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Crop Cycle in India: अगली फसल कौन सी लगायें! कम जोखिम में अधिक उत्पादन के लिये फसल चक्र के अनुसार करें खेती

Crop cycle in Agriculture: किसानों को संसाधनों के अनुसार फसलों की खेती करने की सलाह दी जाती है, जिसमें मिट्टी, जलवायु, बारिश, सिंचाई, खाद-उर्वरक, बीज आदि की उपयोगिता का भी ध्यान रखकर फसलें लगानी चाहिये.

Right Crop Cycle for Farmers: भारत में फसल चक्र (Crop Cycle) को खेती की जान कहा जाता है, जिसमें फसलों की अदल-बदल करके खेती अधिकतम उत्पादन लिया जाता है. फसल चक्र से खेती में जोखिमों की संभावना काफी कम होती है और समय की मांग के हिसाब से ये टिकाऊ उपज लेने में भी मददगार है. फसल चक्र कृषि का अभिन्न अंग हैं, जिसमें खेती करते हुये मिट्टी का स्वास्थ्य (Soil Health) के साथ-साथ खेती में आ रही कमियों को सुधारा जाता है.

वैज्ञानिक भाषा में इसे ही मोनो कल्चर (Monoculture) से जोड़कर देखा जाता है. खेती और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुये साधारण भाषा में रबी, खरीफ और जायद सीजन में अलग-अलग फसलों की खेती करना मोनो कल्चर है, जिससे किसानों को अधिकतम पैदावार हासिल हो सके और मिट्टी की उर्वरता पर बुरा असर ना पड़े.

क्यों जरूरी है फसल चक्र (Importance of Crop Cycle)
खेती में कई बार अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ जाता है, जिसमें मिट्टी की शक्ति का कम होना, भूजल स्तर का गिरना, फसल का कीड़े-रोगों से ग्रस्त होना आदि. ये कोई आम समस्यायें नहीं है, बल्कि फसल चक्र की गड़बड़ी के कारण ये परेशानियां पैदा होती है. इसके समाधान के रूप में रोटेशन (Rotational Farming) बनाकर फसलों की खेती की जाती है,जिससे मिट्टी की क्वालिटी, बाजार की मांग, संसाधनों का सही इस्तेमाल और किसान की जरूरत को मेंटेन किया जा सके. इसके मुताबिक खेती करने पर कीटनाशक, मजदूरी, खाद-उर्वरकों समेत कई अतिरिक्त खर्च को भी काफी हद तक कम कर सकते हैं. 

ऐसे तैयार करें फसल चक्र (Preparing Crop Cycle) 
अपने खेतों को उपजाऊ बनाये रखने के लिये किसानों को ही फसल चक्र निर्धारित करना होगा, जिसमें क्षेत्रीय फसलों की खेती या जलवायु, भूमि, बाजार मांग के हिसाब से खेती, खेती के लिये सिंचाई सुविधाएं, यातायात सुविधा, किसान की घरेलू आवश्यकतायें आदि का ख्याल भी रखना होता है, जिससे कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकें.

  • गहरी जड़ वाली सब्जियों के बाद मिट्टी  में कम गहरी जड़ों वाली फसल लगायें. जैसे- कपास के बाद गेहूं, सोयाबीन के बाद गेहूं या अरहर के बाद गेहूं की खेती आदि.
  • फलीदार और दलहनी फसलों के बाद बिना फलीदार और दलहनी फसलों के अलावा किसी और फसल की खेती करें. जैसे- ग्वार के बाद गेहूं, उड़द के बाद रबी सीजन की मक्का और सोयाबीन के बाद गेहूं  की खेती आदि.
  • अधिक खाद की उपयोगिता वाली फसलों के बाद खाद-उर्वरक की कम जरूरत वाली फसलों की खेती करनी चाहिये. जैसे- आलू के बाद प्याज, गन्ना के बाद गेहूं, कपास के बाद चना और मक्का के बाद चना की खेती आदि.
  • अधिक सिंचाई वाली फसलों के बाद अगली फसल वो लगायें, जिसमें पानी की कम या ना के बराबर ही जरूरत हो. जैसे- धान के बाद चना और धान के बाद सरसों की खेती आदि
  • मृदा कटाव की संभावना (लाइनों में बोई जाने वाली और अधिक निराई-गुड़ाई की जरूरत वाली फसल) वाली फसलों के बाद मिट्टी के कटाव को रोकने वाली फसलों की खेती करनी चाहिये. जैसे- मक्का के बाद बरसीम, कपास के बाद चना और धान के बाद चना की खेती आदि.
  • एक ही प्रजाति की फसलों को साथ में नहीं उगाना चाहिये, इससे रोग, कीट व खरपतवारों की समस्या बढ़ती है. इसलिये धान के बाद गेहूं और उड़द के बाद सरसों की खेती आदि. 

इन बातों का रखें ख्याल

इन सभी बातों के अलावा किसानों को संसाधनों के अनुसार फसलों की खेती करने की सलाह दी जाती है. उदाहरण के लिये मिट्टी, जलवायु, बारिश, सिंचाई, खाद-उर्वरक, बीज आदि की उपयोगिता का भी ध्यान रखकर फसलें लगानी चाहिये. किसान चाहें को निकटवर्ती कृषि उद्योग (Agriculture Industries) के आधार पर भी फसलों का चयन कर सकते हैं. जैसे कई इलाकों में शुगर मिल के लिये गन्ना की खेती(Sugarcane Farming for Sugar Mill), कॉटन मिल के लिये कपास की खेती (Cotton Farming for Cotton Mill) , दाल मिल के लिये दलहनी फसलों तथा तेल मिल के लिये तिलहनी फसलों (Oil seed Farming for Oil Mill) की खेती भी फसल चक्र (Crop Cycle) के अनुसार जोड़ सकते हैं.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और जानकारियों पर आधारित है. ABPLive.com किसी भी तरह की जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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