE-III के तहत 'रेफ़रेंस वज़न' को मौजूदा व्यवस्था के 1,082 किलोग्राम से बढ़ाकर 1,229 किलोग्राम कर दिया गया है. केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक, रेफ़रेंस वज़न में यह लगभग 13.6% की बढ़ोतरी भारतीय कार बाज़ार में बढ़ती बड़ी और भारी गाड़ियों (SUVs) की मांग को दर्शाती है.
पहले भारी कारें बनाने वाली कंपनियों को वज़न के बदले ईंधन खपत में अधिक छूट (Relief) मिलती थी. लेकिन CAFE-III में इस छूट के स्लोप (Slope) को समतल (Flatten) कर दिया गया है.
इसको ऐसे समझें कि मान लीजिए एक कंपनी केवल ऑल्टो या स्विफ़्ट जैसी हल्की हैचबैक बनाती है और दूसरी कंपनी केवल फॉर्च्यूनर या XUV700 जैसी भारी SUV बनाती है.
पुराने नियमों में भारी SUV बनाने वाली कंपनी को अतिरिक्त वज़न के बदले अधिक छूट मिल जाती थी, जबकि हैचबैक बनाने वाली कंपनी के लिए लक्ष्य काफी कठोर होते थे. CAFE-III ने इस अंतर को कम कर दिया है. अब हल्की कारें बनाने वाली कंपनियों के लक्ष्य मुख्य बेंचमार्क के करीब आ गए हैं (जिससे उन्हें राहत मिलेगी), जबकि भारी SUV बनाने वाली कंपनियों को मिलने वाली अतिरिक्त छूट में कटौती की गई है, जिससे उनके लिए फ्यूल-एफिशिएंसी के मानदंड पहले से काफी कड़े हो गए हैं.




















