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EV स्कूटर की बिक्री बढ़ी, फिर भी कंपनियां क्यों नहीं कमा रहीं पैसा?

Electric Vehicle Profit Challenge: सड़कों पर इलेक्ट्रिक स्कूटर्स की बाढ़ आने के बाद भी ईवी कंपनियां मुनाफा क्यों नहीं कमा पा रही हैं? जानिए इस चमकते बिजनेस के पीछे का असली सच.

Electric Vehicle Profit Challenge: आजकल बढ़ते पेट्रोल और डीजल के दामों के चलते सभी ग्राहक इलेक्ट्रिक गाड़ियों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं. पिछले कुछ सालों भारतीय सड़कों पर इलेक्ट्रिक स्कूटर्स का बोलबाला रहा है. जबकि डेटा की मानें तो इस साल अबतक 14 लाख से ज्यादा इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स की बिक्री हो चुकी है. हालांकि, इलेक्ट्रिक स्कूटर्स की बिक्री के बाद भी कंपनियां घाटे में चल रही है. 

ऐसा हम नहीं बल्कि डाटा बता रहा है. आपको बता दें कि, ओला, एथर से लेकर बजाज और हीरो जैसी बड़ी कंपनियां इस रेस में शामिल तो हैं लेकिन इस सेगमेंट से प्रॉफिट निकालना अभी भी इनके लिए एक बड़ा सवाल बना हुआ है. तो चलिए जानतें हैं इस खबर को पूरी डिटेल में.

बैटरी और इम्पोर्ट से मुनाफे पर पड़ रहा असर 

जानकारी के लिए आपको बता दें कि, इलेक्ट्रिक स्कूटर कंपनियों के घाटे में रहने की सबसे बड़ी वजह इसका कॉस्ट स्ट्रक्चर है. किसी भी ईवी स्कूटर की कुल लागत का लगभग 50 फीसदी हिस्सा सिर्फ उसकी बैटरी सेल का होता है. लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि ये बैटरी सेल्स भारत में नहीं बनते. बल्कि इन्हें बड़े पैमाने पर विदेशों से इम्पोर्ट करना पड़ता है. 

इसके अलावा मोटर के पार्ट्स और पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए भी कंपनियां विदेशी सप्लायर्स पर निर्भर हैं. डॉलर के मुकाबले रुपये के उतार-चढ़ाव और कस्टम ड्यूटी की वजह से कंपनियों का पूरा बजट बिगड़ जाता है और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. जिसके चलते कंपनियां लगातार स्कूटर्स सेल के बाद भी मुनाफे में नहीं पहुंच पा रही हैं.

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इंफ्रास्ट्रक्चर पर हो रहा है अंधाधुंध खर्च

आजकल आपको भले ही सड़कों पर ईवी स्कूटर्स की संख्या बढ़ती हुई दिख रही हो. लेकिन पेट्रोल गाड़ियां आज भी मार्केट पर राज कर रही हैं. उनके मुकाबले ईवी का प्रोडक्शन वॉल्यूम अभी भी बहुत कम है. 

जब तक प्रोडक्शन बहुत बड़े लेवल पर नहीं होता है तब तक रिसर्च एंड डेवलपमेंट और सॉफ्टवेयर पर होने वाला भारी खर्च निकालना मुश्किल होता है. इसके साथ ही नई ईवी कंपनियों को अपने शोरूम, चार्जिंग स्टेशन और सर्विस नेटवर्क एकदम जीरो से शुरू करने पड़ रहे हैं, जिसमें पानी की तरह पैसा बह रहा है और मुनाफा निकालना मुश्किल हो रहा है.

भविष्य में हैं उम्मीदें 

आपको बता दें कि, इस घाटे के सौदे के बाद भी अब धीरे-धीरे सुधार के कुछ संकेत भी दिखने लगे हैं. जैसे बजाज ऑटो का कहना है कि उनके चेतक स्कूटर्स पोर्टफोलियो की यूनिट इकोनॉमिक्स अब धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है. एक्सपर्ट्स मानतें है कि लंबे समय में मुनाफा कमाने का केवल एक ही रास्ता है और वो है लोकल मैन्युफैक्चरिंग.
 
जब भारत में ही बैटरी सेल्स और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स का प्रोडक्शन शुरू हो जाएगा तब इम्पोर्ट कॉस्ट आसानी से कम हो जाएगी. सरकार की पीएलआई स्कीम और कंपनियों द्वारा खुद की टेक्नोलॉजी डेवलप करने से आने वाले समय में यह घाटा मुनाफे में बदल सकता है.

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हिमांशु सिंह पिछले साढ़े तीन साल से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. फिलहाल वह ABP News में ऑटो बीट पर कार्यरत हैं. ऑटो सेक्टर में उन्हें नई कारों और बाइक्स के लॉन्च, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, फीचर्स, माइलेज, टेक्नोलॉजी और ऑटो मार्केट से जुड़ी खबरों की अच्छी जानकारी है. वह ऑटो से जुड़ी हर जरूरी और नई जानकारी आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं, ताकि लोग बिना किसी परेशानी के खबरों को समझ सकें.

ABP News से पहले हिमांशु DNP India, Sports Wiki और Hawk E Commerce के साथ काम कर चुके हैं. इस दौरान उन्होंने स्पोर्ट्स, राजनीति और वायरल खबरों पर भी काम किया. अलग-अलग बीट्स पर काम करने की वजह से उन्हें कई तरह की खबरों को समझने और लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने का अनुभव मिला.

हिमांशु की कोशिश रहती है कि उनकी खबरें सरल, भरोसेमंद और सीधे लोगों से जुड़ी हों. उन्हें ऐसी खबरों पर काम करना पसंद है, जिनका असर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है. डिजिटल मीडिया की अच्छी समझ होने की वजह से वह ट्रेंडिंग और जरूरी खबरों को तेजी से पाठकों तक पहुंचाते हैं.

काम के अलावा हिमांशु को क्रिकेट खेलना, स्टैंडअप कॉमेडी करना और नई जगहों पर घूमना पसंद है. उनका मानना है कि नई जगहों को देखना और नए लोगों से मिलना सोच को बेहतर बनाता है, जिसका फायदा उनके काम में भी मिलता है.

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