राहु-शुक्र का षडाष्टक योग: क्या यह सचमुच ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के लिए प्रेरित करता है
Live-In Relationships: राहु-शुक्र का षडाष्टक योग क्या सच में लिव-इन रिलेशनशिप या बदनामी की वजह बनता है? जानिए इस प्रचलित ज्योतिषीय मिथक के पीछे का असली शास्त्रीय सच और क्या कहते हैं प्राचीन ग्रंथ.

Live-In: सोशल मीडिया पर बीते कुछ दिनों से ज्योतिष के नाम पर एक फेक्ट बिना किसी रोक-टोक के वायरल हो रहा है कि अगर राहु का षडाष्टक योग मीन, तुला या वृष राशि के शुक्र से चतुर्थ या पंचम भाव में हो, तो जातक शत-प्रतिशत लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है.
सोशल मीडिया के माध्यम से जब कुछ ऐसा दिखाई या सुनाई देता है तो माता-पिता घबरा जाते हैं, उन्हें लगता है कि संतान का विवाह और सामाजिक भविष्य अब ग्रहों के हाथ से निकल चुका है. जातक स्वयं अपराधबोध और भय में चला जाता है, मानो कुंडली ने पहले ही उसके चरित्र का निर्णय सुना दिया हो. और धीरे-धीरे ज्योतिष एक मार्गदर्शक शास्त्र नहीं, बल्कि अंतिम फैसला सुनाने वाला न्यायाधीश बना दिया जाता है. लेकिन मूल प्रश्न यही है क्या इस दावे का कोई वास्तविक शास्त्रीय आधार है?
पहला तथ्य, यह सूत्र किसी भी प्रामाणिक ज्योतिष ग्रंथ में मौजूद नहीं है. भारतीय वैदिक ज्योतिष सूत्रों और सिद्धांतों पर आधारित शास्त्र है. किसी भी योग या निष्कर्ष को तभी स्वीकार किया जाता है जब वह या तो स्पष्ट रूप से ग्रंथ में लिखा हो, या फिर शास्त्रीय नियमों से सीधे-सीधे निकाला गया हो.
राहु-शुक्र षडाष्टक योग को 'लिव-इन रिलेशनशिप' से जोड़ने वाला कोई सूत्र
- बृहत् पाराशर होरा शास्त्र
- फलदीपिका
- सरावली
- जातक पारिजात
- जैमिनी सूत्र
इनमें से किसी में भी मौजूद नहीं है. कहीं भी यह नहीं लिखा कि राहु और शुक्र का षडाष्टक संबंध जातक को विवाह से बाहर जीवन जीने के लिए बाध्य करता है. यह तथ्य अपने आप में इस पूरे दावे की नींव को कमजोर कर देता है.
अब प्रश्न उठता है कि फिर यह धारणा बनी कैसे? यह धारणा शास्त्र से नहीं, बल्कि आधुनिक व्याख्याओं और सामाजिक ट्रेंड्स को ग्रहों पर थोपने से बनी है. तीन अलग-अलग सिद्धांतों को जोड़कर एक सीधा, डरावना निष्कर्ष निकाल लिया गया.
राहु का स्वभाव (Shastra-Based)
शास्त्रों में राहु को परंपरा से हटकर चलने वाला, सामाजिक सीमाओं को चुनौती देने वाला और असामान्य मार्ग अपनाने वाला ग्रह माना गया है. राहु प्रयोग कराता है, विकल्प दिखाता है और व्यक्ति को स्थापित ढांचे पर प्रश्न उठाने की प्रवृत्ति देता है. लेकिन शास्त्र एक बात बहुत स्पष्ट कहता है कि राहु दिशा देता है, निर्णय नहीं. यदि सप्तम भाव, गुरु या नवांश मजबूत हो, तो यही राहु-
- अंतरजातीय विवाह
- विदेशी जीवनसाथी
- देरी से विवाह
दे सकता है. लिव-इन रिलेशनशिप को अनिवार्य बनाना राहु का शास्त्रीय स्वभाव नहीं है.
शुक्र का स्वभाव
शुक्र प्रेम, आकर्षण, संबंध और सुख का कारक है. यह निर्विवाद सत्य है. लेकिन शास्त्र यह भी स्पष्ट करता है कि शुक्र संबंध की इच्छा दिखाता है,
संबंध का ढांचा नहीं तय करता. विवाह, अविवाह या किसी भी रिश्ते की सामाजिक संरचना-
- सप्तम भाव
- द्वितीय भाव (परिवार)
- नवांश कुंडली
से तय होती है. केवल शुक्र के आधार पर संबंध का स्वरूप तय करना शास्त्रीय रूप से अधूरा निष्कर्ष है.
षडाष्टक (6/8) संबंध
षडाष्टक योग को लेकर सबसे अधिक गलतफहमी फैलाई गई है. शास्त्रों में षडाष्टक का अर्थ है-
- ग्रहों के बीच स्वभाविक टकराव
- मानसिक तनाव
- तालमेल की कमी
- भावनात्मक असंतुलन
लेकिन शास्त्र कहीं भी यह नहीं कहता कि षडाष्टक का अर्थ अवैध संबंध या सामाजिक नियमों का उल्लंघन है. षडाष्टक संघर्ष दिखाता है,
चरित्र का निर्णय नहीं करता. शास्त्र में विवाह और संबंध का निर्णय कभी भी-
- एक ग्रह
- एक योग
- या एक भाव
से नहीं किया जाता. इसके लिए हमेशा देखा जाता है-
- सप्तम भाव और उसका स्वामी
- द्वितीय भाव (परिवार और कुल)
- नवांश कुंडली (D-9)
- दाराकारक
- दशा-अंतर्दशा
जब तक ये सभी तत्व एक साथ गंभीर रूप से प्रभावित न हों, '100%' जैसा निष्कर्ष निकालना शास्त्र सम्मत नहीं है. इसके लिए-
नवांश (D-9): सबसे ठोस आधार
नवांश को शास्त्रों में विवाह और धर्म का अंतिम निर्णयकर्ता माना गया है. यही कारण है कि अनुभवी ज्योतिषी किसी भी संबंध-संबंधी निष्कर्ष से पहले नवांश को देखते हैं. वास्तविक कुंडलियों में बार-बार यह देखा गया है कि राहु-शुक्र का षडाष्टक राशी कुंडली में मौजूद होता है लेकिन नवांश मजबूत होता है. परिणामस्वरूप जातक सामान्य, सामाजिक और वैधानिक विवाह करता है. नवांश मजबूत हो तो राहु जैसे ग्रह भी विवाह में परिणत हो जाते हैं.
ज्योतिष का मूल सूत्र है, देश-काल-पात्र. जब तक समाज की संरचना, समय की परिस्थितियां, व्यक्ति के संस्कार और पारिवारिक पृष्ठभूमि इन तीनों को न देखा जाए, तब तक कथन को सत्य नहीं माना जाना चाहिए.
तो यह योग वास्तव में क्या करता है? शास्त्र-सम्मत ढंग से देखें तो राहु-शुक्र का षडाष्टक योग व्यक्ति में आधुनिक और गैर-परंपरागत सोच, रिश्तों को अलग दृष्टिकोण से देखने की प्रवृत्ति, भावनात्मक उलझन और प्रेम में आकर्षण के साथ असंतुलन पैदा कर सकता है. लेकिन यह योग लिव-इन रिलेशनशिप को अनिवार्य नहीं बनाता. यह विवाह को स्वतः नष्ट नहीं करता.
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