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कश्मीर ही नहीं आपके खेत में भी हो सकती है केसर की खेती, जान लीजिए तरीका

Saffron Cultivation Tips: कश्मीर के बिना भी अब केसर की खेती मुमकिन है. सही तरीके से आप अपने ही इलाके में इसे उगाकर भारी मुनाफा कमा सकते हैं. जान लीजिए इस खेती से जुड़ी पूरी डिटेल.

Saffron Cultivation Tips: केसर बाजार में काफी ऊंचे दामों पर बिकता है और यही वजह है कि बहुत से किसान इस खेती में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं. सामान्य तौर पर केसर कश्मीर की ठंडी वादियों में ज्यादा उगाया जाता है. इसलिए हम सब यही सोचते हैं कि इतनी महंगी चीज सिर्फ वहीं पैदा हो सकती है. लेकिन आज की मॉडर्न तकनीकों ने यह मुमकिन कर दिया है कि आप कश्मीर से दूर अपने इलाके और अपने खुले खेत की मिट्टी में भी केसर की सफल खेती कर सकते हैं.

अपने खेत में केसर उगाने के लिए आजकल खुली जमीन के साथ-साथ शेड नेट हाउस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी खूब हो रहा है. इसके जरिए खेत के एक हिस्से में कश्मीर जैसा मनचाहा तापमान और माहौल आसानी से तैयार कर लिया जाता है, जिससे केसर के पौधों को बढ़ने के लिए बिल्कुल परफेक्ट क्लाइमेट मिलता है. अपने ही खेत में केसर उगाकर आप हर साल लाखों का छप्परफाड़ मुनाफा कमा सकते हैं.

केसर की खेती के लिए किन चीजों की होती है जरूरत

केसर की खेती पारंपरिक तरीके से हटकर थोड़े अलग ढंग से होती है. इसके लिए आपको कश्मीरी केसर के बीज यानी कॉर्म्स की जरूरत होती है. अगस्त और सितंबर के महीने में इन बल्ब्स को खेत में या फिर ट्रे में प्लांट किया जाता है. अगर आप इसे खेत में कर रहे हैं तो ऐसी जमीन चुनिए जहां पानी बिल्कुल न रुकता हो. क्योंकि ज्यादा नमी से इसके बीज सड़ जाते हैं. 

अक्टूबर से दिसंबर के बीच इसमें बहुत ही खूबसूरत बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं. जिनके बीच से लाल रंग के केसर के धागे निकलते हैं. इस फसल अच्छी बात यह है कि को बहुत ज्यादा पानी या महंगी खादों की जरूरत नहीं होती. 

यह भी पढ़ें: वॉटर एप्पल की खेती कैसे करें किसान, हर साल कमाएंगे लाखों का मुनाफा

अच्छी पैदावार के लिए इन बातों का रखें ध्यान

केसर को दुनिया का सबसे महंगा मसाला कहा जाता. मार्केट में असली केसर की कीमत ढाई लाख से तीन लाख रुपये प्रति किलो तक होती है. ऐसे में अगर आप एक छोटे से एरिया में भी इसकी शुरुआत करते हैं. तो आपका प्रॉफिट किसी दूसरी फसल के मुकाबले कई गुना ज्यादा होगा. 

इसकी हार्वेस्टिंग यानी फूलों से केसर निकालने का काम थोड़ा सावधानी और मेहनत का होता है. लेकिन ज्यादा मुनाफे मिलने पर यह परेशानी भी दूर हो जाती है. इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि केसर के जो बीज आप एक बार खरीदते हैं. वह हर साल खुद-ब-खुद मल्टीप्लाई होते जाते हैं. यानी अगले साल के लिए बीज का खर्च भी बच जाता है. 

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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