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पराली को ऐसे करेंगे इस्तेमाल तो सोना उगलेगी मिट्टी, किसानों के लिए मतलब की बात

Stubble Using Tips: पराली को जलाने के बजाय मिट्टी में दबाकर आप इसे कीमती जैविक खाद बना सकते हैं. इससे न सिर्फ मिट्टी की नमी और उपजाऊ शक्ति बढ़ती है. बल्कि खाद का खर्च भी कम होता है.

Stubble Using Tips: खेती-किसानी में पराली जलाना आज एक बड़ी परेशानी बन चुका है. लेकिन अगर हम थोड़ा नजरिया बदलें तो यही पराली खेत के लिए वरदान साबित हो सकती है. अक्सर किसान भाई अगली फसल की जल्दी में इसे जला देते हैं. जिससे न सिर्फ प्रदूषण फैलता है बल्कि मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व भी राख हो जाते हैं. सच तो यह है कि पराली कचरा नहीं बल्कि देसी खाद का खजाना है.

जो मिट्टी की सेहत सुधारने की पूरी ताकत रखती है. अगर हम सही तरीकों को अपनाकर इसे खेत में ही गलाने का हुनर सीख लें. तो खाद का खर्चा तो कम होगा ही. इसके साथ ही फसल की पैदावार भी कई गुना बढ़ जाएगी. आज के समय में पराली को जलाना नहीं बल्कि इसे मिट्टी में मिलाकर सोना पैदा करना ही असली समझदारी है.

खेत में बढ़ेगी पैदावार

जब हम पराली को खेत में ही जोतकर उसे मिट्टी का हिस्सा बना देते हैं. तो वह धीरे-धीरे गलकर जैविक खाद में बदल जाती है. इससे मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है और उसकी जल धारण क्षमता यानी पानी सोखने की शक्ति भी बेहतर होती है. अक्सर देखा गया है कि जो किसान पराली को मिट्टी में मिलाते हैं. उनकी फसल को सूखे के समय भी कम नुकसान होता है.

क्योंकि मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है. यह तरीका न केवल मिट्टी को उपजाऊ बनाता है बल्कि रसायनों और यूरिया जैसी महंगी खादों पर निर्भरता भी कम करता है. इस तरह आपकी जमीन पहले से ज्यादा ताकतवर हो जाती है और आने वाले सालों में फसल की क्वालिटी और वजन दोनों में बड़ा सुधार देखने को मिलता है.

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दीमक और बीमारियों से बचेंगे

बहुत से किसानों के मन में यह डर रहता है कि पराली को खेत में छोड़ने से दीमक लग जाएगी. लेकिन असल में तरीका सही हो तो यह समस्या पैदा ही नहीं होगी. पराली को गलाने के लिए वेस्ट डीकंपोजर का इस्तेमाल सबसे कारगर है, जो इसे तेजी से खाद में बदल देता है. जब पराली पूरी तरह से गल जाती है. तो वह मिट्टी के मित्र कीटों को बढ़ावा देती है और हानिकारक फंगस या दीमक के पनपने की गुंजाइश कम हो जाती है.

खास बात यह है कि यह सड़ी हुई पराली मिट्टी की ऊपरी परत को एक सुरक्षा कवच की तरह ढक लेती है. जिससे खरपतवार भी कम उगते हैं. इस तरीके से पराली का ऐसे यूज करके आप अपनी मेहनत और पैसा दोनों बचा सकते हैं.

लंबे समय का मुनाफा

आज के समय में खेती की लागत लगातार बढ़ रही है. ऐसे में पराली का सही इस्तेमाल सीधे आपकी जेब को फायदा पहुंचाता है. जब खेत खुद अपनी खाद तैयार करने लगता है. तो बाहर से खरीदे जाने वाले फर्टिलाइजर्स का खर्च 20 से 30 प्रतिशत तक कम हो सकता है. लंबे समय में यह प्रक्रिया मिट्टी को इतना उपजाऊ बना देती है कि आपको कम मेहनत में ज्यादा मुनाफा मिलने लगता है. इसके अलावा पराली न जलाकर आप पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी तो निभाते ही हैं. तो साथ ही प्रशासन की सख्ती और जुर्माने से भी बच जाते हैं.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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